अब प्रश्न उठता है कि क्या बिहार सरकार रामफल मंडल को शहीद घोषित कर सकती है। व्यावहारिक और प्रशासनिक स्तर पर इसका उत्तर हाँ है। कानूनी रूप से कोई कठोर बाधा नहीं है, लेकिन प्रक्रिया स्पष्ट नहीं है। चूँकि केंद्रीय स्तर पर शहीद की कोई कानूनी परिभाषा नहीं है इसलिए राज्य सरकार भी किसी व्यक्ति को कानूनी तौर पर शहीद घोषित करने का ऐसा अधिकार पत्र जारी नहीं कर सकती जो अदालत में चुनौती न दिए जा सकने योग्य हो।
विनोद आनंद
सम्पादक अंतर्कथा,
लेखक – बाजपट्टी संग्राम के नायक:रामफल मंडल

पटना के गर्दनीबाग में इन दिनों कुछ युवा धरना पर बैठे हैं। उनकी मांग न तो कोई बड़ा आर्थिक लाभ वाला है और न ही कोई राजनीतिक सत्ता का दावा। वे केवल इतना चाहते हैं कि सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सीतामढ़ी के बाजपट्टी चौक पर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खड़े हुए और बाद में भागलपुर जेल में फाँसी पर झूलने वाले उन्नीस वर्षीय रामफल मंडल को आधिकारिक तौर पर शहीद का दर्जा दिया जाए।
यह मांग सुनने में छोटी लग सकती है, पर इसके भीतर भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था, कानूनी परिभाषाओं की कमी और स्वतंत्रता संग्राम के अधूरे सम्मान की एक बड़ी कहानी छिपी है।
आज जब देश स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव के बाद के वर्षों में आगे बढ़ रहा है, तब भी कई स्थानीय नायक इतिहास की धूल में दबे हुए हैं। रामफल मंडल उन्हीं में से एक हैं। उनकी मांग को केवल भावनात्मक कहकर टाल देना न तो न्यायसंगत है और न ही इतिहास के प्रति हमारी जिम्मेदारी का निर्वाह।
स्वतंत्रता संग्राम की कहानी लिखते समय हम अक्सर बड़े नामों पर ही रुक जाते हैं। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु जैसे नाम राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बन चुके हैं। पर बिहार की धरती पर 1942 के आंदोलन में सैकड़ों युवक और किशोर ऐसे थे जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई और अपनी जान गंवाई। रामफल मंडल उनमें से एक थे।
उस समय सीतामढ़ी जिले के बाजपट्टी चौक पर उग्र भीड़ ने तत्कालीन एसडीओ हरदीप नारायण सिंह, पुलिस इंस्पेक्टर राममूर्ति झा तथा अन्य दो सरकारी कर्मचारियों की हत्या कर दी थी। अंग्रेजी प्रशासन ने इसे विद्रोह और हत्या का मामला माना। नतीजतन उन्नीस वर्ष दो महीने के रामफल मंडल को 23 अगस्त 1943 को भागलपुर जेल में फाँसी दे दी गई। वे उस समय की अंग्रेजी व्यवस्था की नजर में अपराधी थे, पर स्वतंत्र भारत की नजर में वे स्वतंत्रता सेनानी थे।
दुर्भाग्य से आजादी के बाद बनी सरकारों ने उनके जैसे सैकड़ों युवाओं को इतिहास में उचित स्थान दिलाने का यथोचित प्रयास नहीं किया। न उनके नाम पर स्मारक बने, न वार्षिक श्रद्धांजलि के कार्यक्रम हुए और न ही उन्हें आधिकारिक दस्तावेजों में शहीद कहा गया। यही चुप्पी आज गर्दनीबाग के धरने में मुखर हो रही है।
इस मांग को समझने के लिए सबसे पहले हमें “शहीद” शब्द की कानूनी स्थिति को समझना होगा। भारत सरकार और गृह मंत्रालय के आधिकारिक रुख के अनुसार भारतीय कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था में ऐसा कोई औपचारिक प्रावधान या विशिष्ट कानूनी श्रेणी नहीं है जिसके तहत स्वतंत्रता सेनानियों को शहीद घोषित किया जाता हो। विभिन्न समयों पर दाखिल आरटीआई के जवाब में गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि सरकार के पास ऐसा कोई आधिकारिक रिकॉर्ड या नियम नहीं है जो किसी स्वतंत्रता सेनानी को कानूनी तौर पर शहीद का दर्जा देता हो।
संसद में भी कई बार यह बात कही गई है कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का दर्जा किसी भी सरकारी उपाधि, प्रमाण पत्र या रिकॉर्ड से कहीं ऊपर है। पूरा देश उन्हें हमेशा से राष्ट्रीय नायक और शहीद मानता आया है। सरकार का यह स्पष्ट मानना रहा है कि उनका सर्वोच्च बलिदान किसी कागजी अभिलेख का मोहताज नहीं है।
यही तर्क पटना सचिवालय गोलीकांड के सात शहीदों पर भी लागू होता है। उनके लिए भी कोई पृथक शहीद प्रमाण पत्र या विशिष्ट अधिसूचना नहीं है। फिर भी बिहार सरकार हर साल ग्यारह अगस्त को सप्त शहीद दिवस के रूप में राजकीय समारोह आयोजित करती है। बिहार गजट और पर्यटन विभाग के दस्तावेजों में उन्हें अमर शहीद कहा जाता है। पंद्रह अगस्त 1947 को आधारशिला रखी गई और चौबीस अक्टूबर 1956 को राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्मारक का अनावरण किया। ये सभी आधिकारिक मान्यता के प्रतीक माने जाते हैं।
इससे एक बात साफ होती है कि भारत में शहीद शब्द का दर्जा कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक, ऐतिहासिक और प्रशासनिक-राजनीतिक मान्यता पर आधारित है। कोई केंद्रीय या राज्य कानून किसी व्यक्ति को शहीद घोषित करने की स्पष्ट शक्ति किसी प्राधिकरण को नहीं सौंपता। यही कानूनी खामी रामफल मंडल के मामले को जटिल बनाती है, पर साथ ही यह भी दर्शाती है कि बाधा अजेय नहीं है।
भगत सिंह के उदाहरण से तुलना करने पर स्थिति और स्पष्ट हो जाती है। ब्रिटिश काल में भगत सिंह को विद्रोही और अपराधी माना गया था। आजादी के बाद भी उन पुराने औपनिवेशिक कानूनी दस्तावेजों को बदला नहीं गया। फिर भी राष्ट्र उन्हें अमर शहीद मानता है। उनके जन्मदिन और शहादत दिवस पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और राज्य सरकारें श्रद्धांजलि अर्पित करती हैं।
स्मारक, संग्रहालय, डाक टिकट, पाठ्यपुस्तकें और फिल्में उनकी शहादत को स्थापित करती हैं। संसद में बार-बार यह कहा गया कि उनका दर्जा किसी सरकारी दस्तावेज से ऊपर है। रामफल मंडल के मामले में अंतर यह है कि उनका बलिदान स्थानीय स्तर का है। घटना में सरकारी कर्मचारियों की हत्या शामिल होने के कारण कुछ प्रशासनिक संवेदनशीलता भी पैदा हो सकती है। पर मूल सिद्धांत एक ही है। कानूनी परिभाषा का अभाव दोनों मामलों में समान है।
यदि भगत सिंह को बिना किसी कानूनी प्रमाण पत्र के शहीद माना जा सकता है तो रामफल मंडल के लिए भी वही तर्क लागू होना चाहिए। अंतर केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति और स्थानीय प्रशासनिक प्राथमिकता का है।जब राष्ट्रीय स्तर पर बड़े नामों के लिए कागजी प्रमाण की जरूरत नहीं समझी गई तो स्थानीय नायकों के लिए भी उसी भावना को विस्तार दिया जाना चाहिए।
अब प्रश्न उठता है कि क्या बिहार सरकार रामफल मंडल को शहीद घोषित कर सकती है। व्यावहारिक और प्रशासनिक स्तर पर इसका उत्तर हाँ है। कानूनी रूप से कोई कठोर बाधा नहीं है, लेकिन प्रक्रिया स्पष्ट नहीं है। चूँकि केंद्रीय स्तर पर शहीद की कोई कानूनी परिभाषा नहीं है इसलिए राज्य सरकार भी किसी व्यक्ति को कानूनी तौर पर शहीद घोषित करने का ऐसा अधिकार पत्र जारी नहीं कर सकती जो अदालत में चुनौती न दिए जा सकने योग्य हो।
यदि कोई अधिसूचना जारी की जाती है तो वह शहीद शब्द का प्रयोग कर सकती है, लेकिन वह कानूनी दर्जा नहीं बल्कि प्रशासनिक मान्यता होगी। ब्रिटिश काल के मुकदमे और फाँसी के दस्तावेज अभी भी मौजूद हैं। इन्हें उलट नहीं किया जा सकता, लेकिन इन्हें ऐतिहासिक संदर्भ में व्याख्यायित किया जा सकता है जैसा भगत सिंह के मामले में किया गया।
बिहार में स्वतंत्रता सेनानियों को शहीद घोषित करने की कोई मानक प्रक्रिया या गजट अधिसूचना का मॉडल उपलब्ध नहीं है। सप्त शहीद के मामले में भी कोई पृथक प्रमाण पत्र नहीं बल्कि राजकीय समारोह और स्मारक की मान्यता है। घटना में सरकारी कर्मचारियों की हत्या शामिल होने के कारण कुछ अधिकारी हिंसा को प्रोत्साहन के आरोप से बचने के लिए सतर्क रह सकते हैं। पर स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में यह तर्क कमजोर है क्योंकि 1942 का पूरा आंदोलन औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ था।
राज्य सरकार यदि चाहे तो कई व्यावहारिक कदम उठा सकती है। गृह विभाग की स्वतंत्रता सेनानी शाखा या कैबिनेट सचिवालय के माध्यम से एक प्रस्ताव पारित कर रामफल मंडल को अमर शहीद या स्वतंत्रता संग्राम के शहीद के रूप में मान्यता दी जा सकती है। यह सप्त शहीद दिवस के मॉडल पर हो सकता है। बाजपट्टी चौक या सीतामढ़ी में स्मारक का शिलान्यास, वार्षिक श्रद्धांजलि समारोह और राज्य प्रोटोकॉल में शामिल करना संभव है। बिहार पर्यटन विभाग के दस्तावेजों और स्कूल पाठ्यक्रम में नाम शामिल किया जा सकता है। यदि परिवार मौजूद है तो स्वतंत्रता सेनानी पेंशन योजनाओं के अंतर्गत विचार किया जा सकता है। ये कदम कानूनी रूप से शहीद शब्द का इस्तेमाल करते हुए भी किए जा सकते हैं क्योंकि कोई कानून इसे प्रतिबंधित नहीं करता है।
सप्त शहीदों के मामले में बिहार सरकार पहले ही अमर शहीद शब्द का आधिकारिक प्रयोग कर रही है। वही प्रथा रामफल मंडल के लिए भी अपनाई जा सकती है।
इस पूरे प्रसंग की सबसे बड़ी खामी यह है कि स्वतंत्र भारत ने औपनिवेशिक कानूनी और प्रशासनिक ढाँचे को बड़े पैमाने पर जारी रखा। शहीद जैसे भावनात्मक और ऐतिहासिक महत्व वाले शब्द को कानूनी रूप से परिभाषित नहीं किया गया। परिणामस्वरूप हर नया मामला व्यक्तिगत राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर हो जाता है। अनाम शहीदों की सूची अधूरी रह जाती है। युवा पीढ़ी को लगता है कि सरकार उनके स्थानीय नायकों को नजरअंदाज कर रही है।
यह व्यवस्थागत कमी है, किसी एक व्यक्ति या दल की नहीं। आजादी के बाद की सरकारों ने जनता के दिलों में स्थापित स्थान को पर्याप्त मान लिया और कानूनी स्पष्टता की आवश्यकता महसूस नहीं की। राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने कई अध्यायों को अधूरा छोड़ दिया। औपनिवेशिक मानसिकता ने पुरानी ब्रिटिश प्रशासनिक और कानूनी प्रणालियों को जारी रखा जिससे इतिहास के कई अध्यायों में तकनीकी रूप से सुधार नहीं किया जा सका।
*क्या कर सकती है बिहार सरकार..?*
समाधान की दिशा में सबसे पहले बिहार सरकार को एक उच्च-स्तरीय समिति गठित करनी चाहिए जिसमें इतिहासकार, स्वतंत्रता सेनानी शाखा के अधिकारी और स्थानीय प्रतिनिधि शामिल हों। समिति रामफल मंडल की घटना की ऐतिहासिक पुष्टि करे और सिफारिश करे। सप्त शहीद मॉडल का अनुसरण करते हुए गजट में राजकीय समारोह का संकल्प पारित किया जा सकता है। स्मारक का निर्माण या नामकरण किया जा सकता है।
वार्षिक रामफल मंडल शहीद दिवस घोषित किया जा सकता है। आधिकारिक बयानों में अमर शहीद शब्द का प्रयोग शुरू किया जा सकता है। राज्य सरकार केंद्र को सुझाव दे सकती है कि स्वतंत्रता सेनानियों के लिए शहीद शब्द की एक प्रशासनिक परिभाषा या दिशानिर्देश तैयार किए जाएँ। इससे भविष्य में ऐसे विवाद कम होंगे। ब्रिटिश रिकॉर्ड, स्थानीय लोककथाएँ और परिवार के दस्तावेजों को एकत्र कर आधिकारिक इतिहास लिखा जाए। इससे मांग को मजबूत आधार मिलेगा।
अंततः यह राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रश्न है। यदि राज्य सरकार जनता की भावना को महत्व देती है तो कोई कानूनी बाधा स्थायी नहीं है। भगत सिंह के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर जो सम्मान है वही स्थानीय स्तर पर रामफल मंडल के लिए संभव है। 1942 के सैकड़ों अनाम बलिदानियों में से एक रामफल मंडल को सम्मानित करना न केवल उनके परिवार और स्थानीय समाज के प्रति न्याय होगा बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के अधूरे अध्यायों को पूरा करने की दिशा में एक सार्थक कदम भी होगा।
सरकार यदि इस मांग को स्वीकार करती है तो वह केवल एक व्यक्ति को नहीं बल्कि इतिहास के उन सभी अज्ञात योद्धाओं को सम्मान देगी जिनके बलिदान पर आज की स्वतंत्रता टिकी हुई है।
गर्दनीबाग में बैठे युवा केवल एक नाम की मांग नहीं कर रहे। वे इतिहास की उस चुप्पी को तोड़ने की मांग कर रहे हैं जो आजादी के बाद भी जारी रही। वे चाहते हैं कि राज्य सरकार अपने दस्तावेजों में, अपने समारोहों में और अपनी स्मृति में उन युवाओं को जगह दे जिन्होंने अपनी जान देकर इस धरती को स्वतंत्र बनाया।
कानूनी परिभाषा का अभाव कोई स्थायी दीवार नहीं है। सप्त शहीदों और भगत सिंह के उदाहरण साफ बताते हैं कि आधिकारिक मान्यता स्मारक, राजकीय समारोह, गजट अधिसूचना और निरंतर श्रद्धांजलि के माध्यम से दी जा सकती है भले ही कोई शहीद प्रमाण पत्र न हो। बिहार सरकार के पास तकनीकी तौर पर कोई ऐसी दिक्कत नहीं है जो इस मांग को पूरी तरह असंभव बना दे। वास्तविक बाधा केवल इच्छाशक्ति और प्राथमिकता की है। यदि सरकार इस दिशा में आगे बढ़ती है तो वह न केवल रामफल मंडल को सम्मान देगी बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश भी देगी कि इतिहास के छोटे-छोटे अध्याय भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने बड़े नाम।
स्वतंत्रता संग्राम केवल कुछ चुनिंदा चेहरों की कहानी नहीं है। वह उन हजारों अनाम युवकों की कहानी भी है जिन्होंने बिना किसी प्रसिद्धि की चाह के अपनी जान न्योछावर कर दी। रामफल मंडल उनमें से एक थे। उन्हें शहीद का दर्जा देना न तो कोई कानूनी चमत्कार है और न ही कोई असंभव कार्य। यह केवल इतिहास के प्रति हमारी ईमानदारी का प्रश्न है। सरकार को इस ईमानदारी का परिचय देना चाहिए।

