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AVN Antarkatha

स्मृतियों के झरोखे में एक ‘जिंदादिल’ व्यक्तित्व: प्रो. अशोक कुमार को अंतिम प्रणाम

ByBinod Anand

May 2, 2026

प्राचार्य के पद पर आसीन होने के बाद भी अशोक सिन्हा क़े स्वभाव में किंचित मात्र भी बदलाव नहीं आया। सत्ता और पद अक्सर इंसान की सहजता छीन लेते हैं, लेकिन अशोक चाचा के लिए पद सेवा का माध्यम था। कॉलेज के गलियारों में जब भी उनसे भेंट होती, वे हमेशा एक अभिभावक की भांति खोज-खबर लेते। उनकी “जिंदादिली” उनकी पहचान थी।

(विनोद आनंद )

मय की रेत मुट्ठी से कब फिसल जाती है, इसका आभास तब होता है जब कोई अपना हमेशा के लिए मौन हो जाता है।

कल तक जो चेहरा हमारी यादों के गलियारों में मुस्कुराहटें बिखेर रहा था, आज वह अचानक ‘शोक संदेश’ के एक कागज के टुकड़े में सिमट कर रह गया है। मेरे मित्र प्रकाश कुमार (पापे) ने जब उनके श्राद्ध कर्म का आमंत्रण भेजा, तो जैसे पैरों तले जमीन खिसक गई। हृदय स्तब्ध है और मन यह मानने को तैयार ही नहीं कि आर. एस. मोर कॉलेज, गोविंदपुर के इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व प्राचार्य, आदरणीय प्रो. अशोक कुमार जी—जिन्हें हम प्यार से ‘अशोक चाचा’ भी कहते थे—अब इस नश्वर संसार में नहीं रहे।

बचपन की दहलीज और परिचय का वह दौर

बात उन दिनों की है जब जीवन में जिम्मेदारियों का बोझ नहीं, बल्कि सपनों की उड़ान थी। 1977 में जब मैं धनबाद आया, तब मैं हाई स्कूल का छात्र था। उन दिनों आर. एस. मोर कॉलेज के प्राचार्य डॉ. एस. एन. राणा साहब और उप-प्राचार्य प्रो. एन. के. सिन्हा साहब (अशोक चाचा के बड़े भाई) हुआ करते थे। डॉ. राणा के पुत्रों—अनूप, नीरज, संजीव—और प्रो. सिन्हा के पुत्र प्रकाश (पापे) के साथ मेरी गहरी मित्रता थी।

अशोक चाचा उस समय नौकरी में नहीं थे। वे स्नातकोत्तर (PG) की पढ़ाई पूरी कर चुके थे। हम बच्चे थे, लेकिन वे अपनी विद्वता और सौम्यता के बावजूद हम लोगों के साथ कॉलेज के मैदान में टहलते थे। उनकी वह सहजता आज भी आँखों के सामने तैर जाती है। वे एक बड़े भाई की तरह मार्गदर्शन भी करते और एक मित्र की तरह हंसी-मजाक भी। रिश्तों की वह गर्माहट ही थी कि वे ‘सर’ से पहले हमारे ‘चाचा’ बन गए।

गुरु-शिष्य परंपरा का अनुपम उदाहरण

वक्त का पहिया घूमा। प्रो. एन. के. सिन्हा सर चास कॉलेज के प्राचार्य बनकर चले गए और पापे समेत पूरा परिवार चास विस्थापित हो गया। लेकिन नियति ने अशोक चाचा को गोविंदपुर की इसी माटी की सेवा के लिए चुना था। 1981 में उन्होंने आर. एस. मोर कॉलेज के इतिहास विभाग में प्राध्यापक के रूप में कार्यभार संभाला।

संयोग देखिए, जब मैंने उसी कॉलेज में कदम रखा, तो वे मेरे गुरु बने। उन्होंने मुझे इतिहास की बारीकियों से अवगत कराया। उनकी लेखनी में वह धार थी और उनकी वाणी में वह ओज, जो किसी भी सोए हुए विद्यार्थी को जगा दे। यह मेरा सौभाग्य रहा कि दशकों बाद जब मेरी बेटी ने इतिहास में स्नातकोत्तर किया, तब भी वे मार्गदर्शक की भूमिका में थे। दो पीढ़ियों को तराशने वाला ऐसा शिक्षक मिलना विरल है।

प्रशासनिक ऊंचाइयां और अटूट आत्मीयता

प्राचार्य के पद पर आसीन होने के बाद भी उनके स्वभाव में किंचित मात्र भी बदलाव नहीं आया। सत्ता और पद अक्सर इंसान की सहजता छीन लेते हैं, लेकिन अशोक चाचा के लिए पद सेवा का माध्यम था। कॉलेज के गलियारों में जब भी उनसे भेंट होती, वे हमेशा एक अभिभावक की भांति खोज-खबर लेते। उनकी “जिंदादिली” उनकी पहचान थी।

सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने कॉलेज से कुछ दूर अपना घर बनाया। हालांकि मुलाकातों का सिलसिला थोड़ा कम हुआ, पर जब भी मिलते, वही पुरानी चमक उनकी आँखों में होती। पिछले कुछ समय से उनकी अनुपस्थिति पर मुझे लगा कि शायद वे अपने बच्चों के पास बाहर गए होंगे। चाची जी भी शिक्षिका रही थीं, दोनों ने मिलकर अपने बच्चों को उच्च शिक्षा और संस्कार दिए, जो आज विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिष्ठित हैं।

एक शून्य जो कभी नहीं भरेगा

अशोक चाचा की उम्र अभी जाने की नहीं थी। उनके पास साझा करने को अभी और भी अनुभव थे, लिखने को अभी और भी पन्ने थे। उनकी लेखनी बहुत संजीदा थी; वे जब लिखते थे, तो शब्द सीधे दिल में उतर जाते थे। आज वही शब्द मौन हैं।

उनका जाना केवल एक प्राचार्य या प्राध्यापक का जाना नहीं है, बल्कि उस पीढ़ी का जाना है जो रिश्तों को मूल्यों से ऊपर रखती थी। गोविंदपुर की सड़कों पर, कॉलेज के उस पुराने बरगद के नीचे और हमारे दिलों के किसी कोने में उनकी पदचाप हमेशा सुनाई देगी।

अंत में यही कहूंगा कि इतिहास पढ़ाने वाला व्यक्ति आज स्वयं इतिहास का एक गरिमामय अध्याय बन गया है। अशोक चाचा, आप शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन एक आदर्श शिक्षक, एक स्नेही अभिभावक और एक बेमिसाल इंसान के रूप में आप हमेशा जीवित रहेंगे।

श्राद्ध कर्म का वह पत्र हाथ में है, आँखें नम हैं, पर मन में यह संतोष है कि हमने एक ऐसे व्यक्तित्व के सानिध्य में समय बिताया जो वास्तव में ‘अजातशत्रु’ थे!

“बिछड़ा कुछ इस अदा से कि रुत ही बदल गई,

एक शख्स सारे शहर को वीरान कर गया।”

ईश्वर आपकी पुण्यात्मा को चिर शांति प्रदान करें और परिवार को यह वज्रपात सहने की शक्ति दें। विनम्र श्रद्धांजलि!

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