जाति व्यवस्था ब्राह्मणवादी मानसिकता द्वारा सृजित वह विषैला वृक्ष है जिसकी जड़ें हमारी परंपराओं, धर्मग्रंथों और सामाजिक व्यवहार में बहुत गहरी हैं। यह भारत के माथे पर एक ऐसा कलंक है जो हमें वैश्विक मंच पर एक आधुनिक राष्ट्र कहलाने से रोकता है। हमें बुद्ध की करुणा, अम्बेडकर के संकल्प और मार्क्स के वैज्ञानिक नजरिए को एक साथ अपनाना होगा। यह समझना अनिवार्य है कि जाति का विनाश केवल दलितों की जरूरत नहीं है, बल्कि यह पूरे भारतीय समाज के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है।
विनोद आनंद
जाति व्यवस्था भारतीय समाज की वह कड़वी सच्चाई है जिसने सदियों से मानवीय गरिमा, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता के मार्ग में एक अभेद्य दीवार खड़ी कर रखी है। यदि हम भारत के सामाजिक इतिहास और वर्तमान परिदृश्य का सूक्ष्म विश्लेषण करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि जाति महज एक श्रम विभाजन की पद्धति नहीं थी, बल्कि यह श्रेष्ठता के अहंकार और सत्ता के केंद्रीकरण से उपजी एक ऐसी कृत्रिम संरचना थी, जिसे धार्मिक और सांस्कृतिक चोला ओढ़ाकर शाश्वत बना दिया गया।
इस व्यवस्था के केंद्र में ब्राह्मणवादी विचारधारा खड़ी है, जिसने स्वयं को आध्यात्मिक और बौद्धिक रूप से सर्वोच्च सिद्ध करने के लिए समाज को शुद्धता और अशुद्धता के एक अमानवीय तराजू पर तौलना शुरू किया। लुई द्यूमोंट जैसे विद्वानों ने ठीक ही पहचाना था कि यह पदानुक्रम ‘होमो हायरार्किकस’ का प्रतीक है, जहाँ जन्म ही व्यक्ति के भाग्य का फैसला कर देता है। यह विडंबना ही है कि जिस भूमि ने बुद्ध और कबीर जैसे क्रांतिकारियों को जन्म दिया, वहीं ब्राह्मणों द्वारा अपनी श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए गढ़ी गई यह व्यवस्था आज एक ऐसे जंजाल में तब्दील हो चुकी है जिससे निकलने का रास्ता आधुनिक शिक्षा और लोकतंत्र भी पूरी तरह नहीं खोज पाए हैं।
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने इस व्यवस्था की जड़ पर प्रहार करते हुए इसे ‘बंद वर्ग’ कहा था। जब वर्ग के चारों ओर दीवारें खड़ी कर दी जाती हैं और आवाजाही के रास्ते बंद कर दिए जाते हैं, तब वह जाति बन जाती है। इस संरचना को बचाए रखने का सबसे बड़ा हथियार ‘एंडोगेमी’ यानी सजातीय विवाह बना। अपनी रक्त की शुद्धता का दंभ भरने वाली उच्च जातियों ने विवाह के नियमों को इतना सख्त कर दिया कि समाज छोटे-छोटे टापुओं में बंट गया।
यहाँ मार्क्सवादी दृष्टिकोण भी प्रासंगिक हो जाता है, जहाँ डी.डी. कोसंबी और इरफान हबीब जैसे विचारक इसे उत्पादन की शक्तियों और संसाधनों पर कब्जे के खेल के रूप में देखते हैं। ब्राह्मणों ने न केवल ज्ञान पर एकाधिकार किया, बल्कि समाज के हर कर्म को पवित्रता और अपवित्रता के पैमाने से जोड़कर यह सुनिश्चित किया कि जो मेहनत करता है, वह नीचा कहलाएगा और जो व्यवस्था का संचालक है, वह श्रेष्ठ।
यह ‘श्रम का बंटवारा’ नहीं बल्कि ‘श्रमिकों का श्रेणीबद्ध बंटवारा’ था, जिसने भारतीय चेतना को भीतर से खोखला कर दिया।
जाति का यह जंजाल केवल अतीत की बात नहीं है, बल्कि यह आज की आधुनिक अर्थव्यवस्था और राजनीति में नए रूप धारण कर चुका है। सुरिंदर जोधका के शोध बताते हैं कि शहर की चकाचौंध में भी जाति एक अदृश्य नेटवर्क की तरह काम करती है, जहाँ नौकरियों से लेकर व्यापारिक सौदों तक में अपनी जाति के प्रति झुकाव स्पष्ट दिखता है।
राजनीति में तो जाति एक ‘वोट बैंक’ की इकाई बनकर रह गई है। लोकतंत्र, जिसे जाति के विनाश का माध्यम बनना चाहिए था, दुर्भाग्य से जाति को पुनर्जीवित करने का साधन बन गया है। चुनाव के समय मुद्दों की जगह जातीय समीकरणों का गणित बैठाया जाता है, जिससे विकास की मुख्यधारा पीछे छूट जाती है। पहचान की राजनीति ने शोषित समुदायों को संगठित तो किया, लेकिन इसने अलगाववाद की भावना को भी हवा दी है, जहाँ हर कोई अपनी जाति के गौरव की बात करता है, ‘भारतीय’ होने के साझा गौरव की नहीं।
आरक्षण, जिसे डॉ. अम्बेडकर ने प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के लिए एक अस्थायी सुरक्षा चक्र के रूप में प्रस्तावित किया था, आज राजनीतिक लाभ-हानि का सबसे बड़ा जरिया बन गया है। उच्च जातियों का कुंठाग्रस्त होना और पिछड़ी जातियों का अधिकार के लिए संघर्ष करना समाज में एक निरंतर तनाव की स्थिति पैदा करता है। इस संघर्ष में असली मुद्दे—जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार—कहीं लुप्त हो जाते हैं। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि जातिगत हिंसा और अत्याचार आज भी हमारी रोजमर्रा की खबरों का हिस्सा हैं। जब एक दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने से रोका जाता है या दलित बच्चों को स्कूल में अलग बैठने पर मजबूर किया जाता है, तब यह स्पष्ट होता है कि ब्राह्मणवादी श्रेष्ठता का वह प्राचीन बोध आज भी ग्रामीण भारत की धमनियों में दौड़ रहा है।
जाति व्यवस्था ने भारत का जो सबसे बड़ा आर्थिक नुकसान किया है, वह है प्रतिभा का दमन। जब समाज का एक बड़ा हिस्सा संसाधनों से वंचित कर दिया जाता है, तो देश की सामूहिक उत्पादकता स्वतः ही कम हो जाती है। सुशील थोरत जैसे अर्थशास्त्री स्पष्ट करते हैं कि जाति आधारित बाजार भेदभाव न केवल अन्यायपूर्ण है बल्कि यह जीडीपी की वृद्धि में भी बाधक है। आर्थिक विषमता की खाई इतनी चौड़ी है कि एक तरफ ऊँची जातियों के पास संपत्ति और अवसरों का अंबार है, तो दूसरी तरफ दलित और पिछड़े समाज के लोग आज भी न्यूनतम मजदूरी और कुपोषण से लड़ रहे हैं। जाति ने वर्ग संघर्ष की संभावनाओं को भी कुंठित किया है, क्योंकि यहाँ एक गरीब ब्राह्मण खुद को एक गरीब दलित के साथ खड़ा करने के बजाय अपनी काल्पनिक जातीय श्रेष्ठता में जीना पसंद करता है। इसी कारण मार्क्स का वर्ग संघर्ष भारत में असफल रहा क्योंकि यहाँ ‘जाति’ वर्ग चेतना को पनपने ही नहीं देती। अम्बेडकर का यह सुझाव कि जाति को मिटाए बिना कोई भी आर्थिक क्रांति सफल नहीं हो सकती, आज भी उतना ही सत्य है।
यदि हमें इस जंजाल से मुक्ति पानी है, तो हमें केवल कानूनों पर निर्भर नहीं रहना होगा। कानून केवल अपराधी को सजा दे सकता है, लेकिन समाज की मानसिकता को नहीं बदल सकता। इसके लिए एक व्यापक सांस्कृतिक और शैक्षिक क्रांति की आवश्यकता है।
अंतर-जातीय विवाहों को सामाजिक स्तर पर स्वीकार्यता मिलनी चाहिए ताकि रक्त की शुद्धता का वह ब्राह्मणवादी मिथक टूट सके। जब तक विवाह की संस्था जाति के नियंत्रण में रहेगी, तब तक समाज का एकीकरण असंभव है।
जाति व्यवस्था ब्राह्मणवादी मानसिकता द्वारा सृजित वह विषैला वृक्ष है जिसकी जड़ें हमारी परंपराओं, धर्मग्रंथों और सामाजिक व्यवहार में बहुत गहरी हैं। यह भारत के माथे पर एक ऐसा कलंक है जो हमें वैश्विक मंच पर एक आधुनिक राष्ट्र कहलाने से रोकता है। हमें बुद्ध की करुणा, अम्बेडकर के संकल्प और मार्क्स के वैज्ञानिक नजरिए को एक साथ अपनाना होगा। यह समझना अनिवार्य है कि जाति का विनाश केवल दलितों की जरूरत नहीं है, बल्कि यह पूरे भारतीय समाज के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। जब तक हम अपनी पहचान को अपनी जाति से जोड़कर देखेंगे, तब तक हम एक सच्चे नागरिक के रूप में विकसित नहीं हो पाएंगे।
इस जंजाल को तोड़ने के लिए हमें व्यक्तिगत स्तर पर अपनी श्रेष्ठता के बोध का त्याग करना होगा और सामूहिक स्तर पर संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण की मांग करनी होगी। शिक्षा को केवल साक्षरता तक सीमित न रखकर उसे विवेक और तर्क का अस्त्र बनाना होगा, जो मनुस्मृति जैसे ग्रंथों द्वारा थोपी गई असमानता को चुनौती दे सके। डॉ. अम्बेडकर का वह सपना, जिसमें भारत एक जातिविहीन समाज होगा, तभी साकार हो सकता है जब हम धर्म और परंपरा के नाम पर चली आ रही इस अमानवीय व्यवस्था को जड़ से उखाड़ने का साहस जुटाएं। यह संघर्ष लंबा है, लेकिन भारत के भविष्य के लिए अपरिहार्य है। जाति का अंत ही वास्तविक लोकतंत्र का उदय है, और यही वह रास्ता है जो हमें एक खंडित समाज से एक अखंड राष्ट्र की ओर ले जाएगा। आज के दौर में जब हम डिजिटल इंडिया और वैश्विक शक्ति बनने की बात करते हैं, तब हमें यह स्वीकार करना होगा कि जाति की सड़न के साथ हम अधिक दूर तक नहीं चल सकते। इस जंजाल को खोलना ही होगा, ताकि मानवता अपनी पूरी गरिमा के साथ सांस ले सके और भारत का हर नागरिक बिना किसी हीनता या श्रेष्ठता के बोध के सर उठाकर जी सके।

