धनबाद : अंग्रेजों को चकमा देकर छद्म वेश में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के कोलकाता से निकलने और फिर धनबाद के गोमो जंक्शन से ऐतिहासिक ‘कालका मेल’ में सवार होने की कहानी तो लगभग पूरा देश जानता है। लेकिन इस महान निष्क्रमण (Great Escape) के पीछे धनबाद शहर के पुराना बाजार की जो बेहद महत्वपूर्ण भूमिका रही है, उससे आज भी बहुत से लोग अनजान हैं।

गोमो से ट्रेन पकड़ने से पहले नेताजी अंग्रेजों की पैनी नजरों से बचते हुए धनबाद के पुराना बाजार स्थित ‘दरी मोहल्ला’ पहुंचे थे। उस दौर में यहाँ ‘कासमो पालिटन होटल’ हुआ करता था, जो स्वतंत्रता सेनानियों की गुप्त बैठकों और रणनीति तय करने का सबसे बड़ा गढ़ माना जाता था। विशेषकर बंगाल से आने वाले क्रांतिकारियों के लिए यह होटल एक बेहद सुरक्षित और अहम ठिकाना था।

कासमो पालिटन होटल और सेनानियों का जमघट
इस होटल का संचालन स्वतंत्रता सेनानी ‘बहरा काकू’ करते थे। होटल में ठहरने वाले स्वतंत्रता सेनानी पुराना बाजार रेलवे फाटक के पास बने एक चबूतरे पर बैठकर आंदोलन की भावी रणनीतियाँ बनाते थे। इस पूरी प्रक्रिया का संचालन बहरा काकू ही किया करते थेनेताजी जब कोलकाता से निकलकर दरी मोहल्ला पहुंचे, तो उन्होंने कासमो पालिटन होटल में ही शरण ली। वहाँ वे बहरा काकू से मिले और दोनों के बीच लंबी गुप्त बातचीत हुई। इसी दौरान एक और स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर प्रसाद भी नेताजी के संपर्क में आए।

रात का विश्राम और साधारण भोजन
डॉक्टर सतीश चंद्र (स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर प्रसाद के पुत्र) अपने पिता से सुनी बातों को याद करते हुए बताते हैं कि नेताजी ने उस रात पुराना बाजार के उसी होटल में विश्राम किया था। उस दौरान ठाकुर प्रसाद की माँ, अकली देवी ने नेताजी के लिए अपने हाथों से सादा भोजन बनाया था।
भोजन करने के बाद नेताजी ने रात भर वहाँ आराम किया। अगले दिन तड़के लगभग सुबह 4:30 से 5:00 बजे के बीच, योजना के अनुसार छोटू साव नामक व्यक्ति से बैलगाड़ी मंगवाई गई। पुराना बाजार से उस वक्त मवेशियों का चारा लेकर कई बैलगाड़ियां निकलती थीं। नेताजी किसी को शक न हो, इसलिए ठाकुर प्रसाद और बहरा काकू के साथ चारा ले जा रही उन्हीं बैलगाड़ियों में से एक पर सवार होकर गोमो की ओर रवाना हो गए।
लोको बाजार से कालका मेल का सफर
गोमो पहुंचने के बाद, कालका मेल में सवार होने से ठीक पहले नेताजी गोमो के लोको बाजार स्थित ‘अब्दुल्लाह’ नामक व्यक्ति के घर पर रुके। वहाँ उन्होंने अपने वस्त्र बदले और एक काबुलीवाले (पेशावरी) की पोशाक धारण की। उस जोखिम भरे सफर में भी ठाकुर प्रसाद और बहरा काकू लगातार उनके साथ डटे रहे। इसके बाद नेताजी कालका मेल पर सवार होकर पेशावर के लिए निकल गए और स्वतंत्रता संग्राम का एक नया स्वर्णिम अध्याय शुरू हुआ।
सुनहरे अतीत की धरोहर

नेताजी को सुरक्षित रवाना करने के बाद भी ठाकुर प्रसाद और बहरा काकू देश की आजादी की लड़ाई में लगातार सक्रिय रहे। आज जहाँ गोमो के लोको बाजार में अब्दुल्लाह का वह ऐतिहासिक घर सुनहरे अतीत की गवाही दे रहा है, वहीं धनबाद के पुराना बाजार में ठाकुर प्रसाद का वह स्थान भी मौजूद है। फर्क सिर्फ इतना है कि जहाँ कभी सेनानियों का चबूतरा हुआ करता था, वहाँ अब एक दुकान बन चुकी है, जहाँ ठाकुर प्रसाद के पुत्र डॉ. सतीश चंद्र बैठते हैं। डॉ. सतीश आज भी अपने पिता के स्वतंत्रता सेनानी प्रमाणपत्र और उनसे जुड़ी यादों को बड़े गर्व से संजोकर रखे हुए हैं।


