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सम्पादकीय: दहेज की दहशत—समाज का नैतिक पतन और मानवीय संवेदना का ह्रास

ByBinod Anand

Jul 5, 2025

 

 

रिधान्या की आत्महत्या एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि समाज के उस खोखलेपन का प्रतीक है, जहाँ रिश्तों की नींव पैसे और संपत्ति पर रख दी गई है। विवाह, जो दो आत्माओं के मिलन और दो परिवारों के एक होने का पवित्र बंधन माना जाता है, अब लेन-देन और सौदेबाजी का मंच बन चुका है। माता-पिता अपनी बेटियों की खुशियों के लिए जीवन भर की कमाई लुटा देते हैं, फिर भी उनकी बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं। यह समाज की संवेदनहीनता और नैतिक पतन का चरम है।

विनोद आनंद

क ओर भारत ने विज्ञान, तकनीक, शिक्षा और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक कुरीतियाँ, विशेषकर दहेज प्रथा, आज भी हमारे समाज के लिए कलंक बनी हुई हैं। दहेज की मांग और उससे जुड़ी प्रताड़ना की घटनाएँ आज भी समाचार पत्रों की सुर्खियाँ बनती हैं।

हाल ही में तमिलनाडु की रिधान्या की दर्दनाक आत्महत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि समाज के नैतिक पतन और मानवीय संवेदना के क्षरण का जीवंत प्रमाण है।

दहेज प्रथा: एक सामाजिक अभिशाप

दहेज प्रथा भारतीय समाज में सदियों से व्याप्त है। यह प्रथा कभी सामाजिक सुरक्षा के नाम पर शुरू हुई थी, लेकिन समय के साथ यह लोभ, लालच और अपराध का कारण बन गई। आज दहेज केवल विवाह का हिस्सा नहीं, बल्कि एक व्यापार बन चुका है, जिसमें बेटियों की कीमत लगाई जाती है। रिधान्या की कहानी इस बात की मिसाल है कि दहेज की अंधी दौड़ में इंसानियत, रिश्तों की गरिमा और संवेदनाएँ कैसे कुचल दी जाती हैं।

रिधान्या की त्रासदी: एक आईना

रिधान्या के पिता ने अपनी बेटी की शादी में करोड़ों रुपये, वोल्वो कार और सैकड़ों सोने के सिक्के दिए, फिर भी ससुराल वालों की लालच की आग बुझी नहीं। दहेज की मांगें बढ़ती गईं, और रिधान्या को मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी। अंततः, एक संवेदनशील और शिक्षित युवती ने इस समाज की क्रूरता से हार मान ली। उसके अंतिम शब्द—”आई एम सॉरी पापा, मुझे यह जिंदगी पसंद नहीं…”—हर संवेदनशील व्यक्ति के दिल को झकझोर देता है।

रिधान्या की आत्महत्या एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि समाज के उस खोखलेपन का प्रतीक है, जहाँ रिश्तों की नींव पैसे और संपत्ति पर रख दी गई है। विवाह, जो दो आत्माओं के मिलन और दो परिवारों के एक होने का पवित्र बंधन माना जाता है, अब लेन-देन और सौदेबाजी का मंच बन चुका है। माता-पिता अपनी बेटियों की खुशियों के लिए जीवन भर की कमाई लुटा देते हैं, फिर भी उनकी बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं। यह समाज की संवेदनहीनता और नैतिक पतन का चरम है।

मानवीय संवेदना पर कुठाराघात

दहेज की प्रथा ने केवल बेटियों के जीवन को संकट में डाला है, बल्कि पूरे समाज की मानवीय संवेदनाओं को भी कुंद कर दिया है। जब कोई बेटी प्रताड़ना सहती है, तो समाज उसे “एडजस्ट” करने की सलाह देता है। जब वह टूट जाती है, तब भी दोषी को कठघरे में खड़ा करने की बजाय पीड़िता को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। यह संवेदना का ह्रास नहीं तो और क्या है?

क्या हम इतने संवेदनहीन हो गए हैं कि एक बेटी की चीखें भी हमें विचलित नहीं करतीं?

कानून और सामाजिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता

दहेज प्रथा के खिलाफ कानून तो हैं—दहेज निषेध अधिनियम, 1961 और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराएँ। लेकिन इनका प्रभाव तभी होगा जब समाज की सोच बदलेगी। केवल सख्त कानून बना देने से समस्या हल नहीं होगी। जब तक समाज में बेटियों को बोझ समझा जाएगा, जब तक बेटों को “कमाई का साधन” और बेटियों को “दूसरे घर की अमानत” माना जाएगा, तब तक दहेज की समस्या का समाधान संभव नहीं।

शिक्षा और जागरूकता: बदलाव की कुंजी

समाज में बदलाव लाने के लिए सबसे जरूरी है—शिक्षा और जागरूकता। बच्चों को बचपन से ही सिखाना होगा कि रिश्तों की बुनियाद प्रेम, सम्मान और बराबरी पर होती है, न कि पैसों और संपत्ति पर। लड़कों को यह समझाना होगा कि विवाह कोई सौदा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और साझेदारी है। लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाना होगा ताकि वे अन्याय के खिलाफ आवाज उठा सकें। माता-पिता को भी अपनी सोच बदलनी होगी—बेटी की शादी में दहेज देना उनकी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामाजिक अपराध है।

मीडिया और सिनेमा की भूमिका

मीडिया और सिनेमा समाज को दिशा देने का सशक्त माध्यम हैं। इनका दायित्व है कि वे दहेज प्रथा के खिलाफ जन-जागरण अभियान चलाएँ, सकारात्मक कहानियाँ दिखाएँ, और समाज को यह संदेश दें कि दहेज लेना-देना अपराध है। जब तक समाज में ऐसे उदाहरण सामने नहीं आएँगे, तब तक बदलाव की उम्मीद करना व्यर्थ है।

न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी

रिधान्या जैसी घटनाओं में न्याय व्यवस्था की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। दोषियों को त्वरित और कठोर सजा मिलनी चाहिए, ताकि समाज में एक सशक्त संदेश जाए। साथ ही, पीड़ित परिवारों को कानूनी, सामाजिक और मानसिक सहयोग मिलना चाहिए, ताकि वे न्याय के लिए संघर्ष कर सकें।

सामूहिक जिम्मेदारी और समाधान

दहेज प्रथा का अंत केवल कानून या सरकार के भरोसे नहीं हो सकता। इसके लिए समाज के हर वर्ग—माता-पिता, शिक्षक, धार्मिक नेता, सामाजिक संगठन, युवा और महिलाएँ—को मिलकर प्रयास करना होगा। सामूहिक इच्छाशक्ति, जागरूकता और नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना ही दहेज रूपी दानव को समाप्त कर सकती है।

क्या हम प्रतिबद्ध हैं?

रिधान्या की मौत एक वेक-अप कॉल है। यह हम सबके लिए आत्ममंथन का समय है—क्या हम अपनी बेटियों को सुरक्षित, सम्मानजनक और खुशहाल जीवन देने के लिए वाकई प्रतिबद्ध हैं? क्या हम बेटियों को बोझ नहीं, बल्कि परिवार की शान और समाज की धरोहर मानने के लिए तैयार हैं? क्या हम दहेज के खिलाफ आवाज उठाने और दोषियों को सजा दिलाने के लिए एकजुट हो सकते हैं?

अंत में यह कहना चाहूंगा कि दहेज प्रथा केवल एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि समाज के नैतिक और मानवीय पतन का कारण है। रिधान्या जैसी घटनाएँ हमें चेतावनी देती हैं कि अगर हमने अब भी जागरूकता नहीं दिखाई, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ नहीं करेंगी। हमें अपनी सोच, व्यवहार और सामाजिक संरचना में बदलाव लाना होगा। तभी हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर सकेंगे, जहाँ बेटियाँ बोझ नहीं, बल्कि गर्व का कारण होंगी; जहाँ रिश्तों की नींव पैसे पर नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान और विश्वास पर होगी।

आइए, दहेज प्रथा के खिलाफ एकजुट हों, अपनी बेटियों को सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन देने का संकल्प लें, और समाज को संवेदनशील, न्यायप्रिय और नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण बनाएं। यही रिधान्या और उन अनगिनत बेटियों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी, जिन्होंने दहेज की बलिवेदी पर अपने सपनों की आहुति दे दी।

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