डॉ.सिनोद कुमार मंडल की कहानी उन लाखों लोगों की कहानी है जो गरीबी और सीमित संसाधनों के बीच भी सपनों को पूरा करने के लिए संघर्ष करते हैं। वे दिखाते हैं कि मेहनत, समर्पण और सेवा भावना से कोई भी व्यक्ति समाज के लिए कुछ अच्छा कर सकता है। उनकी यात्रा ग्रामीण बिहार की धूल से शुरू होकर अफ्रीका की धरती तक जाती है और फिर वापस अपनी जड़ों की सेवा में लौट आती है।
बिहार की उपजाऊ मिट्टी में, जहाँ गंगा और घाघरा की नदियाँ खेतों को सींचती हैं और सभ्यताओं को जीवन देती हैं, वहाँ धानुक समुदाय की जड़ें बहुत गहरी हैं। यह समुदाय प्राचीन काल से धनुष के योद्धाओं से जुड़ा रहा है। समय के साथ यह कृषि मजदूरी, सेवा और संघर्ष की विरासत को संजोए हुए आगे बढ़ा है। इसी मिट्टी के सपूत हैं डॉ.सिनोद कुमार मंडल। वे एक नेत्र सहायक से शुरू करके सामाजिक सेवक, अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता और संगठनात्मक नेता बनकर उभरे हैं। उनकी जीवन कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि आधुनिक भारत में पिछड़े समुदायों की आकांक्षाओं, शिक्षा की रोशनी, स्वास्थ्य सेवा की पहुंच और सामुदायिक उत्थान की पूरी तस्वीर है।
डॉ.सिनोद कुमार मंडल की कहानी उन लाखों लोगों की कहानी है जो गरीबी और सीमित संसाधनों के बीच भी सपनों को पूरा करने के लिए संघर्ष करते हैं। वे दिखाते हैं कि मेहनत, समर्पण और सेवा भावना से कोई भी व्यक्ति समाज के लिए कुछ अच्छा कर सकता है। उनकी यात्रा ग्रामीण बिहार की धूल से शुरू होकर अफ्रीका की धरती तक जाती है और फिर वापस अपनी जड़ों की सेवा में लौट आती है।
जन्म और परिवार: मिट्टी की महक और संघर्ष की विरासत
डॉ. सिनोद कुमार मंडल का जन्म पूर्वी चंपारण जिले के नरकटिया गांव में हुआ। यह गांव ढाका थाना क्षेत्र के अंतर्गत आता है। उनके पिता स्वर्गीय श्री नारायण मंडल एक साधारण किसान थे। वे खेतों में मेहनत करते थे और साथ ही कोलकाता में ट्रेड यूनियन लीडर के रूप में मजदूरों की आवाज बनकर खड़े होते थे। माता मालती देवी घर संभालती थीं। पूरा परिवार धानुक समुदाय से है, जो बिहार में अत्यंत पिछड़ी श्रेणी (EBC) में शामिल है। धानुक समुदाय की जनसंख्या बिहार में करीब 28 लाख के आसपास है। यह समुदाय मुख्य रूप से कृषि कार्य, सेवा और अब शिक्षा व स्वास्थ्य क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है।
पिता की ट्रेड यूनियन पृष्ठभूमि ने सिनोद जी को न्याय और संगठन की सीख दी। पिता की किसानी की मेहनत और माता की सादगी ने उन्हें जमीनी हकीकत से जोड़े रखा। परिवार में संघर्ष हमेशा रहा, लेकिन मूल्यों की नींव मजबूत थी। सिनोद जी का विवाह इंजीनियर सीमा कुमारी से हुआ, जो दरभंगा के राजकीय पॉलिटेक्निक में यांत्रिकी विभाग की व्याख्याता हैं। उनका बेटा प्रज्ञान शशी परिवार की उम्मीद की किरण है। उनका स्थायी पता अभी भी ग्राम नरकटिया, पोस्ट बड़हरवा, सीवान है। यह पता उनकी जड़ों की याद दिलाता रहता है, जहाँ धान की खेती और सादा जीवन आज भी जारी है।
यह परिवार मध्यवर्गीय ग्रामीण परिवार की अच्छी मिसाल है। परंपरा और आधुनिकता के बीच यह पुल का काम कर रहा है। सीमा कुमारी जैसी महिलाओं के योगदान से धानुक समुदाय में महिलाओं की भूमिका भी बढ़ रही है। सिनोद जी का परिवार सिखाता है कि शिक्षा और सेवा भावना से व्यक्ति न सिर्फ खुद आगे बढ़ता है, बल्कि पूरे समुदाय को भी ऊपर उठाता है।
शिक्षा: ज्ञान की ज्योति और नेत्र ज्योति का संकल्प
सिनोद जी की पढ़ाई मोतिहारी के एमएस कॉलेज से शुरू हुई। उन्होंने वहाँ इंटरमीडिएट तक की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद पटना मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल (PMCH) से नेत्र सहायक (Ophthalmic Assistant) का डिप्लोमा किया। नेत्र सहायक का काम नेत्र चिकित्सक की मदद करना, आँखों की जाँच करना, चश्मा तय करना और प्राथमिक नेत्र देखभाल करना होता है।
बिहार जैसे राज्य में ग्रामीण इलाकों में नेत्र स्वास्थ्य की स्थिति बहुत खराब है। कैटरेक्ट जैसी बीमारियाँ आम हैं। ऑप्टोमेट्रिस्ट की कमी और जागरूकता का अभाव बड़ी समस्या है। ऐसे में यह डिप्लोमा सिनोद जी के लिए जीवन बदलने वाला साबित हुआ। शिक्षा ने उन्हें सिर्फ तकनीकी कौशल नहीं दिया, बल्कि समाज की सेवा करने की दृष्टि भी दी।
धानुक समुदाय का इतिहास धनुषधारी योद्धाओं से जुड़ा है। शिक्षा के जरिए सिनोद जी फिर से ‘दृष्टि योद्धा’ बन गए। उनकी शिक्षा की यात्रा ग्रामीण बिहार की सीमाओं को पार करके पटना तक गई। यह यात्रा अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की मिसाल है। उन्होंने सीखा कि आँखें सिर्फ देखने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को नई दिशा दिखाने का जरिया भी हैं।
मोज़ाम्बिक की यात्रा (2014-2019): अफ्रीकी धरती पर भारतीय सेवा भाव
2014 में डॉ.सिनोद जी मोज़ाम्बिक चले गए। दक्षिणी अफ्रीका का यह देश भारतीय डायस्पोरा के लिए जाना जाता है। वहाँ उन्होंने निजी क्षेत्र में नेत्र चिकित्सक के रूप में काम शुरू किया। साथ ही चर्च के माध्यम से गरीबों के लिए निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर आयोजित करने लगे। वे ग्रामीण इलाकों और वंचित लोगों तक पहुँचे। आँखों की जाँच, इलाज और जागरूकता फैलाई।
डॉ.सिनोद कुमार मंडल का व्यक्तित्व सरल, समर्पित और दूरदर्शी है। वे जड़ों से जुड़े रहते हुए भी आगे बढ़ने वाले व्यक्ति हैं। उनकी सबसे बड़ी खासियत सेवा भावना है। चाहे अफ्रीका हो या बिहार, वे हमेशा जरूरतमंदों के लिए तैयार रहते हैं। वे शिक्षित होने के बावजूद सादा जीवन जीते हैं। परिवार को संभालते हुए समाज की सेवा करते हैं। उनकी पत्नी सीमा कुमारी का सहयोग उनके काम में बड़ा सहारा है। बेटे प्रज्ञान शशी को वे अच्छे संस्कार दे रहे हैं।
मोज़ाम्बिक में नेत्र स्वास्थ्य की चुनौतियाँ भारत से कम नहीं थीं। विशेषज्ञों की कमी और दूर-दराज के इलाके बड़ी समस्या थे। सिनोद जी वहाँ भारतीय सेवा भावना का उदाहरण बने। कल्पना कीजिए – अफ्रीकी गांवों में एक भारतीय नेत्र सहायक धूल-धूप में शिविर लगाता है और लोगों की आँखों की रोशनी लौटाता है। यह वसुधैव कुटुम्बकम् का सच्चा रूप था।
पाँच साल की इस सेवा ने उनके अनुभव को बहुत समृद्ध किया। उन्होंने सांस्कृतिक आदान-प्रदान सीखा, स्वास्थ्य असमानताओं को समझा और सेवा की सार्वभौमिकता को महसूस किया।
अफ्रीका की धरती पर उन्होंने दिखाया कि सेवा की कोई सीमा नहीं होती। चाहे देश हो या विदेश, जरूरतमंदों की मदद करना सबसे बड़ा काम है। 2019 में वे स्वदेश लौटे, लेकिन उनके मन में बिहार की मिट्टी को और बेहतर बनाने का संकल्प था।
दरभंगा में निजी प्रैक्टिस और जातिगत सेवा (2019-2023)
स्वदेश लौटकर डॉ. सिनोद जी ने दरभंगा में निजी प्रैक्टिस शुरू की। उन्होंने धानुक समुदाय के लोगों के लिए निःशुल्क नेत्र जाँच की और कम खर्च में चश्मा उपलब्ध कराया। बिहार के ग्रामीण इलाकों में 70 प्रतिशत से ज्यादा अंधापन कैटरेक्ट या उससे जुड़ी समस्याओं के कारण होता है। सिनोद जी इस समस्या को दूर करने में जुट गए।
वे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की भूमिका को समझते थे, लेकिन जागरूकता और पहुंच की कमी को भी जानते थे। इसलिए उन्होंने व्यक्तिगत प्रयासों के साथ सरकारी तंत्र को भी जोड़ा। धानुक समुदाय के लिए यह सेवा आत्म-सम्मान का प्रतीक थी। जातिगत संगठनों के जरिए वे वंचितों तक आसानी से पहुँच सके।
उनकी प्रैक्टिस सिर्फ इलाज तक सीमित नहीं थी। वे लोगों को आँखों की देखभाल के बारे में जागरूक भी करते थे। साफ-सफाई, समय पर जाँच और सही इलाज की जरूरत पर जोर देते थे। इस दौरान उन्होंने कई शिविर लगाए और सैकड़ों लोगों की मदद की।
संगठनात्मक भूमिका: अखिल भारतीय धानुक एकता महासंघ
2022 से 2025 तक सिनोद जी अखिल भारतीय धानुक एकता महासंघ में संगठन मंत्री रहे। इस दौरान उन्होंने समुदाय के सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक उत्थान के लिए काम किया। राष्ट्रीय स्तर पर संगठन का विस्तार किया।
धानुक समुदाय की योद्धा परंपरा को उन्होंने आधुनिक संघर्ष से जोड़ा। उनके कार्यकाल में समुदाय की एकता मजबूत हुई। बिहार की जाति-राजनीति में यह एकता बहुत महत्वपूर्ण है। डॉ. सिनोद जी ने दिखाया कि संगठन सिर्फ राजनीति के लिए नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सशक्तिकरण के लिए भी होना चाहिए।
वर्तमान: सरकारी सेवा और अखिल भारतीय धनुवंशी सेवा संघ
2023 से वे दरभंगा के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र केवटी में नेत्र सहायक के रूप में सरकारी सेवा कर रहे हैं। वहाँ वे नियमित जाँच, स्वास्थ्य शिविर और जागरूकता कार्यक्रम चलाते हैं। साथ ही वे अखिल भारतीय धनुवंशी सेवा संघ के माध्यम से समुदाय की सेवा जारी रखे हुए हैं।
सरकारी नौकरी में वे रोजाना आम लोगों की मदद करते हैं। गरीब मरीजों को विशेष ध्यान देते हैं। उनकी सेवा व्यक्तिगत से सामूहिक स्तर तक पहुँच चुकी है। यह चरण उनके जीवन का संस्थागत योगदान है।
डॉ. सिनोद कुमार मंडल का व्यक्तित्व
डॉ.सिनोद कुमार मंडल का व्यक्तित्व सरल, समर्पित और दूरदर्शी है। वे जड़ों से जुड़े रहते हुए भी आगे बढ़ने वाले व्यक्ति हैं। उनकी सबसे बड़ी खासियत सेवा भावना है। चाहे अफ्रीका हो या बिहार, वे हमेशा जरूरतमंदों के लिए तैयार रहते हैं।
वे शिक्षित होने के बावजूद सादा जीवन जीते हैं। परिवार को संभालते हुए समाज की सेवा करते हैं। उनकी पत्नी सीमा कुमारी का सहयोग उनके काम में बड़ा सहारा है। बेटे प्रज्ञान शशी को वे अच्छे संस्कार दे रहे हैं।
सिनोद जी सामाजिक चेतना के अग्रदूत हैं। वे दिखाते हैं कि पिछड़े समुदाय से आने वाला व्यक्ति भी वैश्विक स्तर पर योगदान दे सकता है। उनकी यात्रा युवाओं के लिए प्रेरणा है। वे सिखाते हैं कि शिक्षा लो, मेहनत करो और सेवा करो।
बिहार में EBC समुदायों की चुनौतियाँ – शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रतिनिधित्व – उनके काम में साफ दिखती हैं। नेत्र स्वास्थ्य का प्रतीकात्मक महत्व बहुत गहरा है। आँखें समाज की दृष्टि होती हैं। ग्रामीण इलाकों में अंधेपन की समस्या आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन से जुड़ी है। सिनोद जी ने इस समस्या पर काम करके समाज की दृष्टि को बेहतर बनाने का प्रयास किया है।
उनके मोज़ाम्बिक अनुभव ने उन्हें वैश्विक नजरिया दिया। स्थानीय काम ने जमीनी प्रभाव पैदा किया। संगठनात्मक भूमिका ने उन्हें आंदोलनकारी बनाया।
चुनौतियाँ और आगे की राह
ग्रामीण स्वास्थ्य क्षेत्र में डॉक्टरों और स्टाफ की कमी, जागरूकता का अभाव और जातिगत बाधाएँ बड़ी चुनौतियाँ हैं। सिनोद जी जैसे लोग इनका सामना करते हैं। भविष्य में वे डिजिटल स्वास्थ्य, टेली-मेडिसिन और युवा नेतृत्व को बढ़ावा दे सकते हैं। इससे समुदाय और आगे बढ़ सकता है।
डॉ. सिनोद औऱ रोशनी का संदेश
सिनोद कुमार मंडल की जीवन यात्रा एक जलते दीपक की तरह है। यह अंधेरे को चीरती हुई आशा जगाती है। धानुक समुदाय के लिए वे प्रेरणा हैं। बिहार के स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए उदाहरण हैं और मानव सेवा के लिए प्रतीक हैं।
उनकी आँखें सिर्फ शारीरिक रोशनी नहीं लौटातीं, बल्कि सामाजिक चेतना को भी नई दिशा देती हैं। जैसा कवि कहता है – “तम सो ज्योतिर्गमय” – अंधकार से प्रकाश की ओर। सिनोद जी इस मंत्र को अपने जीवन में उतारकर जी रहे हैं।
उनका योगदान याद दिलाता है कि सच्ची सेवा किसी सीमा में नहीं बंधी होती। यह गाँव से अफ्रीका तक, निजी से सरकारी तक और जाति से मानवता तक फैली होती है। सिनोद कुमार मंडल जैसे लोग समाज को बेहतर बनाने वाले सच्चे नायक हैं। उनकी कहानी हर उस व्यक्ति को प्रेरित करती है जो सपनों को हकीकत में बदलना चाहता है।

