यह स्पष्ट है कि भारतीय विवाह संस्था एक संक्रमण काल से गुजर रही है। संवाद की कमी, विश्वास का टूटना और भावनात्मक दूरी रिश्तों को अपराध की ओर धकेल रही है। यह समय है जब समाज, परिवार और सरकार मिलकर आत्ममंथन करें। हमें रिश्तों को संवाद, सम्मान और प्रेम से मजबूत करना होगा। यदि रिश्ता टूटने की कगार पर है, तो उसका सम्मानपूर्वक अंत किया जाना चाहिए, न कि धोखे, हत्या और साजिश के रास्ते पर चला जाए।
(विनोद आंनद)
भा रतीय समाज में विवाह को हमेशा से एक पवित्र और अटूट बंधन माना गया है, जो विश्वास और साझेदारी की नींव पर टिका है। लेकिन हाल के वर्षों में देश के अलग-अलग हिस्सों से लगातार ऐसी हृदय विदारक घटनाएँ सामने आ रही हैं, जहाँ पत्नियों द्वारा अपने प्रेमियों के साथ मिलकर पतियों की निर्मम हत्या की जा रही है। ये घटनाएँ न केवल रिश्तों की बुनियाद को हिला रही हैं, बल्कि हमारी सामाजिक मानसिकता, पारिवारिक संरचना और सांस्कृतिक मूल्यों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट चौंकाने वाली है। पिछले पाँच वर्षों में केवल पाँच राज्यों — उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश — में 785 पतियों की हत्या उनकी पत्नियों या उनके प्रेमियों द्वारा की गई है। उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक 275, बिहार में 186, राजस्थान में 138, महाराष्ट्र में 100 और मध्य प्रदेश में 87 मामले दर्ज हुए हैं। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि यह प्रवृत्ति कोई इक्का-दुक्का मामला नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक समस्या का रूप ले चुकी है। लालच, स्वतंत्रता की चाह, या मानसिक विकृति — इन हत्याओं के पीछे कई कारण सामने आ रहे हैं। कई मामलों में पत्नियाँ सुनियोजित तरीके से हत्या को अंजाम देती हैं, उसे आत्महत्या का रूप देने की कोशिश करती हैं, और डिजिटल साक्ष्य मिटाने का प्रयास करती हैं, लेकिन फॉरेंसिक और तकनीकी जाँच से सच्चाई सामने आ जाती है।
हाल ही में इंदौर का राजा रघुवंशी हत्याकांड, जहाँ नवविवाहिता सोनम ने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या की, या मेरठ के सौरभ की हत्या, जहाँ पत्नी मुस्कान ने प्रेमी के साथ मिलकर पति को मार डाला — ऐसी घटनाएँ पूरे देश को झकझोर कर रख रही हैं। तेलंगाना, महाराष्ट्र, बिहार, तमिलनाडु और दिल्ली जैसे राज्यों में भी संपत्ति विवाद, प्रेम-संबंध या ‘स्वतंत्रता’ की चाह के चलते ऐसी वारदातें दर्ज हुई हैं।
इन घटनाओं के बाद समाज में एक दोहरी बहस छिड़ गई है। एक वर्ग इसे महिलाओं की बढ़ती स्वतंत्रता के दुरुपयोग से जोड़ता है, तो दूसरा वर्ग घरेलू हिंसा, पति के अत्याचार और महिलाओं की आवाज़ को अनसुना किए जाने को इन अपराधों का कारण मानता है। सोशल मीडिया पर जहाँ पत्नियों का मज़ाक उड़ाया जा रहा है, वहीं छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के आंकड़े बताते हैं कि महिलाएँ भी घरेलू हिंसा की शिकार हो रही हैं — पिछले 115 दिनों में 30 पत्नियों की हत्या उनके पतियों ने कर दी। यह दर्शाता है कि समस्या सिर्फ एकतरफा नहीं है।
मनोवैज्ञानिक इसे महिलाओं के भीतर दबे असंतोष, पहचान की असुरक्षा और सामाजिक दबाव का परिणाम मानते हैं। जब संवाद और समाधान के सभी रास्ते बंद हो जाते हैं, तो कुछ महिलाएँ अपराध का रास्ता चुन लेती हैं। हालांकि, कानून विशेषज्ञ स्पष्ट रूप से कहते हैं कि कारण चाहे जो भी हो, हत्या का कोई औचित्य नहीं है। अत्याचार का शिकार होने पर भी कानून और न्याय का रास्ता खुला है, और हत्या एक जघन्य अपराध है जिसकी सज़ा मिलनी ही चाहिए।
इस गंभीर स्थिति में मीडिया, समाज और सरकार, तीनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। मीडिया को ऐसी घटनाओं को सनसनीखेज बनाने से बचना चाहिए और संतुलित रिपोर्टिंग करनी चाहिए, जो न तो महिलाओं को पूरी तरह दोषी ठहराए और न ही पूरी तरह मासूम दिखाए। सरकार को भी इसे केवल पुलिसिया मामला न मानकर एक गहरी सामाजिक समस्या के रूप में देखना चाहिए। स्कूलों, कॉलेजों और समाज में विवाह पूर्व काउंसलिंग, भावनात्मक शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य पर काम करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
यह स्पष्ट है कि भारतीय विवाह संस्था एक संक्रमण काल से गुजर रही है। संवाद की कमी, विश्वास का टूटना और भावनात्मक दूरी रिश्तों को अपराध की ओर धकेल रही है। यह समय है जब समाज, परिवार और सरकार मिलकर आत्ममंथन करें। हमें रिश्तों को संवाद, सम्मान और प्रेम से मजबूत करना होगा। यदि रिश्ता टूटने की कगार पर है, तो उसका सम्मानपूर्वक अंत किया जाना चाहिए, न कि धोखे, हत्या और साजिश के रास्ते पर चला जाए। भारतीय परंपरा और संस्कृति की मजबूती तभी कायम रहेगी, जब हम रिश्तों में संवाद, संवेदनशीलता और न्याय को प्राथमिकता देंगे। नई पीढ़ी को यह सिखाना होगा कि अधिकारों के साथ ज़िम्मेदारी भी ज़रूरी है, और रिश्तों में संकट आने पर हिंसा नहीं, बल्कि समाधान और संवाद ही सच्चा मार्ग है। यही सामाजिक जागरूकता और संवेदनशीलता आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
