भोगेन्द्र मंडल जी का जीवन-दर्शन बुद्ध और कबीर के विचारों का सुंदर समन्वय है। बुद्ध की करुणा और आत्म-जागरण ने उन्हें संवेदनशील बनाया, जबकि कबीर के दोहे—जात-पात, पाखंड और आडंबर के विरुद्ध—ने उन्हें निर्भीक बनाया। परिवार में शुरू से ही कोई धार्मिक कर्मकांड नहीं था। वे कहते हैं कि उनका पूरा जीवन इस शुद्ध विचारधारा को समर्पित रहा
ह रलाखी के धूल-भरे रास्तों से निकलकर बिहार की सड़कों को मजबूत बनाने वाले एक इंजीनियर, पाखंड की दीवारों को तोड़ने वाले एक विचारक, और विछोह की पीड़ा को रचनात्मकता में बदलने वाले एक संवेदनशील आत्मा—इंजीनियर भोगेन्द्र मंडल जी का जीवन एक अनूठी यात्रा है। यह यात्रा मात्र पदोन्नति और सेवानिवृत्ति की नहीं, बल्कि सत्य, तर्क और मानवीय करुणा की निरंतर खोज की है। पांच पीढ़ियों से चली आ रही वैचारिक विरासत को कंधों पर उठाए, वे बुद्ध के ‘अप्प दीपो भव’ और कबीर के ‘आंखिन देखी’ के संदेश को जीते हुए आगे बढ़ने वाले इंसान की है । सबसे बड़ी बात है कि समृद्धि और उच्च पद के बावजूद कभी अभिमान ने उन्हें छुआ तक नहीं। समाज के कमजोर वर्गों के प्रति उनकी निष्ठा निर्बाध रही, और उनका पूरा नौकरीकाल ईमानदारी की मिसाल बना।
जब वे अपने जीवन के परिपक्व पड़ाव पर खड़े होकर पीछे मुड़कर देखते हैं, तो गर्व से भर जाते हैं।उनका कहना है कि -“मेरा पूरा जीवन सत्य, तर्क तथा बुद्ध और कबीर साहब की शुद्ध विचारधारा को समर्पित रहा है,” वे कहते हैं। यह परिचय केवल एक सिविल इंजीनियर का नहीं, बल्कि एक वैचारिक संकल्प का है—जो कागजी रूढ़ियों से ऊपर उठकर अनुभव और तर्क पर टिका है। यहां हम उनकी इस जीवन यात्रा को विस्तार से समझेंगे: पारिवारिक जड़ों से लेकर शिक्षा की नींव तक , व्यावसायिक संघर्षों से लेकर सामाजिक जागरण तक , साथ हीं उनके जीवन-दर्शन की गहराई, साहित्यिक सृजन और अंततः पत्नी-विछोह की पीड़ा के बाद भी उनके शांत, तार्किक जीवन को।
पांच पीढ़ियों की वैचारिक विरासत
इंजीनियर भोगेन्द्र मंडल जी का जन्म मधुबनी जिले के हरलाखी गांव में एक साधारण व्यवसायी-कृषक परिवार में हुआ। पिता स्वर्गीय सुखदेव मंडल की छत्रछाया में पले-बढ़े। लेकिन यह परिवार साधारण नहीं था। पिछली पांच पीढ़ियों से यह संत कबीर दास की निर्गुण भक्ति, सामाजिक समानता और पाखंड-विरोध की विचारधारा तथा भगवान बुद्ध के वैज्ञानिक, तार्किक एवं करुणामूलक दर्शन का अनन्य अनुयायी रहा है।
यह विरासत घर की दीवारों में बस गई थी। देवी-देवताओं की पूजा, अंधविश्वास या किसी प्रकार के धार्मिक आडंबर से परिवार सदैव दूर रहा। कर्मकांड मुक्त यह वातावरण भोगेन्द्र जी को वैज्ञानिक सोच प्रदान करता रहा। उन्होंने खुद कहा है कि उनका मस्तिष्क हमेशा ‘अप्प दीपो भव’—स्वयं अपना दीपक बनो—के सिद्धांत पर चला। कबीर की ‘आंखिन देखी’ (अनुभव और तर्क) को उन्होंने जीवन का आधार बनाया, न कि ‘कागद की लेखी’ (रूढ़िवादी शास्त्र) को।
इस वैचारिक गहराई का जीवंत प्रमाण उनके छोटे चचेरे भाई डॉ. पूर्णेंदु हैं, जो वर्तमान में पंजाब यूनिवर्सिटी क़े चंडीगढ़ में प्रोफेसर हैं। उन्होंने JNU से कबीरपंथ पर दो बार पीएचडी की है। यह शोध परिवार की बौद्धिक निष्ठा का प्रमाण-पत्र है। ऐसी पृष्ठभूमि में पला भोगेन्द्र मंडल स्वभाव से मृदुभाषी, मिलनसार और बेहतरीन इंसान बन गया। सम्पन्नता और उच्चाधिकारी पद पर रहते हुए भी वे सदा साधारण रहे—अभिमान की छाया तक नहीं पड़ी।
ग्रामीण जड़ों से इंजीनियरिंग तक
ग्रामीण परिवेश में मैट्रिक पास करने के बाद उन्होंने पटना के साइंस कॉलेज से इंटरमीडिएट और बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (BCE, अब NIT पटना) से सिविल इंजीनियरिंग की उपाधि प्राप्त की।
1980 के दशक के बिहार में ग्रामीण युवा के लिए यह सफर आसान नहीं था। संसाधनों की कमी, दूरी और चुनौतियों के बीच भी पारिवारिक वैचारिक समर्थन और व्यक्तिगत दृढ़ संकल्प ने उन्हें आगे बढ़ाया।
तकनीकी छात्र के रूप में वे हमेशा वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखते थे। सड़कें, पुल और इंफ्रास्ट्रक्चर उनके लिए मात्र निर्माण नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने का माध्यम थे। बुद्ध की आत्मनिर्भरता और कबीर की सत्य-खोज ने उनकी शिक्षा को गहराई दी।
व्यावसायिक यात्रा: ईमानदारी की मिसाल
1986 में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, रांची से करियर की शुरुआत हुई। 1987 से 2018 तक लगभग 31 वर्ष उन्होंने बिहार सरकार के पथ निर्माण विभाग में सेवा दी। अंतिम पद तकनीकी सचिव (दक्षिण बिहार प्रभाग ) सह महाप्रबंधक, बिहार राज्य सड़क विकास निगम (BSRDC) का था। सेवानिवृत्ति के बाद बिहार ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण (BRRDA) ने उन्हें ‘राज्य गुणवत्ता मॉनिटर’ (SQM) नियुक्त किया। इस भूमिका में उन्होंने बिहार के लगभग हर प्रखंड का दौरा किया और सड़क निर्माण की गुणवत्ता सुनिश्चित की।
दरभंगा रोड डिवीजन में चार बार पदस्थापना (1991-2013) के दौरान उन्हें मिथिलांचल के अपने धानुक समाज के भाइयों को करीब से जानने का अवसर मिला। उनका पूरा सेवा काल निर्विवाद रहा। उच्च पद पर रहते हुए भी वे कभी सत्ता के नशे में नहीं डूबे। गुणवत्ता की निगरानी के माध्यम से उन्होंने सार्वजनिक धन की रक्षा की और विकास को सही दिशा दी। यह उनका व्यावहारिक बौद्ध-कबीरवाद था—सत्य की खोज और समाज की सेवा।
सामाजिक चेतना का जागरण
नौकरी के दौरान सामाजिक सरोकार भी उनके जीवन का अभिन्न अंग रहे। 2007 में रोटरी क्लब, लहरियासराय (दरभंगा) में उन्होंने धानुक समाज की ऐतिहासिक बैठक आयोजित की और श्रद्धेय स्वर्गीय रामदेव मंडल जी को जिला अध्यक्ष मनोनीत करवाया। इससे समाज में चेतना की लहर दौड़ी। वे हमेशा कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए कार्यरत रहे—शिक्षा, एकता और तर्क के माध्यम से।
उनका मानना था कि सच्चा विकास बिना सामाजिक जागृति के अधूरा है। पद की गरिमा को बनाए रखते हुए उन्होंने समाज के साथ जुड़ाव बनाए रखा।
जीवन-दर्शन: पाखंड-मुक्त तार्किक मार्ग
भोगेन्द्र मंडल का जीवन-दर्शन बुद्ध और कबीर के विचारों का सुंदर समन्वय है। बुद्ध की करुणा और आत्म-जागरण ने उन्हें संवेदनशील बनाया, जबकि कबीर के दोहे—जात-पात, पाखंड और आडंबर के विरुद्ध—ने उन्हें निर्भीक बनाया। परिवार में शुरू से ही कोई धार्मिक कर्मकांड नहीं था। वे कहते हैं कि उनका पूरा जीवन इस शुद्ध विचारधारा को समर्पित रहा।
यह दर्शन व्यावहारिक था: सड़कों में गुणवत्ता, समाज में समानता और व्यक्तिगत जीवन में सरलता। आज के भौतिकवादी युग में ऐसे व्यक्तित्व दुर्लभ हैं, जो समृद्धि के बावजूद सादगी और निष्ठा बनाए रखें।
सेवानिवृत्ति के बाद: सृजन और शांति की खोज
पत्नी के आकस्मिक अवसान ने उनके जीवन को गहरी पीड़ा दी। मानसिक शांति और परिवार की निकटता को सर्वोपरि मानते हुए उन्होंने SQM पद से स्वेच्छा से त्यागपत्र दे दिया। आज वे पटना और पैतृक हरलाखी गांव में परिवार के बीच शांत, पाखंड-मुक्त, तार्किक जीवन जीते हैं।
इस एकांत में उन्होंने अपनी ऊर्जा साहित्य की ओर मोड़ी। समसामयिक मुद्दों पर कविताएँ और लेख लिखना अब उनका मुख्य सरोकार है। कबीर की परंपरा में उनकी लेखनी समाज की वर्तमान दशा, दिशा और ज्वलंत मुद्दों पर प्रखर टिप्पणी करती है। विछोह की पीड़ा को उन्होंने रचनात्मकता में बदला—यह उनकी आंतरिक शक्ति और मर्यादा का प्रमाण है।
पत्नी-विछोह की वह पीड़ा शब्दों से परे है। बुद्ध की अनित्यता की शिक्षा और कबीर की विरह-भावना ने उन्हें इस दुख को संभालने की क्षमता दी। फिर भी, परिवार के साथ बिताए पल और साहित्यिक सृजन अब उनके जीवन का प्रकाश पुंज हैं। उन्होंने पाखंड, महिला संरक्षण,बौद्ध दर्शन, गौमाता औऱ राष्ट्रीयता विषय पर कई लेख लिखें जो चर्चा में रही ।
एक प्रेरक संदेश
भोगेन्द्र मंडल का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची सफलता पद या धन में नहीं, बल्कि विचारों की शुद्धता और समाज के प्रति समर्पण में है। ग्रामीण जड़ों से उच्च पद तक की उनकी यात्रा, ईमानदारी की मिसाल और बुद्ध-कबीर की ज्योति में नहाया जीवन युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत है।
क्या ऐसे व्यक्तित्व आज भी संभव हैं? भोगेन्द्र मंडल साबित करते हैं—हाँ। उनकी कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक विचारधारा की निरंतरता की है। पाठक इस यात्रा को पढ़कर स्वयं सोचने को विवश हो जाएंगे: हम अपने जीवन को किस विचारधारा को समर्पित कर रहे हैं?

