निशा भगत की आत्महत्या झारखंड के उस सामाजिक और राजनीतिक ढांचे पर एक गंभीर बीमारी का लक्षण है, जिसे तुरंत इलाज की दरकार है। सबसे पहला सवाल तो हमारे समाज के उस पुरुषवादी और कुंठित चरित्र पर उठता है जो किसी भी स्वतंत्र महिला कार्यकर्ता को बर्दाश्त नहीं कर पाता। जब एक महिला राजनीति या सामाजिक आंदोलन में आगे आती है, तो उसकी वैचारिक लड़ाई लड़ने के बजाय उसके चरित्र पर कीचड़ उछालना, उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करना और सोशल मीडिया के जरिए उसकी सामाजिक हत्या करना हमारे समाज का एक भयावह सच बन चुका है।
( विनोद आनंद )
झारखंड की आबोहवा में इन दिनों एक गहरा सन्नाटा और भीतर तक झकझोर देने वाली बेचैनी घुली हुई है, जो राज्य की राजधानी रांची के पिठोरिया थाना क्षेत्र की एक शाम को घटी उस हृदयविदारक घटना से उपजी है, जिसने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था, प्रशासनिक मशीनरी और सामाजिक ताना-बाना आखिर किस दिशा में जा रहा है। छह नवंबर दो हजार छब्बीस का वह दिन झारखंड के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास में एक काले अध्याय की तरह दर्ज हो गया है, जब आदिवासी समाज की मुखर आवाज, जुझारू युवा नेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता निशा कुमारी भगत ने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। यह घटना महज एक व्यक्ति की इहलीला का अंत नहीं है, बल्कि यह उस संपूर्ण व्यवस्था के मुंह पर एक करारा तमाचा है जो संविधान और कानून के दायरे में रहकर समाज के हक-अधिकारों की रक्षा करने का दावा करती है। जिस वक्त निशा ने फेसबुक पर लगभग दस-ग्यारह मिनट का वह लाइव वीडियो प्रसारित किया, उस समय उनकी आंखों में आंसू थे, गले में रुलाई थी और आवाज में एक ऐसी विवशता थी जिसे सुनने वाला कोई भी संवेदनशील इंसान अंदर तक हिल जाए। उस वीडियो में वे प्रशासनिक उदासीनता, जमीन दलालों के षड्यंत्रों और सत्ता की बेरुखी के खिलाफ अपनी पीड़ा उगल रही थीं, स्थानीय पुलिस अधिकारी से अपनी जान की गुहार लगा रही थीं और यह बता रही थीं कि किस तरह एक अकेली लड़की को चारों तरफ से घेरकर इस हद तक मानसिक प्रताड़ना दी गई कि उसके पास जीने के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नहीं छोड़ा गया। पुलिस मौके पर पहुंची, उन्हें राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज यानी रिम्स भी ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने जब उन्हें मृत घोषित किया, तो वह केवल एक सांस का टूटना नहीं था, बल्कि झारखंड की अस्मिता, जल-जंगल-जमीन के संघर्ष और आदिवासी समाज की एक बेहद प्रखर उम्मीद का हमेशा-सदा के लिए बुझ जाना था।

निशा भगत का जीवन और उनका संघर्ष किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस झारखंडी माटी की दास्तान है जो सदियों से शोषण, उपेक्षा और संघर्ष के भंवर में फंसती चली आई है। मूल रूप से झारखंड के गुमला जिले के बड़ाईक मोहल्ला की रहने वाली निशा उरांव आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखती थीं। उनके भीतर संघर्ष का यह जज्बा शायद विरासत में मिला था, क्योंकि उनके पिता हंदू भगत झारखंड आंदोलन के एक सक्रिय और समर्पित सिपाही रहे हैं। साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाली निशा ने सामान्य स्कूली शिक्षा के बाद दुर्गापुर के डीएसएमएस से होटल मैनेजमेंट की पेशेवर पढ़ाई पूरी की और उसके बाद बेहतर भविष्य की तलाश में बेंगलुरु जैसी महानगर की सुख-सुविधा भरी नौकरी की तरफ रुख किया। उनके पास एक कॉर्पोरेट जीवन जीने का विकल्प था, वे चाहतीं तो आधुनिकता की चमक-धमक में अपनी जिंदगी सुकून से काट सकती थीं, लेकिन उनके भीतर बैठा वह झारखंडी इंसान कभी शांत नहीं बैठा जो अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपने लोगों के साथ हो रहे अन्याय को देखकर सुलग उठता था। उन्होंने बेंगलुरु की आरामदायक नौकरी को लात मार दी और वापस अपने समाज के बीच लौट आईं। यह फैसला उनके जीवन का एक ऐसा निर्णायक मोड़ था जिसने उनकी पूरी दिशा ही बदल दी। वे झारखंड लौटकर आदिवासियों की अस्मिता, सरना धर्म और उनकी प्राचीन परंपराओं की रक्षा करने वाली एक मजबूत आवाज बन गईं। वर्ष दो हजार पच्चीस में उन्हें केंद्रीय सरना समिति की केंद्रीय महिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसे उन्होंने पूरी शिद्दत और सक्रियता के साथ निभाया। दिसंबर दो हजार पच्चीस में जब धर्मांतरण और डीलिस्टिंग के संवेदनशील मुद्दे पर बड़ा विरोध प्रदर्शन चल रहा था, तब निशा ने अपने बाल मुंडवाकर जो विरोध दर्ज कराया था, उसने पूरे राज्य का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था। वह एक ऐसा प्रतीक बन गया था जो यह बताता था कि आदिवासी समाज की यह बेटी अपनी संस्कृति और अस्तित्व के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है।
उनकी सक्रियता केवल धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे झारखंड के सबसे मर्मस्पर्शी और मूल मुद्दों यानी जल-जंगल-जमीन की हिफाजत, सीएनटी और एसपीटी यानी छोटा नागपुर टेनेंसी और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट के सख्त क्रियान्वयन तथा पेसा कानून को जमीन पर उतारने के लिए लगातार मुखर बनी रहीं। वे जानती थीं कि झारखंड के संसाधनों को किस प्रकार सुनियोजित तरीके से लूटा जा रहा है और कैसे भूमि माफिया व जमीन दलाल आदिवासी जमीनों पर अवैध कब्जा जमाते जा रहे हैं। वे इन भू-माफियाओं और सत्ता के गलियारों में बैठे उनके संरक्षकों के खिलाफ अकेले ही सीना तानकर खड़ी हो जाती थीं। इसके साथ ही, आदिवासी समाज के भीतर हो रहे अंधाधुंध धार्मिक धर्मांतरण के खिलाफ भी उनका स्वर बेहद तीखा था। उनका काम केवल भाषण देना या सोशल मीडिया पर बयान जारी करना नहीं था, बल्कि वे धरातल पर उतरकर लोगों के बीच काम करती थीं। यही वजह है कि उन्होंने मुख्यधारा की पारंपरिक राजनीति से अलग रास्ता चुना। वर्ष दो हजार चौबीस के झारखंड विधानसभा चुनाव में उन्होंने झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा यानी जेएलकेएम के टिकट पर गुमला विधानसभा सीट से चुनाव भी लड़ा। हालांकि वे चुनाव जीत नहीं सकीं, लेकिन चुनाव के बाद भी उनके तेवर में कोई कमी नहीं आई। आगे चलकर कुर्मी आंदोलन से जुड़े एक बयान के बाद अनुशासनहीनता के नाम पर उन्हें पार्टी से जरूर निष्कासित कर दिया गया, लेकिन एक स्वतंत्र कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने आदिवासी हितों की लड़ाई जारी रखी। उनका यह स्वतंत्र तेवर ही उनके लिए जी का जंजाल बन गया, क्योंकि वे सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की ही जनविरोधी नीतियों पर खुलकर सवाल उठाती थीं।
यहीं से उस कुचक्र की शुरुआत होती है जिसने अंततः निशा को इस आत्मघाती कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया। आज के दौर में जब सोशल मीडिया अभिव्यक्ति का माध्यम कम और चरित्र हनन का अखाड़ा ज्यादा बन चुका है, निशा को भी इसी डिजिटल हिंसा का निशाना बनाया गया। उन्हें सुनियोजित तरीके से ट्रोल किया गया, उनके खिलाफ भद्दे और अमर्यादित कमेंट्स किए गए, उन्हें “दलाल”, कभी आरएसएस तो कभी बीजेपी का एजेंट बताकर उनकी वैचारिक निष्ठा को संदिग्ध साबित करने की घिनौनी साजिश रची गई। एक अकेली महिला जब पुरुष-प्रधान और राजनीतिक रूप से कुटिल समाज में इस तरह खुलकर व्यवस्था को चुनौती देती है, तो उसे मानसिक रूप से तोड़ने के लिए किस हद तक पाखंडी हथकंडे अपनाए जाते हैं, निशा इसका एक जीवंत और दुखद शिकार बनीं। उनके पिता ने जो दर्द बयां किया है, उसके अनुसार लंबे समय से चल रहे इस मानसिक तनाव, चरित्र हनन और सोशल मीडिया की ट्रोलिंग के कारण निशा बुरी तरह टूट चुकी थीं। स्थिति यहाँ तक पहुंच गई थी कि वे अपने घर से बाहर निकलने में भी डरने लगी थीं। जरा सोचिए, एक ऐसी लड़की जो हजारीबाग से लेकर रांची और गुमला तक अपनी बुलंद आवाज के लिए जानी जाती थी, जिसे लोग एक साहसी नेत्री के रूप में देखते थे, वह अंदर से कितनी अकेली और असहाय हो चुकी होगी जब उसे चारों तरफ से गंदे और निराधार आरोपों की आंधी ने घेर लिया था। छह नवंबर को उनके फेसबुक लाइव ने इसी घुटन और कुंठा का वह खौफनाक पर्दाफाश किया, जिसमें उन्होंने साफ कहा कि वे झारखंड के आदिवासी समाज और जल-जंगल-जमीन के लिए लड़ रही हैं, लेकिन इसके बदले उन्हें जो प्रताड़ना मिल रही है, वह असहनीय हो चुकी है। उन्होंने वीडियो के दौरान ही पिठोरिया थाना प्रभारी को फोन किया, मदद की गुहार लगाई, अपनी असुरक्षा का हवाला दिया, लेकिन उस सिस्टम के कान पर जूं तक नहीं रेंगी जो दावा तो बहुत बड़े-बड़े करता है, मगर जरूरत पड़ने पर एक नागरिक की जान बचाने में पूरी तरह विफल साबित होता है।
इस घटना के बाद राज्य की राजनीतिक गलियारों में जो भूचाल आया है, वह भी कम चिंताजनक नहीं है। हर राजनीतिक दल इस दुखद घटना को अपने राजनीतिक चश्मे से देखकर अपनी रोटियां सेकने में लग गया है। मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने इसे हेमंत सोरेन सरकार की नाकामी और पुलिस प्रशासन की आपराधिक लापरवाही करार देते हुए मुख्यमंत्री के इस्तीफे और सीबीआई जांच की मांग की है। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी से लेकर केंद्रीय मंत्री संजय सेठ और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष तक ने राज्य सरकार को आड़े हाथों लेते हुए यह आरोप लगाया है कि हेमंत सोरेन के राज में आदिवासी महिलाएं और कार्यकर्ता सुरक्षित नहीं हैं। उनका यह भी कहना है कि इस पूरे मामले में जिन लोगों के नाम सामने आ रहे हैं, जैसे अजय तिर्की और ज्योत्सना केरकेट्टा, उनके खिलाफ तत्काल सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए और मामले की लीपापोती रोकने के लिए केंद्रीय एजेंसी से जांच करानी चाहिए। दूसरी ओर, सत्ताधारी झारखंड मुक्ति मोर्चा और उसके घटक दलों का पक्ष है कि निशा सरकार की आलोचक जरूर थीं, लेकिन वे हमारी अपनी आदिवासी बेटी थीं, और सरकार उनकी इस मौत से उतनी ही आहत है जितनी कि कोई अन्य। झामुमो का तर्क है कि जमीन माफिया और दलाल किसी एक पार्टी के नहीं होते, वे हर व्यवस्था में अपनी जड़ें जमाए रखते हैं और पुलिस इस मामले की निष्पक्षता से तह तक जा रही है तथा किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। इसके बावजूद, जनता के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब एक प्रखर नेत्री लगातार प्रशासन और पुलिस अधिकारियों को अपनी जान के खतरे और प्रताड़ना के बारे में बताती रही, तब समय पर प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या पुलिस प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा था? क्या राज्य की कानून-व्यवस्था इतनी संवेदनहीन हो चुकी है कि उसे एक महिला की चीख भी सिर्फ एक सामान्य प्रक्रिया की तरह सुनाई देती है?
निशा भगत की आत्महत्या झारखंड के उस सामाजिक और राजनीतिक ढांचे पर एक गंभीर बीमारी का लक्षण है, जिसे तुरंत इलाज की दरकार है। सबसे पहला सवाल तो हमारे समाज के उस पुरुषवादी और कुंठित चरित्र पर उठता है जो किसी भी स्वतंत्र महिला कार्यकर्ता को बर्दाश्त नहीं कर पाता। जब एक महिला राजनीति या सामाजिक आंदोलन में आगे आती है, तो उसकी वैचारिक लड़ाई लड़ने के बजाय उसके चरित्र पर कीचड़ उछालना, उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करना और सोशल मीडिया के जरिए उसकी सामाजिक हत्या करना हमारे समाज का एक भयावह सच बन चुका है। निशा के मामले में भी यही हुआ। उन्हें राजनीतिक और वैचारिक रूप से परास्त न कर पाने वाले क्षुद्र तत्वों ने उनके खिलाफ एक ऐसा मानसिक वातावरण तैयार किया जिससे वे अंदर से पूरी तरह बिखर गईं। दूसरा बड़ा सवाल हमारे पुलिस और प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर खड़ा होता है। झारखंड जैसे राज्य में जहां आदिवासी अधिकारों, सीएनटी-SPT कानूनों के उल्लंघन और जमीन की अवैध लूट के अनगिनत मामले रोजाना सामने आते हैं, वहां कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के लिए कोई ठोस व्यवस्था क्यों नहीं है? जब निशा जैसी नेत्री ने खुद अपनी जान को खतरा होने की बात प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंचाई थी, तब पुलिस ने उसे गंभीरता से क्यों नहीं लिया? क्या हमारी पुलिस केवल सत्ता में बैठे लोगों की सुरक्षा और प्रोटोकॉल निभाने के लिए रह गई है, या आम नागरिकों और विशेषकर संघर्षशील महिलाओं की जिंदगी की रक्षा करना भी उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है? तीसरा और सबसे अहम सवाल वर्तमान हेमंत सोरेन सरकार की कार्यकुशलता और संवेदनशीलता से जुड़ा है। झारखंड मुक्ति मोर्चा की सरकार आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन और उनकी अस्मिता के नाम पर सत्ता में आई है। इस सरकार से जनता की यह स्वाभाविक अपेक्षा होती है कि वह राज्य के मूलवासियों, आदिवासियों और विशेषकर उनके हक की लड़ाई लड़ने वाले युवाओं की ढाल बनेगी। लेकिन जब सरकार के कार्यकाल में ही एक आदिवासी बेटी, जो सरना धर्म और सीएनटी-SPT कानूनों की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा रही थी, इस तरह व्यवस्था से हार मानकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ले, तो यह सरकार की वैचारिक और नैतिक स्थापना पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगा देता है। केवल संवेदना प्रकट कर देने से या जांच का औपचारिक आश्वासन दे देने से इस गहरी प्रशासनिक और सामाजिक विफलता के दाग नहीं धुल सकते।
इस घटना से उपजे रोष को थामने के लिए और भविष्य में ऐसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सरकार और प्रशासन को युद्धस्तर पर ठोस कदम उठाने होंगे। सबसे पहली और सबसे अनिवार्य मांग जो निशा के परिवार और विभिन्न आदिवासी संगठनों द्वारा की जा रही है, वह इस पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की है। चूंकि परिवार ने कुछ खास लोगों पर साजिश के तहत हत्या का गंभीर आरोप लगाया है और इसमें उच्च पदस्थ लोगों के शामिल होने की आशंका जताई है, इसलिए राज्य सरकार को बिना किसी हीला-हवाली के इस मामले की जांच सीबीआई या एक स्वतंत्र न्यायिक आयोग को सौंप देनी चाहिए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। केवल एक सामान्य अननेचुरल डेथ यानी यूडी केस दर्ज करके और पोस्टमॉर्टम कराकर खानापूर्ति कर देने से जनता का विश्वास इस तंत्र पर से पूरी तरह उठ जाएगा। इसके साथ ही, सोशल मीडिया पर जिस प्रकार सुनियोजित तरीके से चरित्र हनन और मानसिक प्रताड़ना का खेल खेला गया है, उसकी साइबर सेल के माध्यम से गहराई से जांच होनी चाहिए और उन तमाम ट्रोल्स तथा षड्यंत्रकारियों बेनकाब किया जाना, जिन्होंने निशा को इस मुकाम तक पहुंचाया। इसके अतिरिक्त, झारखंड सरकार को राज्यभर में महिला कार्यकर्ताओं, सामाजिक आंदोलनकारियों और मानवाधिकार संरक्षकों की सुरक्षा के लिए एक विशेष और संवेदनशील प्रोटोकॉल तैयार करना चाहिए। थानों और प्रशासनिक इकाइयों में इस बात की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए कि जब भी कोई महिला या कार्यकर्ता अपनी सुरक्षा या किसी भू-माफिया द्वारा प्रताड़ित किए जाने की शिकायत लेकर आए, तो उसे हल्के में लेने के बजाय तत्काल और कड़े कदम उठाए जाएं। झारखंड की मुख्य समस्या जमीन और उसकी लूट की है; इसलिए सीएनटी और एसपीटी एक्ट के उल्लंघन तथा आदिवासियों की जमीनों पर अवैध कब्जा जमाने वाले भू-माफियाओं के खिलाफ एक निर्णायक और बड़ा अभियान छेड़ा जाना चाहिए, भले ही वे माफिया कितने भी रसूखदार या किसी भी राजनीतिक दल से जुड़े क्यों न हों। इसके अलावा, आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं, परामर्श केंद्रों और हेल्पलाइनों का विस्तार किया जाना बेहद जरूरी है ताकि सामाजिक संघर्षों के दौरान गहरे तनाव और अवसाद से जूझ रहे युवाओं और कार्यकर्ताओं को समय पर संबल और सही मार्गदर्शन मिल सके।
अंततः, निशा भगत की यह दर्दनाक विदाई हमें यह सोचने पर विवश करती है कि हम किस तरह के समाज का निर्माण कर रहे हैं जहाँ सच बोलने वाले, हक की लड़ाई लड़ने वाले और अपनी संस्कृति के लिए अपनी पूरी जवानी झींक देने वाले लोग व्यवस्था के चक्की में पिसकर इस तरह दम तोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं। निशा का यह जाना झारखंड के वैचारिक आसमान में एक ऐसा शून्य छोड़ गया है जिसे भरना आसान नहीं होगा। वे अकेली थीं, लेकिन उनके सपने बड़े थे; वे संघर्ष के रास्ते पर अकेली चल रही थीं, लेकिन उनके भीतर पूरा झारखंड धड़कता था। हेमंत सोरेन सरकार और झारखंड के पूरे प्रशासनिक तंत्र को यह समझना होगा कि आदिवासियों के नाम पर राजनीति करने और आदिवासियों की वास्तविक रक्षा करने के बीच का जो फासला है, वह अब बहुत खतरनाक हद तक चौड़ा हो चुका है। यदि इस विसंगति को समय रहते ठीक नहीं किया गया, यदि जमीन दलालों, भ्रष्ट अधिकारियों और चरित्र हनन करने वाली ताकतों पर लगाम नहीं लगाई गई, तो आने वाला इतिहास इस सरकार और इस व्यवस्था को कभी माफ नहीं करेगा। निशा भगत को सच्ची और सार्थक श्रद्धांजलि यही होगी कि उनके द्वारा उठाए गए जल-जंगल-जमीन और आदिवासी अधिकारों के सवालों को पूरी ईमानदारी से लागू किया जाए, उनके परिवार को न्याय दिलाया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि झारखंड की मिट्टी में अब फिर कभी किसी निशा को यूं सिस्टम की बलि न चढ़ना पड़े। यह मौत एक चेतावनी है, एक पुकार है, और अगर हमने इस पुकार को अब भी अनसुना कर दिया, तो हमारी इस तथाकथित सभ्य व्यवस्था का अंत बहुत दूर नहीं है।

