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मधुबनी जिला का रांटी गाँव जिसने मिथिलांचल के लोक कला को दिलाई राष्ट्रीय पहचान

ByBinod Anand

May 7, 2025

मिथिलांचल की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अत्यंत समृद्ध है। यह क्षेत्र प्राचीन विदेह साम्राज्य का हिस्सा रहा है, जिसका उल्लेख रामायण और महाभारत जैसे महान ग्रंथों में मिलता है। यहाँ की भाषा, मैथिली, अपनी मधुरता और साहित्यिक परंपरा के लिए जानी जाती है। मिथिला की लोक कथाएं, गीत, और रीति-रिवाज जीवन के हर पहलू को छूते हैं। इसी सांस्कृतिक परिवेश में मधुबनी चित्रकला का जन्म हुआ और रांटी जैसे गाँवों ने इसे पोषित किया।

भा रत की सांस्कृतिक विविधता अपनी अनूठी कलाओं, परंपराओं और जीवन शैलियों के कारण विश्व भर में जानी जाती है। इस विशाल देश के हर कोने में ऐसी विशिष्टताएं छिपी हैं, जिन्होंने समय-समय पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। बिहार का मिथिलांचल क्षेत्र, अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और विशिष्ट कला रूपों के लिए प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र के कई गाँव अपनी पारंपरिक कला और संस्कृति को जीवंत रखे हुए हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने अपनी कला के माध्यम से पूरे देश में एक विशेष स्थान हासिल किया है। ऐसा ही एक गाँव है मधुबनी जिले का रांटी गाँव, जो आज पूरे देश में अपनी अद्वितीय लोक कला मधुबनी चित्रकला के लिए जाना जाता है।

मिथिलांचल का हृदयस्थल है रांटी गाँव

रांटी गाँव, मिथिलांचल के हृदयस्थल में बसा एक शांत और साधारण सा गाँव है। यहाँ की मिट्टी में लोक संस्कृति की गहरी जड़ें हैं, जो पीढ़ियों से चली आ रही कला परंपराओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। कभी घरों की दीवारों और आंगन को सजाने वाली यह कला, आज कैनवास और कागज पर उतरकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कला मंचों पर अपनी पहचान बना चुकी है। रांटी गाँव, इस कला के उद्गम और विकास का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है, और आज भी यहाँ के कलाकार इस पारंपरिक कला को जीवित रखने और नई ऊंचाइयों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

मिथिलांचल की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि

मिथिलांचल की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अत्यंत समृद्ध है। यह क्षेत्र प्राचीन विदेह साम्राज्य का हिस्सा रहा है, जिसका उल्लेख रामायण और महाभारत जैसे महान ग्रंथों में मिलता है। यहाँ की भाषा, मैथिली, अपनी मधुरता और साहित्यिक परंपरा के लिए जानी जाती है। मिथिला की लोक कथाएं, गीत, और रीति-रिवाज जीवन के हर पहलू को छूते हैं। इसी सांस्कृतिक परिवेश में मधुबनी चित्रकला का जन्म हुआ और रांटी जैसे गाँवों ने इसे पोषित किया।

मिथिला पेंटिंग

मधुबनी चित्रकला, जिसे मिथिला पेंटिंग के नाम से भी जाना जाता है, एक प्राचीन लोक कला है जिसकी शुरुआत मिथिला क्षेत्र के गाँवों में हुई। यह कला पीढ़ी दर पीढ़ी महिलाओं द्वारा हस्तांतरित होती रही है। प्रारंभ में, ये चित्रकलाएँ घरों की दीवारों और आंगन को शुभ अवसरों जैसे विवाह, जन्म और त्योहारों पर सजाने के लिए बनाई जाती थीं। इन चित्रों में प्रकृति, देवी-देवताओं, और सामाजिक जीवन के विभिन्न दृश्यों को सरल और प्रतीकात्मक रूप में दर्शाया जाता था। रंगों का प्रयोग प्राकृतिक स्रोतों से किया जाता था, जैसे कि चावल के पाउडर से सफेद, हल्दी से पीला, और विभिन्न पौधों की पत्तियों और फूलों से अन्य रंग प्राप्त किए जाते थे।

मधुबनी चित्रकला के इतिहास में रांटी गाँव का एक विशेष स्थान

रांटी गाँव का मधुबनी चित्रकला के इतिहास में एक विशेष स्थान है। माना जाता है कि इस कला के शुरुआती और महत्वपूर्ण कलाकारों में से कई रांटी गाँव से ही थे। उन्होंने न केवल इस पारंपरिक कला को जीवित रखा बल्कि अपनी रचनात्मकता और कौशल से इसे नई दिशाएं भी दीं। रांटी गाँव की महिलाओं ने अपनी कला के माध्यम से सामाजिक बंधनों को तोड़ा और आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाया।

मधुबनी चित्रकला को राष्ट्रीय पहचान 1960 में मिली

मधुबनी चित्रकला को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान 1960 के दशक में मिली, जब सूखे के कारण क्षेत्र की आर्थिक स्थिति खराब हो गई थी। तब, अखिल भारतीय हस्तशिल्प बोर्ड के अधिकारियों ने इस कला को आय का स्रोत बनाने के लिए प्रोत्साहित किया। रांटी गाँव की महिलाओं ने इस अवसर को हाथों-हाथ लिया और अपनी पारंपरिक कला को कागज और कैनवास पर उतारना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे, इन चित्रों की सुंदरता और विशिष्टता ने कला प्रेमियों और संग्राहकों का ध्यान आकर्षित किया।

रांटी गाँव के कलाकारों ने मधुबनी चित्रकला की विभिन्न शैलियों को विकसित किया, जिनमें प्रमुख हैं:

कचनी (Kachni): यह शैली रेखाओं और बिंदुओं पर आधारित होती है और इसमें ज्यामितीय आकृतियों का प्रयोग अधिक होता है।

भरनी (Bharni): इस शैली में देवी-देवताओं और पौराणिक कथाओं के दृश्यों को चटकीले रंगों से भरा जाता है।

गोबर (Gobar): यह शैली मुख्य रूप से सामाजिक और दैनिक जीवन के दृश्यों को दर्शाती है और इसमें प्राकृतिक रंगों का प्रयोग अधिक होता है।

तांत्रिक (Tantrik): इस शैली में तांत्रिक प्रतीकों और देवी-देवताओं की पूजा से संबंधित आकृतियों को दर्शाया जाता है।

यमुना (Yamuna): यह अपेक्षाकृत नई शैली है जिसमें समकालीन विषयों और सामाजिक मुद्दों को मधुबनी शैली में चित्रित किया जाता है।

रांटी गाँव की कई महिला कलाकारों ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी कला का प्रदर्शन किया और पुरस्कार जीते। इन कलाकारों ने न केवल अपनी कला को पहचान दिलाई बल्कि रांटी गाँव को भी मधुबनी चित्रकला के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित किया। उनके अथक प्रयासों के कारण आज रांटी गाँव देश भर में मधुबनी कला के पर्याय के रूप में जाना जाता है।

राष्ट्रीय स्तर पर रांटी गाँव की चर्चा कई कारणों से होती है:

मधुबनी कला का केंद्र: रांटी गाँव को मधुबनी चित्रकला का हृदय माना जाता है। यहाँ आज भी बड़ी संख्या में कलाकार इस पारंपरिक कला को जीवित रखे हुए हैं और नई पीढ़ी को इसका प्रशिक्षण दे रहे हैं। गाँव की गलियों में घूमते हुए दीवारों पर बनी रंगीन चित्रकलाएँ इस कला की जीवंतता का प्रमाण देती हैं।

महिला सशक्तिकरण का प्रतीक: रांटी गाँव की महिलाओं ने मधुबनी कला के माध्यम से न केवल अपनी आर्थिक स्थिति सुधारी है बल्कि समाज में अपनी पहचान भी बनाई है। यह गाँव महिला सशक्तिकरण का एक प्रेरणादायक उदाहरण है, जहाँ महिलाओं ने अपनी पारंपरिक कला को अपनी शक्ति बनाया है।

सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण: रांटी गाँव ने मधुबनी चित्रकला की सदियों पुरानी परंपरा को आज भी अक्षुण्ण रखा है। यहाँ के कलाकार आज भी पारंपरिक तकनीकों और विषयों का पालन करते हुए इस कला को आगे बढ़ा रहे हैं। यह गाँव भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

कला पर्यटन का आकर्षण: मधुबनी चित्रकला की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पहचान के कारण रांटी गाँव कला प्रेमियों और पर्यटकों के लिए एक आकर्षण का केंद्र बन गया है। लोग इस गाँव में आकर कलाकारों से मिलते हैं, उनकी कला को देखते हैं और खरीदते हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलता है।

पुरस्कार और सम्मान: रांटी गाँव के कई कलाकारों को उनकी उत्कृष्ट कला के लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया है। इन पुरस्कारों ने न केवल कलाकारों का मनोबल बढ़ाया है बल्कि रांटी गाँव को भी राष्ट्रीय मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है।

हालांकि, रांटी गाँव को अपनी इस पहचान को बनाए रखने और आगे बढ़ाने के लिए कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कलाकारों को उचित मंच और बाजार उपलब्ध कराने, नकली और घटिया कलाकृतियों से बचाने, और युवा पीढ़ी को इस कला से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयास करने की आवश्यकता है।

सरकार और विभिन्न गैर-सरकारी संगठन भी रांटी गाँव के कलाकारों को सहायता प्रदान करने के लिए कई पहल कर रहे हैं। कला प्रदर्शनियों का आयोजन, प्रशिक्षण कार्यक्रम, और विपणन सहायता के माध्यम से कलाकारों को अपनी कला को व्यापक दर्शकों तक पहुंचाने में मदद मिल रही है।

आज, जब हम भारत की लोक कलाओं की बात करते हैं, तो मधुबनी चित्रकला का उल्लेख अवश्य होता है, और जब मधुबनी चित्रकला की बात होती है, तो रांटी गाँव का नाम स्वतः ही सामने आ जाता है। यह गाँव न केवल एक भौगोलिक स्थान है, बल्कि यह एक जीवंत कला केंद्र है, जो अपनी पारंपरिक कला के माध्यम से पूरे देश को अपनी सांस्कृतिक समृद्धि से परिचित करा रहा है। रांटी गाँव की कहानी, कला, संस्कृति और सशक्तिकरण की एक प्रेरणादायक कहानी है, जो यह दर्शाती है कि कैसे एक छोटे से गाँव की कला पूरे देश में अपनी पहचान बना सकती है और अपनी विशिष्टता के लिए चर्चा का विषय बन सकती है। यह गाँव मिथिलांचल की सांस्कृतिक धरोहर का एक अमूल्य रत्न है, जिसे न केवल संरक्षित करने की आवश्यकता है, बल्कि इसे और अधिक ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए सतत प्रयास करने की भी आवश्यकता है।

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