सत्यनारायण मंडल जी का व्यक्तित्व केवल एक वर्ग विशेष तक सीमित नहीं है; वे समग्र वंचित समाज की शैक्षणिक, आर्थिक और राजनीतिक हिस्सेदारी के सच्चे पैरोकार हैं। जमीनी स्तर पर शिक्षा का प्रसार और समाज को आपसी विवादों से दूर रखने के उनके प्रयास यह साबित करते हैं कि वे केवल एक राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि दूरदर्शी समाज सुधारक और कुशल संगठनकर्ता हैं। उनका जीवन संदेश देता है कि सच्चा परिवर्तन निरंतर त्याग और निस्वार्थ समर्पण से ही संभव है।
(विनोद आनंद )
भा रतीय समाज की जटिल जातीय संरचना सदियों से सामाजिक न्याय की वह अमर ज्वाला रही है, जो अंधकार के घने कुहासे को चीरती हुई आगे बढ़ती है। बिहार, जो सामाजिक चेतना और संघर्ष की पावन भूमि रहा है, ने अनेक ऐसे सपूतों को जन्म दिया है जिन्होंने अपनी पीढ़ी की पीड़ा को शक्ति में बदल दिया। ऐसे ही एक प्रखर व्यक्तित्व हैं सत्यनारायण मंडल — धानुक समुदाय के चेतना जगाने वाले प्रणेता, वंचितों के अधिकारों के निर्भीक उद्घोषक और सामाजिक समरसता के अथक योध्दा।
धानुक समुदाय, जिसकी धमनियों में प्राचीन धनुर्धारी योद्धाओं का रक्त बहता है, बिहार और झारखंड की मिट्टी में आज भी अपनी पहचान की तलाश में संघर्षरत है। कृषि, छोटे-मोटे व्यवसाय और श्रम पर आश्रित यह समुदाय लंबे समय तक सामाजिक उपेक्षा, आर्थिक शोषण और शैक्षणिक वंचना का शिकार रहा। ठीक उसी अंधेरे को चीरते हुए सत्यनारायण मंडल ने अपने समुदाय में शिक्षा की ज्योति, एकता का मंत्र और अधिकारों की तलवार थामी। उनका जीवन व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं, बल्कि सामूहिक उत्थान का एक महाकाव्य है।
ग्रामीण मिट्टी से उभरा संघर्षशील युगपुरुष
सत्यनारायण मंडल का जन्म बिहार के सुपौल जिले के निर्मली क़े एक साधारण ग्रामीण परिवेश में हुआ। धानुक समुदाय से जुड़े मंडल परिवार में उनका बचपन उन चुनौतियों से घिरा था जो उस समय के अधिकांश पिछड़े समुदायों के बच्चों का साझा भाग्य थीं। शिक्षा की कमी, सामाजिक भेदभाव, सरकारी योजनाओं से दूरी और दैनिक जीविका की जद्दोजहद — ये सब उनके कच्चे मन पर गहरी छाप छोड़ गए।
परंतु विपरीत परिस्थितियाँ अक्सर महान व्यक्तित्वों को जन्म देती हैं। युवावस्था में उनके मन पर डॉ. भीमराव अंबेडकर की क्रांतिकारी विचारधारा, डॉ. राममनोहर लोहिया की समाजवादी चेतना और जननायक कर्पूरी ठाकुर की सादगीपूर्ण संघर्षशीलता का गहरा प्रभाव पड़ा। इन महान विभूतियों ने उन्हें सामाजिक कुरीतियों — ऊँच-नीच, छुआछूत और वर्गीय शोषण — के विरुद्ध विद्रोह का पाठ पढ़ाया।
1974 का ज्वालामुखी: छात्र आंदोलन और आपातकाल की अग्निपरीक्षा
1974 का वर्ष उनके जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ साबित हुआ। जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने ‘संपूर्ण क्रांति’ का उद्घोष किया, तब सत्यनारायण मंडल पूरी तरह उस आग में कूद पड़े। उस समय बिहार छात्र संघर्ष समिति के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और सचिव सुशील कुमार मोदी थे। मंडल जी ने न केवल आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की, बल्कि इंटरमीडिएट की परीक्षा का बहिष्कार कर दिया।
आंदोलन की चिंगारियों ने उन्हें तीन बार जेल की सलाखों के पीछे धकेल दिया। आपातकाल के दौरान तो स्थिति और भी विकट हो गई। उनके ऊपर डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स (डी.आई.आर.) लागू कर दिया गया।
कई वर्षों तक उन्हें भूमिगत जीवन जीना पड़ा। पढ़ाई छूट गई, सपने टूटे, पर संकल्प नहीं। आपातकाल समाप्त होने के बहुत बाद उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की। यह संघर्ष उनकी आत्मा को इस्पात की तरह मजबूत बनाता गया।
वैचारिक प्रेरणा और राजनीतिक जागृति
1990 के दशक में जब बिहार में सामाजिक न्याय की लहर उठी, तब वे आदरणीय लालू प्रसाद यादव की विचारधारा से गहराई से प्रभावित हुए। लालू जी का वंचितों को मुख्यधारा में लाने का संकल्प उनके लिए प्रेरणा बना। साथ ही, धनिक लाल मंडल और पूर्व सांसद मंगनी लाल मंडल जैसे नेताओं के निकट संपर्क ने उन्हें व्यावहारिक राजनीति और सामाजिक कार्य की गहराई प्रदान की।उनका दृष्टिकोण स्पष्ट और व्यापक था!
वे कहते हैं -“मैं केवल धनुवंशी समाज का उत्थान नहीं चाहता, बल्कि समस्त वंचित समुदायों की शैक्षणिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक भागीदारी का पुरजोर पक्षधर हूँ।”
सरकारी सेवा से सामाजिक सेवा तक
छात्र राजनीति के बाद वे सरकारी सेवा में आए। बिहार राज सिंचाई विभाग में कार्यरत रहते हुए भी उनकी सामाजिक चेतना कभी शांत नहीं हुई। उनकी ईमानदारी, संगठन क्षमता और नेतृत्व गुणों को देखते हुए उन्हें बिहार राज सिंचाई कर्मचारी यूनियन का जिला से राज्य स्तर तक दायित्व सौंपा गया। राज्य अध्यक्ष के रूप में उन्होंने कर्मचारियों के हितों की अथक लड़ाई लड़ी। आज भी उन्हें एक सशक्त ‘संगठनकर्ता’ के रूप में याद किया जाता है।
सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने बिना एक पल गँवाए खुद को पूर्ण रूप से समाज और विचारधारा को समर्पित कर दिया। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) में शामिल होकर उन्होंने अपनी निष्ठा साबित की। उन्हें अति पिछड़ा प्रकोष्ठ का प्रदेश उपाध्यक्ष और वर्तमान में सुपौल जिला अध्यक्ष बनाया गया।
धानुक चेतना समिति: सपनों का संगठित स्वरूप
सत्यनारायण मंडल की सबसे महत्वपूर्ण देन है ‘धानुक चेतना समिति’ की स्थापना। यह समिति धानुक समाज को शिक्षा, स्वास्थ्य, एकता और राजनीतिक सशक्तिकरण से जोड़ने का एक सजीव मंच बन गई है। “नो प्रॉफिट नो लॉस” के सिद्धांत पर चलते हुए समिति कोचिंग केंद्र चला रही है, छात्रों को सस्ती सामग्री उपलब्ध करा रही है और जाति जनगणना जैसे मुद्दों पर निरंतर संघर्ष कर रही है। यह समिति बिहार के कई जिलों में सक्रिय है और धानुक परिवारों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य कर रही है।
बहुआयामी सामाजिक योगदान
शिक्षा उनके कार्यक्रमों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्तंभ रही है। उन्होंने ‘दिव्य ज्योति गुरुकुल’ के साथ मिलकर मेधावी छात्रों को सम्मानित किया। स्वतंत्रता दिवस पर सैकड़ों छात्र-छात्राओं को कॉपी-कलम वितरित किए। सुपौल के बड़हरा, बेलही और पिपरा क्षेत्रों में सस्ती कोचिंग केंद्र खोलकर उन्होंने गरीब विद्यार्थियों के सपनों को पंख दिए।
वे धानुक मिलन समारोह, धानुक एकता महासभा और विभिन्न सम्मेलनों के माध्यम से समाज को एकजुट करते रहे। अमर शहीद वीर रामफल मंडल की स्मृति और धनिक लाल मंडल जैसे पूर्वजों की स्मृति सभाओं के जरिए उन्होंने युवा पीढ़ी में गौरव का भाव जगाया। स्थानीय विवादों में वे हमेशा सुलह और समझौते का रास्ता अपनाने की सलाह देते हैं। महिला सशक्तिकरण भी उनके कार्यक्रमों का अभिन्न अंग रहा। उन्होंने छात्राओं को विशेष प्रोत्साहन दिया।
उपलब्धियाँ और विरासत
सत्यनारायण मंडल ने धानुक चेतना समिति को बिहार स्तर पर एक मजबूत, अनुशासित और प्रभावी संगठन बना दिया। सैकड़ों गरीब छात्रों को सहायता देकर उन्होंने पीढ़ीगत गरीबी तोड़ने का कार्य किया। सुपौल, मधुबनी, भागलपुर, मरौना आदि क्षेत्रों में वंचितों की आवाज उन्होंने बुलंद की। राजनीतिक शुचिता और एकता पर उनका कथन आज भी प्रासंगिक है:
“जब तक वंचित समाज एकजुट नहीं होगा, मनुवादी शक्तियाँ हमें बाँटकर शोषित करती रहेंगी। हमें हिंदू-मुसलमान के नाम पर लड़ने वाली साजिशों को नाकाम करना होगा।”
चुनौतियाँ और प्रेरणा
रास्ता आसान नहीं रहा। संसाधनों की कमी, आनुपातिक प्रतिनिधित्व का अभाव और आंतरिक मतभेद जैसी चुनौतियाँ बार-बार आईं। परंतु अटूट संकल्प और त्याग की भावना के साथ उन्होंने इन सबका सामना किया।
अंततः सत्यनारायण मंडल का जीवन 1974 के छात्र आंदोलन की आग, जेल की ठंडी दीवारों, भूमिगत संघर्ष, कर्मचारी आंदोलन की जिम्मेदारियों और आज के सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता का एक अद्भुत समन्वय है। वे न केवल धानुक समुदाय के लिए, बल्कि समस्त वंचित वर्ग के लिए एक प्रेरणा स्तंभ हैं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा परिवर्तन व्यक्तिगत सुख-आराम त्यागकर, निरंतर प्रयास और अटूट समर्पण से ही संभव होता है। धानुक चेतना समिति और उनके सामाजिक कार्य युवा पीढ़ी के लिए वह दीपक हैं जो अंधेरी राहों में भी दिशा दिखाते रहेंगे।
सत्यनारायण मंडल जैसे व्यक्तित्व साबित करते हैं कि इतिहास हमेशा उन लोगों द्वारा रचा जाता है जो अपनी पीड़ा को शक्ति में बदल देते हैं और दूसरों के उत्थान को अपना मिशन बना लेते हैं।

