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सम्पादकीय : त्रिकोणीय कूटनीति: आतंकवाद, संतुलन और अमेरिका का भारत-पाक समीकरण

ByBinod Anand

May 13, 2025

युद्ध जैसे हालात से बचने के लिए अमेरिका द्वारा मध्यस्थता पर जोर भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को सीमित कर सकता है। भारत हमेशा से ही द्विपक्षीय मुद्दों को तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप के बिना हल करने का पक्षधर रहा है। पर अमेरिका की मध्यस्थता की पेशकश को भारत सावधानी से देख रहा है, यह सुनिश्चित करते हुए कि यह उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा हितों से समझौता तो नहीं है

(विनोद आनंद)
अं तर्राष्ट्रीय कूटनीति के जटिल जाल में, कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो विरोधाभासों, रणनीतिक अनिवार्यता और ऐतिहासिक भार से बंधे होते हैं। भारत, पाकिस्तान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच का त्रिकोणीय संबंध एक ऐसा ही उदाहरण है।

दशकों से, अमेरिका इस क्षेत्र में एक नाजुक संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है, एक ओर भारत के साथ अपने बढ़ते रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को मजबूत कर रहा है, तो दूसरी ओर पाकिस्तान को पूरी तरह से अलग-थलग करने से बच रहा है, जिसे वह एक महत्वपूर्ण, यद्यपि जटिल, भू-राजनीतिक मोहरा मानता है।

2025 के घटनाक्रमों ने इस जटिल समीकरण को और भी स्पष्ट कर दिया है। यह स्पष्ट हो गया है कि अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ भारत के दृढ़ रुख का समर्थन करता है, लेकिन वह किसी भी ऐसे परिदृश्य से बचने के लिए मध्यस्थता को प्राथमिकता दे रहा है जो पूर्ण युद्ध की ओर ले जा सकता है।

पाकिस्तान लंबे समय से अमेरिका के लिए एक रणनीतिक संपत्ति रहा है। शीत युद्ध के दौरान, पाकिस्तान ने सोवियत संघ के खिलाफ अमेरिकी प्रयासों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप के दौरान, पाकिस्तान ने मुजाहिदीन को समर्थन देने में एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में कार्य किया, जिसके कारण अमेरिका और पाकिस्तान के बीच घनिष्ठ संबंध स्थापित हुए। 9/11 के हमलों के बाद, आतंकवाद के खिलाफ ‘युद्ध’ में पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण सहयोगी बन गया, जिसने अल-कायदा और तालिबान के खिलाफ अमेरिकी अभियानों के लिए महत्वपूर्ण लॉजिस्टिकल और खुफिया सहायता प्रदान की।

इस सहयोग के बदले में, पाकिस्तान को महत्वपूर्ण अमेरिकी सैन्य और आर्थिक सहायता प्राप्त हुई, जिसने उसकी अर्थव्यवस्था और सैन्य क्षमताओं को बनाए रखने में मदद की।

हालांकि, समय के साथ, अमेरिका और पाकिस्तान के बीच संबंध तनावपूर्ण होते गए। अमेरिका ने बार-बार पाकिस्तान पर आतंकवादियों को पनाह देने और उन्हें समर्थन करने का आरोप लगाया, खासकर अफगानिस्तान में सक्रिय तालिबान और हक्कानी नेटवर्क जैसे समूहों को। ओसामा बिन लादेन का एबटाबाद में पाया जाना, पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन करते हुए अमेरिकी विशेष बलों द्वारा एकतरफा कार्रवाई, दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई को और गहरा कर गया।

इसके बावजूद, अमेरिका पाकिस्तान को पूरी तरह से छोड़ने का इच्छुक नहीं रहा है। इसके कई कारण हैं। पहला, पाकिस्तान एक परमाणु शक्ति है, और अमेरिका इस क्षेत्र में परमाणु हथियारों की सुरक्षा और प्रसार को लेकर चिंतित है। एक अस्थिर और अलग-थलग पाकिस्तान परमाणु हथियारों की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकता है। दूसरा, पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति महत्वपूर्ण है। यह अफगानिस्तान और ईरान की सीमा पर स्थित है, और मध्य एशिया तक पहुंच प्रदान कर सकता है। क्षेत्रीय स्थिरता और आतंकवाद विरोधी प्रयासों के लिए पाकिस्तान का सहयोग अभी भी महत्वपूर्ण माना जाता है। तीसरा, चीन का बढ़ता प्रभाव एक महत्वपूर्ण कारक है। अमेरिका नहीं चाहेगा कि पाकिस्तान पूरी तरह से चीन के खेमे में चला जाए, जिससे क्षेत्र में शक्ति संतुलन और बिगड़ जाए।

दूसरी ओर, भारत और अमेरिका के संबंध पिछले दो दशकों में तेजी से मजबूत हुए हैं। दोनों देश दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं और साझा मूल्यों और हितों को साझा करते हैं। भारत एक तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है और एशिया में एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभर रहा है। अमेरिका भारत को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक भागीदार के रूप में देखता है, खासकर चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में।

दोनों देशों के बीच रक्षा, व्यापार, प्रौद्योगिकी और आतंकवाद विरोधी सहयोग तेजी से बढ़ रहा है। अमेरिका ने सार्वजनिक रूप से सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के रुख का समर्थन किया है और पाकिस्तान से अपनी धरती से संचालित होने वाले आतंकवादी समूहों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने का आह्वान किया है।

2025 के घटनाक्रम इस बदलते समीकरण को और स्पष्ट करते हैं। मान लीजिए कि इस वर्ष कोई बड़ी आतंकवादी घटना होती है जिसका स्रोत पाकिस्तान में स्थित आतंकवादी समूह पाए जाते हैं। ऐसी स्थिति में, अमेरिका के लिए भारत के आतंकवाद विरोधी रुख का समर्थन करना स्वाभाविक होगा। खुफिया जानकारी साझा करना, संयुक्त जांच में सहयोग करना और पाकिस्तान पर राजनयिक दबाव बढ़ाना अमेरिकी प्रतिक्रिया का हिस्सा होगा ।

अमेरिका यह भी स्वीकार करेगा कि भारत को आत्मरक्षा का अधिकार है। हालांकि, अमेरिका युद्ध जैसे हालात से बचने के लिए हर संभव प्रयास करेगा। इसके कई कारण हैं। भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र हैं, और उनके बीच कोई भी पूर्ण पैमाने का संघर्ष क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है। अमेरिका इस तरह के परिदृश्य को हर कीमत पर टालना चाहेगा।

इसलिए, अमेरिका मध्यस्थता को प्राथमिकता दिया। वह दोनों देशों के बीच तनाव कम करने, बातचीत को प्रोत्साहित करने और संकट को हल करने के लिए राजनयिक चैनलों का उपयोग किया। अमेरिका अंतर्राष्ट्रीय मंचों, जैसे संयुक्त राष्ट्र, का उपयोग करके पाकिस्तान पर आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करने का दबाव बनाएगा, जबकि भारत को संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान खोजने के लिए प्रोत्साहित करेगा।

अमेरिका की यह रणनीति विरोधाभासी लग सकती है – एक ओर आतंकवाद के खिलाफ भारत का समर्थन करना और दूसरी ओर युद्ध से बचने के लिए मध्यस्थता करना – लेकिन यह उसकी जटिल भू-राजनीतिक मजबूरियों को दर्शाती है। अमेरिका न तो पाकिस्तान को पूरी तरह से अलग-थलग करना चाहता है और न ही भारत के साथ अपने बढ़ते संबंधों को खतरे में डालना चाहता है। वह एक ऐसी स्थिति से बचना चाहता है जहां क्षेत्रीय अस्थिरता अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचा सकती है।

2025 के घटनाक्रम यह भी संकेत दे सकते हैं कि अमेरिका पाकिस्तान पर अपनी आतंकवाद विरोधी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए दबाव बढ़ाएगा। वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (FATF) जैसे अंतरराष्ट्रीय निकायों के माध्यम से पाकिस्तान पर अधिक कठोर शर्तें लगाई जा सकती हैं। अमेरिका पाकिस्तान को आतंकवाद के वित्तपोषण और मनी लॉन्ड्रिंग को रोकने के लिए ठोस और सत्यापन योग्य कदम उठाने के लिए प्रोत्साहित करेगा।

हालांकि, यह दबाव इस तरह से डाला जाएगा कि पाकिस्तान एक विफल राष्ट्र न बन जाए, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए और भी बड़े खतरे पैदा हो सकें।

भारत के लिए, अमेरिका का यह रुख एक मिश्रित नीति हो सकता है। जबकि अमेरिका का आतंकवाद विरोधी रुख का समर्थन स्वागत योग्य होगा, युद्ध जैसे हालात से बचने के लिए मध्यस्थता पर जोर भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को सीमित कर सकता है। भारत हमेशा से ही द्विपक्षीय मुद्दों को तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप के बिना हल करने का पक्षधर रहा है। अमेरिका की मध्यस्थता की पेशकश को भारत सावधानी से देखेगा, यह सुनिश्चित करते हुए कि यह उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा हितों से समझौता नहीं करता है।

पाकिस्तान के लिए, अमेरिका का यह रुख एक चेतावनी और एक अवसर दोनों हो सकता है। अमेरिका का आतंकवाद विरोधी रुख का समर्थन पाकिस्तान पर अपनी धरती से संचालित होने वाले आतंकवादी समूहों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने का दबाव बनाएगा।

यदि पाकिस्तान इस दबाव को स्वीकार करता है और प्रभावी कदम उठाता है, तो वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ अपने संबंधों को सुधार सकता है और आर्थिक सहायता और निवेश आकर्षित कर सकता है। हालांकि, यदि पाकिस्तान अनिच्छा दिखाता है, तो वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और भी अलग-थलग हो सकता है, जिससे उसकी आर्थिक और राजनीतिक स्थिति और कमजोर हो सकती है।

इसका मूल बात यह है कि 2025 के घटनाक्रम इस बात की पुष्टि करते हैं कि अमेरिका भारत और पाकिस्तान के बीच एक नाजुक संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। वह भारत के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को महत्व देता है और आतंकवाद के खिलाफ उसके रुख का समर्थन भी करता है। हालांकि, वह पाकिस्तान को पूरी तरह से छोड़ने और क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करने से भी बचना चाहता है। इसलिए, अमेरिका का ध्यान युद्ध जैसे हालात से बचने के लिए मध्यस्थता पर केंद्रित रहेगा।

यह त्रिकोणीय कूटनीति जटिल और गतिशील बनी रहेगी, जिसमें क्षेत्रीय और वैश्विक भू-राजनीतिक विकास महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे। भारत और पाकिस्तान दोनों को इस जटिल परिदृश्य को सावधानी से नेविगेट करना होगा, अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा हितों की रक्षा करते हुए क्षेत्रीय शांति और स्थिरता में योगदान देना होगा। अमेरिका की भूमिका एक महत्वपूर्ण उत्प्रेरक बनी रहेगी, जो संतुलन, दबाव और कूटनीति के मिश्रण के माध्यम से इस नाजुक त्रिकोण को आकार देगी।

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