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संपादकीय: आत्मनिर्भर भारत बनाम जमीनी हकीकत – विकल्पों का अभाव और सरकार की रणनीति

ByBinod Anand

Jun 2, 2025

यदि हम विदेशी सामान बेचना बंद कर देते हैं, तो क्या हमारे पास पर्याप्त और प्रतिस्पर्धी स्वदेशी विकल्प उपलब्ध हैं? वर्तमान परिदृश्य में, यह एक जटिल प्रश्न है जिसका उत्तर देना आसान नहीं है।

(विनोद आनंद)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘आत्मनिर्भर भारत’ का नारा देश को विदेशी उत्पादों पर निर्भरता से मुक्ति दिलाने की दिशा में एक स्वागत योग्य कदम है। हाल ही में एक सभा में उन्होंने व्यापारियों से विदेशी सामान न बेचने की कसम खाने का आह्वान किया, जो उनकी इस महत्वाकांक्षी दृष्टि को दर्शाता है। यह सोच बिल्कुल सही है कि होली के रंग-पिचकारी से लेकर दिवाली की बिजली की झालर तक, हमारी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हम बड़े पैमाने पर विदेशों पर निर्भर हैं, और इसमें चीन का दबदबा सर्वोपरि है।

आज चीन से हमारा आयात 100 अरब डॉलर से अधिक हो गया है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, उर्वरक, रसायन और यहां तक कि सौर मॉड्यूल जैसे महत्वपूर्ण उत्पाद शामिल हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि चीन ने कम श्रम लागत और तकनीकी उन्नति के दम पर विश्व अर्थव्यवस्था में एक बड़ी जगह बनाई है, और भारत को इससे सीखने की जरूरत है।

सरकार की ‘नींद खुली’ यह देखकर अच्छा लगता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ व्यापारियों को कसम दिलाना ही आत्मनिर्भरता की कुंजी है?

यदि हम विदेशी सामान बेचना बंद कर देते हैं, तो क्या हमारे पास पर्याप्त और प्रतिस्पर्धी स्वदेशी विकल्प उपलब्ध हैं? वर्तमान परिदृश्य में, यह एक जटिल प्रश्न है जिसका उत्तर देना आसान नहीं है।

भारत चीन से भारी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पाद (विशेषकर मोबाइल फोन), कार और मोटरसाइकिल के पुर्जे, कंप्यूटर के पुर्जे, सौर मॉड्यूल और दूरसंचार उपकरण आयात करता है। इन उत्पादों की भारत में मांग बहुत अधिक है और चीन इन्हें कम लागत पर उपलब्ध कराता है। हमारे देश में इनके निर्माण की लागत अधिक है, जिससे चीनी उत्पाद बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बन जाते हैं।

यदि व्यापारी विदेशी सामान बेचना बंद कर दें, तो बाजार में इन उत्पादों की उपलब्धता का क्या होगा? क्या रातों-रात भारतीय उद्योग इतनी बड़ी मांग को पूरा करने में सक्षम हो जाएंगे? शायद नहीं। इसके परिणामस्वरूप बाजार में इन उत्पादों की भारी कमी हो सकती है, जिससे कीमतें बढ़ सकती हैं और उपभोक्ताओं को असुविधा हो सकती है।

सरकार को इस ‘आत्मनिर्भरता’ की दिशा में बढ़ने से पहले एक स्पष्ट और विस्तृत रणनीति प्रस्तुत करनी होगी कि स्वदेशी उत्पादों की उपलब्धता कैसे सुनिश्चित की जाएगी।

यहां कुछ प्रमुख बिंदु हैं जिन पर सरकार को ध्यान देना होगा:

औद्योगिक विकास के लिए अनुकूल माहौल: हमें भारत में उद्योगों के लिए एक ऐसा वातावरण बनाना होगा जहां उत्पादन लागत कम हो और वे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें। इसमें भूमि अधिग्रहण, श्रम कानूनों में सुधार, बिजली की सस्ती उपलब्धता और लॉजिस्टिक्स को सुदृढ़ करना शामिल है।

टेक्स नीति में सुधार: एक ऐसी कर नीति की आवश्यकता है जो घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा दे और आयात पर निर्भरता कम करे। इसमें विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहन देना और आयातित तैयार माल पर उचित शुल्क लगाना शामिल हो सकता है, लेकिन यह सुनिश्चित करना होगा कि इसका अंतिम बोझ उपभोक्ताओं पर न पड़े।

अनुसंधान और विकास में निवेश: चीन की सफलता का एक बड़ा कारण उसकी तकनीकी उन्नति है। भारत को भी अनुसंधान और विकास में भारी निवेश करना होगा ताकि हम अत्याधुनिक तकनीकें विकसित कर सकें और विदेशी तकनीकों पर हमारी निर्भरता कम हो सके। इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, सौर ऊर्जा और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

कौशल विकास: देश में कुशल कार्यबल की कमी भी एक बड़ी चुनौती है। विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए हमें बड़ी संख्या में कुशल श्रमिकों की आवश्यकता होगी।

आपूर्ति श्रृंखला का विविधीकरण: चीन पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने के लिए, हमें अन्य मित्र देशों जैसे रूस, अमेरिका, यूएई आदि के साथ भी अपनी आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना होगा।

लघु और मध्यम उद्योगों को बढ़ावा: आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए लघु और मध्यम उद्योगों (एसएमई) की भूमिका महत्वपूर्ण है। उन्हें वित्तीय सहायता, तकनीकी मार्गदर्शन और बाजार पहुंच प्रदान करने की आवश्यकता है।

केवल नारे लगाने या भावनात्मक अपील करने से आत्मनिर्भरता का लक्ष्य प्राप्त नहीं होगा। सरकार को एक स्पष्ट रोडमैप के साथ सामने आना होगा कि कैसे वह स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा देगी, विदेशी उत्पादों पर निर्भरता कम करेगी और भारतीय बाजार में पर्याप्त और प्रतिस्पर्धी स्वदेशी विकल्प उपलब्ध कराएगी।

जब तक ऐसा नहीं होता, व्यापारियों से विदेशी सामान न बेचने की कसम लेना एक नेक इरादा मात्र रह जाएगा, जिसका जमीन पर क्रियान्वयन बेहद चुनौतीपूर्ण होगा। हमें यह समझना होगा कि आत्मनिर्भरता एक लंबी और सतत प्रक्रिया है जिसके लिए सरकार, उद्योग और उपभोक्ताओं के समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है।

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