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  • Fri. Jun 12th, 2026

AVN Antarkatha

डॉ भवेश भारती मंडल: संघर्ष, स्वाभिमान और सामाजिक चेतना के महानायक

ByBinod Anand

Jun 12, 2026

डॉ. भवेश भारती मंडल के व्यक्तित्व में समाज सेवा और जन-कल्याण का गुण किसी बाहरी प्रभाव से नहीं, बल्कि उनके रक्त और संस्कारों में समाहित है। उन्हें सेवा भावना का यह अनुपम गुण अपनी पीढ़ियों से आनुवंशिक रूप से विरासत में मिला है। उनका पूरा परिवार दशकों से समाज, विशेषकर धानुक समाज के उत्थान और पीड़ित मानवता की सेवा में समर्पित रहा है।

 

परिचय

भा रतीय सामाजिक समरसता और न्याय के इतिहास में व्यवस्थागत असमानता के खिलाफ संघर्ष की कहानियाँ नई नहीं हैं, लेकिन जब कोई व्यक्तित्व अपने जीवन के कड़वे अनुभवों को अपनी कमजोरी बनाने के बजाय उन्हें पूरे समाज के उत्थान का जरिया बना लेता है, तो वह केवल एक नाम नहीं रह जाता बल्कि एक जीवंत आंदोलन बन जाता है। मिथिलांचल की पावन और ऐतिहासिक भूमि दरभंगा के सुप्रसिद्ध दंत चिकित्सक, प्रखर चिंतक और राष्ट्रीय धानुक एकता महासभा के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. भवेश भारती मंडल जी का जीवन इसी अभूतपूर्व वैचारिक और व्यावहारिक क्रांति का जीवंत दस्तावेज है। डॉ. मंडल आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, क्योंकि उनका नाम केवल एक सफल चिकित्सक के रूप में ही दर्ज नहीं है, बल्कि वे उस वंचित और शोषित धानुक समाज की सोई हुई चेतना को जगाने वाले एक ओजस्वी मशालवाहक बन चुके हैं जिसने सदियों से अपनी पहचान और राजनैतिक व सामाजिक हक़ के लिए लंबा इंतज़ार किया है। वे एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्होंने समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति की आवाज़ बनकर उसे मुख्यधारा में लाने का बीड़ा उठाया है।

जन्म एवं पारिवारिक बैकग्राउंड

​डॉ. भवेश भारती मंडल के इस वृहद जीवनवृत्त को समझने के लिए हमें उस परिवेश और उन जड़ों की गहराई में जाना होगा जिसने उनके भीतर स्वाभिमान और सामाजिक समरसता की इस मजबूत नींव को तैयार किया। उनका जन्म बिहार के सांस्कृतिक केंद्र दरभंगा के एक अत्यंत मर्यादित, अनुशासित और मध्यमवर्गीय धानुक (मंडल) परिवार में 26 सितम्बर 1975 में हुआ था। ​”इनके पिता का नाम स्वर्गीय दिनेश मंडल और माता का नाम श्रीमती आशा देवी है। माता-पिता द्वारा दिए गए सुसंस्कारों का गहरा प्रभाव इनके व्यक्तित्व पर स्पष्ट रूप से झलकता है।” मिथिला की यह धरती जहाँ एक ओर ज्ञान, अध्यात्म और पांडित्य के लिए पूरी दुनिया में जानी जाती है, वहीं दूसरी ओर गहरे आंतरिक सामाजिक अंतर्विरोधों, कठोर जातिगत पदानुक्रम और सामंती ताकतों के प्रभाव से भी लंबे समय तक ग्रस्त रही है। डॉ. मंडल के पूजनीय पिता जी एक बेहद सीधे, ईमानदार और उच्च मूल्यों को जीने वाले व्यक्ति रहे, जिन्होंने अत्यंत सीमित संसाधनों के बावजूद अपने बच्चों को बेहतरीन संस्कार और उच्च शिक्षा देने की राह चुनी। बचपन से ही युवा भवेश ने अपने आसपास व्याप्त सामाजिक विसंगतियों, ऊंच-नीच के भेदभाव और आर्थिक मोर्चे पर पिछड़े समाज की बेबसी को बेहद करीब से महसूस किया था।

बिहार में धानुक समाज, जो कि अत्यंत पिछड़ी जातियों की श्रेणी में आता है, संख्याबल में मजबूत होने के बावजूद आर्थिक आत्मनिर्भरता और राजनैतिक मंचों पर हमेशा उपेक्षा और हाशिये का शिकार रहा। इसी जमीनी हकीकत ने युवा भवेश के बालमन पर एक अमिट छाप छोड़ी और उन्हें बहुत कम उम्र में ही यह अहसास दिला दिया कि इस सामाजिक विषमता की बेड़ियों को केवल और केवल शिक्षा की धार से ही काटा जा सकता है।

शैक्षणिक यात्रा और संघर्ष

​इसी मजबूत इरादे के साथ उन्होंने उच्च शिक्षा की दिशा में कदम बढ़ाया और दंत चिकित्सा जैसे कठिन एवं गरिमापूर्ण क्षेत्र को अपना करियर चुना। लेकिन डॉ. भवेश भारती मंडल की यह शैक्षणिक यात्रा जितनी गौरवशाली रही है, उसके पीछे का सच उतना ही कड़वा, मानसिक रूप से प्रताड़ित करने वाला और व्यवस्थागत जातिवाद की क्रूरताओं से भरा हुआ था। उन्होंने स्नातक (BDS) की पढ़ाई के लिए जिस डेंटल कॉलेज में दाखिला लिया, वह पूर्ण रूप से एक विशेष उच्च जाति यानी राजपूत समाज के प्रभुत्व और सामंती प्रभाव में संचालित होता था।

उस दौर में कॉलेज के कुल चालीस विद्यार्थियों के बैच में से लगभग बीस से पच्चीस बच्चे राजपूत जाति के थे और बाकी के बचे हुए छात्र अन्य सवर्ण जातियों से आते थे। ऐसे माहौल में एक पिछड़े और विशेषकर धानुक समाज के छात्र के लिए अपनी जगह बनाना और रोज़ के मानसिक दबाव को झेलना किसी कठिन परीक्षा से कम नहीं था।

​कॉलेज के भीतर सवर्ण छात्रों और पिछड़े वर्ग के छात्रों के बीच एक ऐसी अदृश्य लेकिन बेहद मजबूत दीवार खड़ी कर दी गई थी जो कदम-कदम पर आत्मसम्मान को चोट पहुँचाती थी। डॉ. मंडल ने उस दौर में आधुनिक शिक्षा के मंदिरों के भीतर छिपे संस्थागत जातिवाद के जिस सबसे घिनौने रूप को देखा, उसने उनकी सोच को पूरी तरह बदल दिया। कॉलेज का पूरा शैक्षणिक ढांचा और वहाँ के प्रोफेसर निष्पक्षता का चोला ओढ़कर भी भीतर से जातिवादी पूर्वाग्रहों से पूरी तरह ग्रसित थे। परीक्षा के दौरान पिछड़े और वंचित समाज के मेधावी छात्रों की प्रतिभा को नजरअंदाज करते हुए केवल उनकी जाति देखकर मूल्यांकन किया जाता था और उन्हें जानबूझकर केवल परीक्षा पास करने लायक नंबर ही दिए जाते थे ताकि वे कभी शीर्ष पायदान पर न पहुँच सकें और सवर्णों की बराबरी न कर सकें।

​भेदभाव की यह कहानी केवल उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि दैनिक व्यवहार में भी यह कड़वाहट साफ झलकती थी। कॉलेज के डीन और अन्य उच्च पदों पर बैठे लोग, जिन पर पूरे संस्थान को बिना किसी भेदभाव के चलाने की जिम्मेदारी थी, वे भी मानवता और शिक्षक के परम धर्म को पूरी तरह भुला चुके थे। डॉ. मंडल जब भी आदरपूर्वक और विनम्रता के साथ डीन को प्रणाम करते थे, तो डीन अपनी जातिवादी अकड़ में आकर उनसे अपना मुँह फेर लिया करते थे, जबकि दूसरी तरफ जैसे ही कोई उच्च जाति का छात्र उनके सामने आता, तो वे सहर्ष अपनी बाहें फैलाकर उसे आशीर्वाद, प्रोत्साहन और हर तरह का सहयोग दिया करते थे। इस दोहरे चरित्र और लगातार होने वाले अपमान को देखकर किसी भी सामान्य युवक का हौसला टूट सकता था या वह व्यवस्था के आगे घुटने टेक सकता था, लेकिन युवा भवेश एक अलग ही मिट्टी के बने थे। उन्होंने तय किया कि वे इस अन्याय और प्रताड़ना से डरकर न तो अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ेंगे और न ही सामंतियों के सामने आत्मसमर्पण करेंगे।

उन्होंने अपने भविष्य को सुरक्षित रखने और अपने माता-पिता के सपनों को पूरा करने के लिए उस दौर में इस कड़वे घूंट को पूरी सहनशीलता और संयम के साथ बर्दाश्त किया और अपनी पूरी ऊर्जा को पढ़ाई में झोंक दिया। यह उनकी अद्भुत मानसिक दृढ़ता, बौद्धिक क्षमता और अटूट संकल्प का ही परिणाम था कि वे तमाम अवरोधों, साजिशों और पक्षपातों को पीछे छोड़ते हुए एक सफल दंत चिकित्सक बनकर बाहर निकले।

पेशा और संस्थागत चुनौतियाँ

​स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉ. भवेश भारती मंडल की असाधारण योग्यता, चिकित्सीय कौशल और विषय पर मजबूत पकड़ को देखते हुए उन्हें उसी डेंटल कॉलेज में व्याख्याता अर्थात शिक्षक के पद पर नियुक्त किया गया। यह उनके जीवन का एक नया, चुनौतीपूर्ण और गौरवशाली अध्याय था। जो छात्र कभी इसी संस्थान में डीन और प्रोफेसरों की उपेक्षा और तिरस्कार सहता था, अब वह उसी संस्थान में एक शिक्षक के रूप में पूरे मान-सम्मान के साथ खड़ा था।

डॉ. मंडल ने अपने इस शिक्षक के कार्यकाल में कभी भी खुद को किसी से कमतर नहीं आंका और न ही वे अतीत के किसी खौफ में जिए। उन्होंने अध्यापन के इस दौर में पूरी गरिमा, ईमानदारी और वैचारिक दृढ़ता के साथ काम किया। उनके लिए यह केवल एक नौकरी नहीं थी, बल्कि व्यवस्था की आँखों में आँखें डालकर यह साबित करने का मौका था कि एक पिछड़े समाज का बेटा भी ज्ञान की उसी गद्दी पर बैठकर सवर्णों को शिक्षा दे सकता है।

उन्होंने लगभग दस वर्षों तक इस कॉलेज में प्रोफेसर के रूप में अपनी अमूल्य सेवाएँ दीं और अपने बेहतरीन शिक्षण तौर-तरीकों की बदौलत छात्रों के बीच एक अत्यंत लोकप्रिय, आदरणीय और कुशल शिक्षक के रूप में अपनी मजबूत पहचान स्थापित की।

​परंतु इन दस वर्षों का लंबा सफर कभी भी सीधा और आसान नहीं रहा। कॉलेज के प्रबंधन और वहाँ सक्रिय उच्च जाति के सिंडिकेट को एक पिछड़े समाज के युवक का इस तरह सिर उठाकर जीना, बराबरी का दावा करना और व्यवस्था के कायदों को चुनौती देना अंदर ही अंदर खटक रहा था। डॉ. मंडल को लगातार मानसिक रूप से दबाने की कोशिशें की जाती रहीं। उन्हें कभी नौकरी से निकाल देने की, कभी झूठे अनुशासनात्मक मामलों में फंसाने की तो कभी ‘ठीक से रहने’ यानी पुराने सामंती ढर्रे को स्वीकार करने की धमकियाँ और चेतावनियाँ परोक्ष और अपरोक्ष रूप से दी जाती रहीं।

 

लेकिन डॉ. भवेश इन गीदड़ भभकियों से डरने वाले इंसान नहीं थे, वे अपनी शर्तों पर और पूरी मजबूती के साथ संस्थान में डटे रहे। उनके इस गौरवपूर्ण सफर में एक निर्णायक और ऐतिहासिक मोड़ तब आया जब कॉलेज परिसर में एक राजपूत छात्र के साथ उनका वैचारिक विवाद हो गया। उस पूरे मामले में गलती सौ फीसदी उस छात्र की ही थी और यहाँ तक कि उस छात्र ने स्वयं कॉलेज प्रबंधन के सामने अपनी भूल और दुर्व्यवहार को स्वीकार भी कर ली थी। लेकिन कॉलेज का प्रबंधन, जो न्यायप्रिय होने के बजाय पूरी तरह से जातिवादी संकीर्णता की अंधी सुरंग में फंसा हुआ था, उसने सत्य और न्याय का साथ देने के बजाय अपने ‘जाति के लड़के’ को बचाना ज्यादा जरूरी समझा। कॉलेज मैनेजमेंट ने बिना किसी जांच के, पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाते हुए डॉ. भवेश से सीधे तौर पर कह दिया कि गलती आपकी ही है डॉ. भवेश और आपको झुकना होगा।

​यह घटना डॉ. मंडल के व्यक्तिगत और व्यावसायिक आत्मसम्मान पर एक बहुत ही गहरा और असहनीय आघात थी। अभी वे इस अपमानजनक रवैये से उबर भी नहीं पाए थे कि ठीक एक सप्ताह बाद उनके पारिवारिक जीवन पर एक बड़ा संकट आ गया। उनके पूजनीय पिता जी की तबीयत अचानक अत्यंत गंभीर हो गई, जिनका पहले ही होंठ का एक जटिल ऑपरेशन हो चुका था और उन्हें तुरंत देखभाल की सख्त जरूरत थी। डॉ. मंडल ने एक आज्ञाकारी पुत्र का कर्तव्य निभाते हुए अपने पिता की सेवा और चिकित्सा के लिए कॉलेज से दो दिन की आधिकारिक छुट्टी की मांग की।

चूंकि अस्पताल और कॉलेज मैनेजमेंट पहले से ही उनसे खार खाए बैठा था और उन्हें नीचा दिखाने का मौका ढूंढ रहा था, इसलिए उन्होंने इस मानवीय संकट को भी अपनी गंदी राजनीति का जरिया बना लिया। डॉ. भवेश द्वारा बकायदा लिखित रूप में छुट्टी का आवेदन दिए जाने के बावजूद, मैनेजमेंट ने क्रूरता, अमानवीयता और दुर्भावना की सारी हदें पार करते हुए अगले ही दिन उनकी हाजिरी न बनने देने और उन्हें ड्यूटी से अनुपस्थित घोषित करने का एक तानाशाही फरमान जारी कर दिया।

 

​इस अंतिम और बेहद घटिया दर्जे के अपमान ने डॉ. भवेश भारती मंडल के भीतर के स्वाभिमानी इंसान और एक सच्चे बेटे की अंतरात्मा को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया। उन्होंने महसूस किया कि चंद रुपयों की नौकरी की सुरक्षा के लिए वे अपनी अंतरात्मा, अपने उसूलों और अपने बूढ़े पिता के सम्मान का सौदा कभी नहीं कर सकते। उन्होंने उस गरिमाहीन, पक्षपाती और जातिवादी नौकरी को पैर की जूती की तरह समझा और उसे एक झटके में लात मारकर हमेशा के लिए उस कॉलेज का दरवाजा बंद कर दिया।

अस्पताल प्रबंधन को अपनी सत्ता और पैसे के घमंड में यह गलतफहमी थी कि नौकरी जाने के बाद एक पिछड़े समाज का यह युवक आर्थिक तंगी के कारण पूरी तरह टूट जाएगा, बिखर जाएगा और घुटनों के बल बैठकर माफी मांगते हुए वापस काम पर लौटने की भीख मांगेगा। लेकिन डॉ. भवेश ने अपने स्वाभिमानी की जो लकीर खींची थी, वह बहुत लंबी थी। उन्होंने पीछे मुड़कर देखने के बजाय अपनी काबिलियत पर भरोसा किया और दरभंगा शहर में अपने खुद के दो दंत चिकित्सा क्लीनिक स्थापित किए। अपनी कड़ी मेहनत, बेजोड़ चिकित्सीय कौशल, आधुनिक तकनीकों के प्रयोग और मरीजों के प्रति अपनी अत्यधिक संवेदनशीलता व ईमानदारी के बल पर उन्होंने बहुत कम समय में ही सफलता की नई ऊंचाइयों को छू लिया। वे देखते ही देखते दरभंगा और संपूर्ण मिथिलांचल के सबसे प्रतिष्ठित, विश्वसनीय और सफल दंत चिकित्सकों में शुमार हो गए।आज वे आर्थिक रूप से पूरी तरह स्वतंत्र हैं, आत्मनिर्भर हैं और अपने क्लीनिक के जरिए समाज के हर वर्ग को अपनी उत्कृष्ट सेवाएँ दे रहे हैं।

डॉ. भवेश भारती मंडल: सेवा भावना की एक अटूट पारिवारिक विरासत

​डॉ. भवेश भारती मंडल के व्यक्तित्व में समाज सेवा और जन-कल्याण का गुण किसी बाहरी प्रभाव से नहीं, बल्कि उनके रक्त और संस्कारों में समाहित है। उन्हें सेवा भावना का यह अनुपम गुण अपनी पीढ़ियों से आनुवंशिक रूप से विरासत में मिला है। उनका पूरा परिवार दशकों से समाज, विशेषकर धानुक समाज के उत्थान और पीड़ित मानवता की सेवा में समर्पित रहा है।

​इस गौरवशाली विरासत की नींव उनके पूर्वजों ने उस दौर में रखी थी, जब समाज को संगठित करना बेहद कठिन था। डॉ. भवेश के चाचा स्वर्गीय वालेश्वर मंडल जी और पिता स्वर्गीय दिनेश कुमार मंडल जी ने अपने समय में धानुक समाज की उन्नति के लिए अभूतपूर्व योगदान दिया। उनके चाचा स्व. वालेश्वर जी उस कठिन दौर में धानुक समाज की बैठकें और सभाएं आयोजित करते थे, जब न तो मोबाइल की सुविधा थी और न ही हर घर में टेलीफोन उपलब्ध थे।

संचार संसाधनों के अभाव के बावजूद, केवल अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और सेवा भाव के बल पर उन्होंने समाज को एकजुट किया। चिकित्सा और सेवा के क्षेत्र में इस परिवार का योगदान अतुलनीय रहा है। डॉ. भवेश भारती मंडल के दादा स्वर्गीय नथुनी मंडल जी, चाचा स्व. वालेश्वर मंडल जी, चाची स्वर्गीय आनी मंडल जी, दादा की बहन स्वर्गीय बतहिया देवी जी, पिता स्व. दिनेश कुमार मंडल जी, फूफा स्वर्गीय लखन मंडल जी और स्वयं उनकी धर्मपत्नी श्रीमती संगीता कुमारी मंडल जी ने दरभंगा मेडिकल कॉलेज अस्पताल (DMCH) में अपनी सेवाएं दी हैं। अस्पताल के माध्यम से इस परिवार ने अनगिनत असहाय और बीमार लोगों की निःस्वार्थ सेवा की, जिससे समाज सेवा इस परिवार की पहचान बन गई।

​यही कारण है कि डॉ. भवेश भारती मंडल आज उसी सेवा भाव को आगे बढ़ा रहे हैं। संतोष की बात यह है कि सेवा की यह मशाल यहीं बुझने वाली नहीं है; उनकी आने वाली पीढ़ी में उनके पुत्र दिव्यांशु भारती मंडल जी भी अभी से समाज सेवा के कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। स्पष्ट है कि डॉ. भवेश भारती का जीवन अपनी पारिवारिक विरासत को अक्षुण्ण रखते हुए समाज के कल्याण के लिए पूरी तरह समर्पित है।

समाज सेवा और सांगठनिक नेतृत्व

​अपनी इसी व्यावसायिक और आर्थिक स्वतंत्रता के बाद डॉ. भवेश भारती मंडल ने महसूस किया कि उनके जीवन का असली मकसद केवल पैसा कमाना या एक सफल डॉक्टर बनकर ऐशो-आराम की जिंदगी जीना नहीं हो सकता। वे इस कड़वे सच से भली-भांति वाकिफ थे कि जिस जातिगत दंश, मानसिक प्रताड़ना और संस्थागत अपमान को उन्होंने झेला है, वह बिहार और पूरे देश के करोड़ों शोषित, वंचित, पिछड़े और विशेषकर धानुक समाज के लोग हर रोज़ अपनी जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर झेलते हैं। अंतर बस इतना है कि हर किसी के पास डॉ. भवेश जैसी उच्च शिक्षा, वैसा साहस या वैसी आर्थिक मजबूती नहीं होती कि वे व्यवस्था की तानाशाही के खिलाफ खड़े हो सकें या उसकी नौकरी को लात मार सकें।

ज्यादातर लोग अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों और भूख के डर से घुटने टेक देते हैं और अपनी गरिमा को रोज़ मरते हुए देखते हैं। इसी गहरी पीड़ा और समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व के बोध ने उन्हें सामाजिक सक्रियता की ओर मोड़ा उन्होंने 2016 में अमर शहीद रामफल मंडल की जयंती मनाना शुरू किया, दरभंगा क़े सदर प्रखंड काँटी गांव में अमर शहीद रामफल क़े जयंती पर मुफ्त चिकित्सा शिविर लगाया जिसमे128 मरीजों की मुफ्त चिकित्सा की गयी. इसके बाद उन्होंने धानुक समाज को संगठित करने के संकल्प के साथ राष्ट्रीय धानुक एकता महासभा की स्थापना की और उसके राष्ट्रीय संयोजक के रूप में कमान संभाली।

धानुक समाज को संगठित करने की यह आवश्यकता इसलिए भी अपरिहार्य थी क्योंकि बिहार की राजनीति और सामाजिक संरचना में धानुक यानी मंडल जाति एक अत्यंत महत्वपूर्ण, व्यापक और सघन आबादी होने के बावजूद हमेशा से राजनैतिक दलों द्वारा केवल एक मूक ‘वोट बैंक’ के रूप में इस्तेमाल की जाती रही थी। चुनाव के समय तमाम बड़े राजनैतिक दल इस समाज के द्वारे आते थे, लोक लुभावन वादे करते थे, लेकिन जैसे ही सत्ता की मलाई बांटने का समय आता, इस समाज को पूरी तरह दरकिनार कर दिया जाता था। इस समाज के पास लंबे समय से कोई ऐसा प्रखर, निडर और स्वतंत्र नेतृत्व नहीं था जो किसी राजनैतिक आका या पार्टी के एजेंडे के दबाव में आए बिना, सीधे सत्ताधीशों की आँखों में आँखें डालकर अपने समाज के हक़ और हिस्सेदारी की बात कर सके।

​डॉ. भवेश भारती मंडल ने ‘धानुक एकता’ के नारे को किसी संकीर्ण जातिवादी द्वेष का जरिया नहीं बनाया, बल्कि उन्होंने इसे एक सकारात्मक ‘जातीय चेतना, शैक्षणिक उत्थान और स्वाभिमान के महा-आंदोलन’ के रूप में तब्दील कर दिया। वे गाँव-गाँव, कस्बों और शहरों का सघन दौरा करते हैं, चौपालें लगाते हैं और अपने समाज के लोगों को यह समझाते हैं कि जब तक तुम संगठित नहीं होगे, जब तक तुम्हारी अपनी स्वतंत्र राजनैतिक आवाज नहीं होगी, तब तक कोई भी सामंती ताकत या राजनैतिक दल तुम्हें तुम्हारा वाजिब हक़ नहीं देगा।

​चिकित्सा के क्षेत्र में भी डॉ. भवेश भारती मंडल का योगदान अद्वितीय है। दरभंगा और इसके आसपास के ग्रामीण इलाकों में उन्हें केवल एक बड़ा डॉक्टर नहीं माना जाता, बल्कि वे गरीबों के लिए एक सच्चे मसीहा के रूप में पूजे जाते हैं। उन्होंने चिकित्सा जैसे पवित्र पेशे को कभी भी विशुद्ध रूप से धन कमाने का जरिया या अंधा व्यापार नहीं बनने दिया। उनके क्लीनिक के दरवाजे समाज के हर उस गरीब, लाचार और बेबस व्यक्ति के लिए हमेशा खुले रहते हैं जिसके पास इलाज के लिए पैसे नहीं होते। डॉ. मंडल नियमित रूप से अपने संगठन के बैनर तले मिथिलांचल के अत्यंत सुदूर, बाढ़ प्रभावित और पिछड़े ग्रामीण इलाकों में विशाल निःशुल्क दंत चिकित्सा और स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन करते हैं।

इन शिविरों में न केवल हजारों मरीजों के दांतों और मसूड़ों की आधुनिक मशीनों से जांच की जाती है, बल्कि उन्हें मुफ्त में दवाइयाँ, टूथपेस्ट और ब्रश भी बांटे जाते हैं तथा ओरल हाइजीन यानी मुंह के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के प्रति जागरूक किया जाता है।

​इसके अलावा, अपनी पुरानी शैक्षणिक प्रताड़ना को याद रखते हुए वे यह सुनिश्चित करते हैं कि धानुक या किसी भी अन्य पिछड़े समाज का कोई भी मेधावी और होनहार बच्चा केवल गरीबी या धन के अभाव के कारण अपनी पढ़ाई न छोड़ पाए। वे हर साल व्यक्तिगत स्तर पर दर्जनों गरीब छात्रों की कॉलेज की फीस भरते हैं, उन्हें किताबें, कॉपियाँ और हॉस्टल में रहने का खर्च मुहैया कराते हैं ताकि वे पढ़-लिखकर समाज का नाम रोशन कर सकें।

मिथिलांचल में जब भी भीषण बाढ़ या कोई अन्य प्राकृतिक आपदा आती है, तो डॉ. मंडल अपने क्लीनिक को छोड़कर खुद राहत सामग्री, भोजन और मेडिकल किट लेकर बाढ़ प्रभावितों के बीच नावों से पहुँच जाते हैं और तब तक डटे रहते हैं जब तक स्थिति सामान्य नहीं हो जाती। डॉ भावेश भारती जी क़े इस परिपाटी को उनके पुत्र दिव्यांशु भारती भी आगे बढ़ा रहे जिन्हे समाज सेवा में उत्कृष्ट योगदान क़े लिये समाज क़े बीच सम्मानित किया गया।

जीवन का दर्शन

​डॉ. भवेश भारती मंडल का जीवन दर्शन पूरी तरह से मानवीय गरिमा, स्वाभिमान और कर्मयोग पर आधारित है। वे एक ऐसे विचार के संवाहक हैं जो यह मानता है कि आत्मसम्मान के बिना भौतिक सुख और धन-दौलत सब व्यर्थ हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि यदि कोई व्यवस्था, कोई संस्थान या कोई नौकरी आपको आपकी जाति या पृष्ठभूमि के कारण कमतर आंकती है, तो उस व्यवस्था के सामने झुकना अपनी अंतरात्मा की हत्या करने जैसा है। डॉ. मंडल अक्सर युवाओं से संवाद करते हुए कहते हैं कि “यदि कोई दरवाज़ा आपकी गरिमा को ठेस पहुँचाता है, तो उस दरवाज़े को हमेशा के लिए बंद कर देना चाहिए और अपनी काबिलियत के दम पर अपना खुद का साम्राज्य खड़ा करना चाहिए।”

​उनके दर्शन में शिक्षा और योग्यता का स्थान सर्वोपरि है। वे मानते हैं कि समाज का वास्तविक सशक्तिकरण केवल राजनैतिक नारों से नहीं, बल्कि उच्च और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से संभव है। डॉ. मंडल का जीवन इस बात का अनूठा उदाहरण है कि एक शोषित पृष्ठभूमि से आने वाला व्यक्ति भी यदि अपनी रीढ़ सीधी रखे और अपने सिद्धांतों से समझौता न करे, तो वह बड़ी से बड़ी सामंती ताकतों और पक्षपाती सिंडिकेट को घुटने टेकने पर मजबूर कर सकता है।
वे अतीत के दुखों पर रोने के बजाय उनसे सीख लेकर वर्तमान को बदलने और भविष्य को संवारने के दर्शन में विश्वास रखते हैं।

सामाजिक सरोकार और वैचारिक दृष्टिकोण

​डॉ. भवेश भारती मंडल का सामाजिक सरोकार केवल उनके अपनी जाति या समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि वे हर उस व्यक्ति के हक की बात करते हैं जो किसी भी प्रकार के सामाजिक या संस्थागत भेदभाव का शिकार है। वे अक्सर सार्वजनिक मंचों पर उच्च शिक्षण संस्थानों में पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों के अधिकारों की पुरज़ोर वकालत करते हैं। उनका वैचारिक दृष्टिकोण बेहद व्यापक है।

वे देश की शैक्षणिक और प्रशासनिक प्रणालियों में पारदर्शिता और सामाजिक न्याय के पक्षधर हैं।
​डॉ. मंडल का एक बेहद महत्वपूर्ण विचार यह भी है कि देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में एंटी-डिस्क्रिमिनेशन (भेदभाव विरोधी) कानूनों और सेलों को इस कदर मजबूत किया जाना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी के किसी भी होनहार बच्चे को अपनी जाति के कारण हीनभावना का शिकार न होना पड़े और न ही किसी अधिकारी या डीन के सामने अपना सिर झुकाना पड़े। वे चाहते हैं कि शिक्षा के मंदिरों में केवल और केवल योग्यता को सम्मान मिले, न कि किसी के उपनाम या सामाजिक रसूख को।

​महत्वपूर्ण बात यह है कि धानुक समाज के अधिकारों की इतनी प्रखर लड़ाई लड़ने के बावजूद डॉ. भवेश भारती मंडल के मन में किसी भी अन्य जाति या समाज के प्रति कोई व्यक्तिगत विद्वेष, नफरत या संकीर्णता नहीं है। वे किसी जाति विशेष के विरोधी नहीं हैं, बल्कि वे उस सामंती, दमनकारी और अमानवीय ‘मानसिकता’ के धुर विरोधी हैं जो एक इंसान को दूसरे इंसान से कमतर आंकती है और जाति के आधार पर किसी की प्रतिभा का गला घोटती है। वे समाज के सभी शोषितों, पीड़ितों, दलितों और पिछड़ों की व्यापक एकजुटता के प्रबल समर्थक हैं ताकि एक समतामूलक और न्यायप्रिय समाज का निर्माण हो सके जहाँ हर व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के आगे बढ़ने के समान अवसर मिल सकें।

औऱ अंत में कहना चाहूंगा ​डॉ. भवेश भारती मंडल का जीवन परिचय और उनका अब तक का सफरनामा केवल एक व्यक्ति विशेष की कामयाबी की दास्तान नहीं है, बल्कि यह देश के हर उस युवा, हर उस नागरिक के लिए प्रेरणा का एक अखंड स्रोत है जो विपरीत से विपरीत परिस्थितियों, सामाजिक अवरोधों और संस्थागत तानाशाही से लड़कर व्यवस्था को बदलने का माद्दा रखता है। एक ऐसे दौर में जहाँ लोग छोटी-मोटी सुख-सुविधाओं, नौकरियों की सुरक्षा और आर्थिक लाभ के लिए अपने आत्मसम्मान को गिरवी रख देने में संकोच नहीं करते, वहाँ डॉ. भवेश का उस रसूखदार कॉलेज मैनेजमेंट के मुंह पर इस्तीफा दे मारना, उनके तुगलकी फरमानों को धता बताना और अपनी शर्तों पर एक नई स्वतंत्र राह चुनकर पूरे समाज के कल्याण में लग जाना, उनके असाधारण, अद्वितीय और अनुकरणीय चरित्र को रेखांकित करता है।

​दरभंगा के इस लाडले दंत चिकित्सक और राष्ट्रीय धानुक एकता महासभा के इस समर्पित, ऊर्जावान राष्ट्रीय संयोजक ने अपने कर्मों से यह अकाट्य सत्य साबित कर दिया है कि संसार में स्वाभिमान से बढ़कर कोई दूसरा धन नहीं है और अपने समाज व मानवता की नि:स्वार्थ सेवा से बढ़कर कोई दूसरा धर्म नहीं है। आने वाले समय में धानुक समाज, मिथिलांचल और संपूर्ण बिहार के सामाजिक, राजनैतिक और बौद्धिक क्षितिज पर डॉ. भवेश भारती मंडल का यह प्रखर नेतृत्व और उनके द्वारा बोए गए वैचारिक चेतना के बीज एक नए, सशक्त और समतावादी युग का सूत्रपात करेंगे, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को हमेशा यह याद दिलाता रहेगा कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, यदि आपके भीतर सत्य, साहस और अपने समाज के प्रति अगाध प्रेम है, तो आप हर जंग जीत सकते हैं और समाज को एक नई दिशा दे सकते हैं।

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