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संपादकीय :- युद्धों का चक्रव्यूह और शांति की अनिवार्यता

ByBinod Anand

Jun 26, 2025

आज की दुनिया को यह समझना होगा कि हम सभी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। किसी एक क्षेत्र में अशांति पूरी दुनिया को प्रभावित करती है। इसलिए, अमन-चैन के लिए पूरी दुनिया को एकजूट होना चाहिए। हमें उन ताकतों के खिलाफ खड़े होना होगा जो युद्ध को बढ़ावा देती हैं, और उन देशों को सही रास्ते पर लाना होगा जो गलत दिशा में जा रहे हैं।

र्तमान वैश्विक परिदृश्य युद्धों और संघर्षों के एक अंतहीन चक्रव्यूह में फंसा हुआ है, जहाँ मानवीय त्रासदी और भौतिक विनाश एक दुखद वास्तविकता बन चुके हैं। हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ कुछ मुट्ठी भर देश, अपनी भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और आर्थिक हितों को साधने के लिए, युद्ध को एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। इन युद्धों का सीधा प्रभाव उन देशों की आम जनता पर पड़ता है जो इन शक्तिशाली देशों के प्रभाव या दबाव में आकर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं। यह एक गंभीर चिंतन का विषय है कि क्यों संप्रभु राष्ट्र अपने निर्णय लेने की शक्ति खोकर दूसरों के एजेंडे पर नाच रहे हैं, और क्यों वे लाखों निर्दोष नागरिकों की मौत और अपने ही भविष्य की बर्बादी के लिए जिम्मेदार बन रहे हैं।

यूक्रेन का वर्तमान संकट इस बात का एक ज्वलंत उदाहरण है कि कैसे बाहरी शक्तियों के उकसावे में आकर एक देश खुद को युद्ध की आग में झोंक देता है। अमेरिका और नाटो देशों द्वारा दिए गए समर्थन और आश्वासनों के कारण यूक्रेन ने रूस के खिलाफ एक ऐसी स्थिति उत्पन्न की जिसका परिणाम आज वह अकेला भुगत रहा है। उसके शहर खंडहर बन गए हैं, लाखों लोग विस्थापित हुए हैं, और अर्थव्यवस्था चरमरा गई है। क्या यह “कथित महाशक्तियों” की जिम्मेदारी नहीं थी कि वे यूक्रेन को एक यथार्थवादी मार्ग दिखाएं, न कि उसे ऐसे रास्ते पर धकेलें जिसका अंत केवल विनाश में हो?

ज़राइल और ईरान के बीच हालिया तनाव भी इसी बात को पुष्ट करता है। इज़राइल ने कथित सुपरपावर के समर्थन पर ईरान पर हमला किया, और इसका हश्र क्या हुआ? दोनों मुल्कों को भारी बर्बादी का सामना करना पड़ा। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जिसमें एक पक्ष की कार्रवाई दूसरे की प्रतिक्रिया को जन्म देती है, और अंततः दोनों ही पक्षों को अपूरणीय क्षति होती है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि किसी भी देश की सुरक्षा केवल हथियारों के बल पर सुनिश्चित नहीं की जा सकती, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और कूटनीति के माध्यम से ही स्थायी शांति प्राप्त की जा सकती है।

पाकिस्तान की स्थिति भी इस वैश्विक त्रासदी का एक दुखद प्रतिबिंब है। स्वयं पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने यह स्वीकार किया कि कुछ देशों ने पाक को “आतंकी टूल” के रूप में इस्तेमाल किया। आज पाकिस्तान जिस भुखमरी, आर्थिक बदहाली और अशांति का सामना कर रहा है, उसका सीधा संबंध उसकी अतीत की उन नीतियों से है जो उसने दूसरों के इशारों पर चलकर अपनाईं। यह विडंबना है कि एक तरफ पाकिस्तान अपनी आंतरिक समस्याओं से जूझ रहा है, और दूसरी तरफ उसके कुछ नेता भारत को सिंधु जल के मुद्दे पर परमाणु हमले की धमकी दे रहे हैं। यह एक अत्यंत गैर-जिम्मेदाराना बयान है, जो न केवल क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा है, बल्कि पाकिस्तान की अपनी जनता के लिए भी विनाशकारी साबित हो सकता है। ऐसे नेताओं को यह समझना होगा कि परमाणु युद्ध का कोई विजेता नहीं होता, केवल सर्वनाश होता है। युद्ध की स्थिति में, नेता तो शायद सुरक्षित स्थानों पर भाग जाएंगे, लेकिन आम जनता ही इसकी सबसे बड़ी भुक्तभोगी होगी। इसलिए, पाकिस्तान की जनता को ऐसे नेताओं के प्रति जवाबदेही तय करनी होगी जो उन्हें बर्बादी के रास्ते पर ले जा रहे हैं। उन्हें अपने नेताओं से पूछना होगा कि उनका भविष्य क्या है, और क्या वे वास्तव में अपने बच्चों के लिए युद्ध और विनाश का माहौल चाहते हैं।

भारत हमेशा से शांति और सद्भाव में विश्वास करता रहा है। हमारी विदेश नीति का आधार हमेशा “वसुधैव कुटुम्बकम्” रहा है, जिसका अर्थ है “समस्त विश्व एक परिवार है”। हमने हमेशा पड़ोसियों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने का प्रयास किया है, लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे पड़ोसी, जैसे बांग्लादेश और पाकिस्तान, अक्सर अमेरिका या चीन के एजेंडे पर भारत को कमजोर करने का काम करते रहे हैं। उन्हें अपनी वर्तमान स्थिति का आकलन करना चाहिए और समझना चाहिए कि इस तरह की नीतियों ने उन्हें कहाँ ला खड़ा किया है। अस्थिरता और दूसरों पर निर्भरता ने उनकी अपनी प्रगति को बाधित किया है।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि किसी भी युद्ध से कोई समस्या हल नहीं हुई है। युद्ध केवल बर्बादी और तबाही लाता है, अनगिनत जीवन छीन लेता है, और पीढ़ियों तक दर्द और कड़वाहट छोड़ जाता है। अंततः, हर संघर्ष का समाधान बातचीत और कूटनीति के माध्यम से ही निकला है। यही कारण है कि हमें शांतिपूर्ण समाधानों पर जोर देना चाहिए, न कि संघर्षों को बढ़ावा देना चाहिए।

आज की दुनिया को यह समझना होगा कि हम सभी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। किसी एक क्षेत्र में अशांति पूरी दुनिया को प्रभावित करती है। इसलिए, अमन-चैन के लिए पूरी दुनिया को एकजूट होना चाहिए। हमें उन ताकतों के खिलाफ खड़े होना होगा जो युद्ध को बढ़ावा देती हैं, और उन देशों को सही रास्ते पर लाना होगा जो गलत दिशा में जा रहे हैं। हमें संवाद, सहयोग और आपसी सम्मान के सिद्धांतों पर आधारित एक नई विश्व व्यवस्था का निर्माण करना होगा। तभी हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और शांतिपूर्ण भविष्य सुनिश्चित कर पाएंगे। यह समय है कि हम युद्ध के अंधेरे से बाहर निकलकर शांति और सद्भाव के प्रकाश की ओर बढ़ें।

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