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  • Wed. Jun 10th, 2026

AVN Antarkatha

पुस्तक समीक्षा – “गुज़रे पल — मेरा गाँव मंझरिया”

ByBinod Anand

Jun 10, 2026

पुस्तक :“गुज़रे पल — मेरा गाँव मंझरिया”
लेखक– गार्गी कपर्दी संपादक
शिवोहम प्रकाशन कोलकाता/ हैदराबाद
[email protected]

नुष्य का जीवन स्मृतियों की एक लंबी यात्रा है। हम जहाँ भी जाएँ, चाहे समय कितना ही आगे क्यों न बढ़ जाए, मन बार-बार उन पलों में लौटता है जहाँ से जीवन ने पहली बार अपनी आँखें खोली थीं — अपने गाँव, अपनी मिट्टी, अपने लोगों के बीच। वही बचपन की गलियाँ, वही कच्चे रास्ते, वही आँगन की हँसी, और वही अपनापन, जो जीवन की सबसे बड़ी पूँजी बन जाता है।

“गुज़रे पल — मेरा गाँव मंझरिया” ऐसी ही स्मृतियों की एक सजीव और संवेदनशील प्रस्तुति है। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि उस भावना की अभिव्यक्ति है जो हर उस इंसान के भीतर कहीं न कहीं जीवित रहती है, जिसने अपने गाँव की गोद में बचपन बिताया है। यह पुस्तक पाठक को एक ऐसी दुनिया में ले जाती है, जहाँ सादगी में सुख है, अभाव में अपनापन है, और संघर्षों में भी एक अनोखी मुस्कान छिपी हुई है।
इस कृति में लेखक ने अपने गाँव मंझरिया के जीवन को बहुत ही आत्मीयता के साथ चित्रित किया है।

यहाँ केवल घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि उन घटनाओं से जुड़े भाव हैं — वे भाव जो सीधे हृदय को छूते हैं। बचपन की निश्छलता, मिट्टी की खुशबू, और लोगों के बीच का सच्चा प्रेम इस पुस्तक के हर पन्ने में जीवंत हो उठता है।

गाँव केवल एक स्थान नहीं होता, वह एक जीवन शैली होता है। वहाँ की सुबहें सूरज की पहली किरण के साथ शुरू होती हैं, और शामें ढलते हुए दिन के साथ एक शांत संतोष का अनुभव कराती हैं। खेत-खलिहानों की हरियाली, पक्षियों की चहचहाहट, और त्योहारों की रौनक — ये सब मिलकर एक ऐसी दुनिया रचते हैं, जो शहरों की भागदौड़ से बिल्कुल अलग होती है।

इस पुस्तक में लेखक ने अपने बचपन की उन्हीं सरल और सुंदर यादों को सहेजा है। वह समय जब जीवन में किसी प्रकार की जटिलता नहीं थी, जब छोटी-छोटी खुशियाँ ही सबसे बड़ा आनंद देती थीं। दोस्तों के साथ खेलना, खेतों में दौड़ना, तालाब के किनारे बैठना, और परिवार के साथ बिताए गए पल — ये सब स्मृतियाँ आज भी उतनी ही ताज़ा हैं।

लेकिन यह कहानी केवल सुखद यादों तक सीमित नहीं है। यह उस कठोर सच्चाई को भी उजागर करती है, जो समय के साथ कई गाँवों की नियति बन गई — गंडक नदी की विनाशकारी कटान। जिस मिट्टी ने जीवन को जन्म दिया, वही मिट्टी धीरे-धीरे नदी में समाती चली गई। घर उजड़ गए, सपने बिखर गए, और लोगों को अपनी जड़ों से दूर होना पड़ा।

लेखक ने इस पीड़ा को बहुत ही सच्चाई और संवेदनशीलता के साथ व्यक्त किया है। यह केवल भौतिक नुकसान की कहानी नहीं है, बल्कि उस भावनात्मक टूटन की कहानी है, जिसे शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं होता।

विस्थापन केवल स्थान का परिवर्तन नहीं होता, यह जीवन की दिशा बदल देने वाला अनुभव होता है। अपने घर, अपनी जमीन, अपने लोगों को छोड़कर एक नए स्थान पर जाना — यह किसी भी व्यक्ति के लिए अत्यंत कठिन होता है। इस पुस्तक में लेखक ने इस दर्द को बहुत ही मार्मिक तरीके से प्रस्तुत किया है।

जब एक गाँव उजड़ता है, तो केवल घर नहीं टूटते, बल्कि उन घरों में बसे सपने, यादें और रिश्ते भी बिखर जाते हैं। नई जगह पर जीवन की शुरुआत करना एक चुनौती बन जाती है, जहाँ हर दिन एक संघर्ष होता है — पहचान बनाने का, अपने अस्तित्व को बनाए रखने का।
इसके बावजूद, इस कृति में निराशा नहीं है। इसमें एक उम्मीद है — आगे बढ़ने की, फिर से जीवन को सँवारने की। लेखक यह दिखाते हैं कि चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, मनुष्य के भीतर आगे बढ़ने की शक्ति हमेशा बनी रहती है।

यह पुस्तक हमें यह सोचने पर भी मजबूर करती है कि विकास और आधुनिकता की दौड़ में हम क्या खो रहे हैं। हम सुविधाओं के पीछे भागते-भागते अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं, जबकि गाँव आज भी भारतीय संस्कृति, परंपराओं और मानवीय मूल्यों के सबसे मजबूत आधार हैं।

“गुज़रे पल — मेरा गाँव मंझरिया” केवल एक संस्मरण नहीं है, यह एक भावनात्मक यात्रा है। यह पाठक को उसके अपने अतीत से जोड़ती है, उसे उन पलों की याद दिलाती है जिन्हें वह शायद समय के साथ कहीं पीछे छोड़ आया है।

यह पुस्तक हमें अपने माता-पिता के त्याग, अपने बचपन की मासूमियत, और अपने सपनों की सच्चाई से रूबरू कराती है। यह हमें याद दिलाती है कि हमारी पहचान केवल वर्तमान से नहीं, बल्कि हमारे अतीत और हमारी जड़ों से भी बनती है।

लेखक की सरल और सहज भाषा इस कृति को और भी प्रभावशाली बनाती है। हर शब्द में सच्चाई है, हर पंक्ति में भावना है, और हर पृष्ठ में एक कहानी छिपी हुई है जो पाठक के मन को छू जाती है।
अंततः, यह कृति एक संदेश देती है — अपनी जड़ों को कभी मत भूलिए। चाहे जीवन आपको कहीं भी ले जाए, अपनी मिट्टी, अपने गाँव और अपने लोगों से जुड़ाव ही आपको सच्चा संतोष देता है।

आशा है कि “गुज़रे पल — मेरा गाँव मंझरिया” पाठकों के हृदय में संवेदना, स्मृति और आत्मीयता का भाव जगाएगी, और उन्हें अपने अतीत को संजोने तथा अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देगी।

शिवोहम प्रकाशन
कोलकाता / हैदराबाद
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