बिहार विधानसभा में सत्ताधारी दल की युवा विधायकों, कोमल सिंह और मैथिली ठाकुर द्वारा अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा करना भारतीय लोकतंत्र के लिए एक क्रांतिकारी मोड़ है। स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली और कागजी स्टेडियमों की हकीकत उजागर कर उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि जनहित, दलगत निष्ठा से सर्वोपरि है। यह साहसी कदम उस जड़ राजनीतिक संस्कृति पर कड़ा प्रहार है, जहाँ प्रतिनिधि अक्सर मूक दर्शक बने रहते हैं। इन युवा आवाजों ने न केवल संसदीय परंपरा को मजबूती दी है, बल्कि जवाबदेही और पारदर्शिता की नई उम्मीद भी जगाई है। यह बिहार की राजनीति में साहस और शुचिता का नया उदय है।
बि हार विधानसभा के बजट सत्र में दो नवनिर्वाचित युवा विधायकों ने अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मुजफ्फरपुर की गायघाट से जदयू विधायक कोमल सिंह और दरभंगा ग्रामीण से बीजेपी विधायक मैथिली ठाकुर ने स्वास्थ्य व्यवस्था और खेल सुविधाओं की बदहाली पर सवाल उठाकर न केवल सदन को चौंका दिया, बल्कि राज्य की राजनीति में एक सकारात्मक मिसाल कायम की है।
कोमल सिंह ने जारंग और अथवारा पंचायतों में कथित स्टेडियम निर्माण की रिपोर्ट को झूठा बताते हुए उच्चस्तरीय जांच की मांग की, जबकि मैथिली ठाकुर ने तारडीह प्रखंड के कुरसों नदीयामी स्वास्थ्य केंद्र की जर्जर हालत पर सरकार से पुनर्निर्माण की अपील की। ये घटनाएं महज व्यक्तिगत सक्रियता नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस मूल भावना का प्रतीक हैं, जहां जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि सरकार के प्रहरी बनते हैं।
आज जब राजनीति में दलगत निष्ठा सर्वोपरि हो गई है, ऐसे साहसी कदम संसदीय परंपरा को मजबूत करने वाले हैं। यह समीक्षा न केवल इन विधायकों की पहल को रेखांकित करेगी, बल्कि बिहार और पूरे देश की राजनीतिक व्यवस्था की गहरी पड़ताल भी करेगी, जहां लोकसेवक शासक बन चुके हैं और जनहित गौण हो गया है।
इन युवा विधायकों की सक्रियता को समझने के लिए पहले घटनाक्रम को विस्तार से देखें। शुक्रवार को मैथिली ठाकुर ने विधानसभा में अपने क्षेत्र के स्वास्थ्य केंद्र की दयनीय स्थिति बयां की। उन्होंने कहा कि वह भवन जो सरकारी रिपोर्ट में केवल मरम्मत योग्य बताया गया है, वास्तव में पूरी तरह जर्जर हो चुका है।
पहले यहां दो एमबीबीएस डॉक्टर तैनात थे, लेकिन अब केवल एक आयुष चिकित्सक ही कार्यरत है। ठाकुर ने जोर देकर कहा कि इस केंद्र का समुचित विकास होने पर अलीनगर और घनश्यामपुर प्रखंड के 40 से 50 हजार लोगों को बेहतर चिकित्सा सुविधा मिल सकती है। जनस्वास्थ्य से कोई समझौता स्वीकार्य नहीं, यह उनका स्पष्ट संदेश था।
इससे पहले गुरुवार को उन्होंने पिंक बस सेवा की मांग उठाई थी, जो महिलाओं की सुरक्षा और परिवहन को मजबूत करने वाली थी। इसी तरह, कोमल सिंह ने गुरुवार को खेल विभाग की रिपोर्ट पर सवाल ठोक दिया। उन्होंने सदन में कहा कि जारंग और अथवारा पंचायतों को स्टेडियम बताने वाली रिपोर्ट गलत है; ये तो पुराने स्कूल मैदान हैं, जहां कोई बुनियादी सुविधा भी नहीं। खेल मंत्री श्रेयसी सिंह ने जीओ-टैगिंग और तस्वीरों का हवाला दिया, लेकिन सिंह ने जमीनी हकीकत का जिक्र कर जांच की मांग की।
ये दोनों विधायक पहली बार सदन में पहुंचे हैं, फिर भी उनकी दमदारी चर्चा का विषय बनी हुई है। एनडीए सरकार के कोटे से जीते होने के बावजूद उन्होंने दल की बजाय जनता के हित को प्राथमिकता दी, जो सकारात्मक राजनीति का प्रतीक है।यह पहल बिहार की लंबे समय की राजनीतिक संस्कृति से इतर है।
बिहार, जो कभी सामाजिक न्याय और विकास की प्रयोगशाला रहा, आज भ्रष्टाचार, अव्यवस्था और जातिवाद की भेंट चढ़ चुका है। राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली कोई नई बात नहीं। एनएचएम के आंकड़े बताते हैं कि बिहार में प्रति लाख आबादी पर मात्र 5.8 डॉक्टर हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 14 है। ग्रामीण क्षेत्रों में 70 प्रतिशत से अधिक स्वास्थ्य केंद्र आउटसोर्स्ड हैं, लेकिन सुविधाएं नाममात्र की हैं। कुरसों नदीयामी जैसे केंद्रों पर जर्जर भवन, डॉक्टरों की कमी और दवाओं का अभाव आम है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में शिशु मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से 50 प्रतिशत अधिक है। इसी तरह खेल सुविधाओं का हाल देखें तो खेल मंत्रालय के 2024 के आंकड़ों में बिहार को मात्र 2 प्रतिशत फंड मिला, जबकि स्टेडियम निर्माण के दावे हवा-हवाई साबित हो रहे हैं। कोमल सिंह का मुद्दा इसी अव्यवस्था को उजागर करता है, जहां कागजी स्टेडियम बनते हैं लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ नहीं। ये विधायक न केवल स्थानीय समस्याएं उठा रहे हैं, बल्कि पूरे सिस्टम की खामियों पर उंगली रख रहे हैं।
इस संदर्भ में मैथिली ठाकुर की मिथिलाक्षर केंद्र की मांग भी उल्लेखनीय है। मिथिला क्षेत्र की भाषा, लिपि और संस्कृति को बचाने के लिए पंचायत स्तर पर केंद्र स्थापित करने का प्रस्ताव सांस्कृतिक जागरूकता का प्रतीक है। मिथिली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिला है, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर इसका संरक्षण नगण्य है।
ठाकुर का यह कदम विकास को बहुआयामी बनाता है—स्वास्थ्य, परिवहन, संस्कृति। कोमल सिंह की स्टेडियम जांच की मांग पारदर्शिता की मांग है। खेल युवाओं को अपराध और बेरोजगारी से बचाने का माध्यम है, लेकिन बिहार में 40 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं और खेल सुविधाएं अभावग्रस्त हैं।
इन विधायकों की सक्रियता से सदन में बहस तेज हुई, जो विधायी प्रक्रिया को मजबूत करती है।अब व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह घटना भारतीय लोकतंत्र की उस विकृति को उजागर करती है, जहां विधायक लोकसेवक कम, दल के सिपाही ज्यादा बन जाते हैं। संविधान के अनुच्छेद 75 और 164 के तहत मंत्री लोकसेवक हैं, लेकिन वास्तविकता में वे शासक बन जाते हैं। जनता गाढ़ी कमाई के टैक्स से विधायकों को बंगला, गाड़ी, वेतन और फंड देती है, ताकि वे जनहित में सवाल उठाएं। लेकिन हकीकत उलट है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2024 आंकड़ों के अनुसार, 43 प्रतिशत विधायक आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं।
बिहार में विधायकों के क्षेत्रीय विकास कोष (MLA Local Area Development Fund) का 50 प्रतिशत से अधिक भ्रष्टाचार में डूब जाता है, जैसा CAG रिपोर्ट्स बताती हैं। फंड आवंटन होता है, लेकिन कार्यान्वयन में कमी—50 प्रतिशत राशि हड़प ली जाती है, बाकी भी पूरी नहीं खर्च होती। विधायक सरकार के गलत फैसलों का समर्थन करते हैं, क्योंकि पार्टी नेतृत्व दंडित करता है। उदाहरण लें तो 2023 के बिहार कास्ट सर्वे पर सवाल उठाने वाले बीजेपी विधायकों को चुप करा दिया गया।
विपक्षी विधायक तो सवाल उठाते हैं, लेकिन सत्ताधारी चुप रहते हैं। ऐसी मानसिकता ने लोकतंत्र को कमजोर किया है।देशव्यापी यह समस्या गंभीर है। संसदीय समितियों की रिपोर्ट्स बताती हैं कि प्रश्नकाल में 70 प्रतिशत सवाल सत्ताधारी दल के विधायकों द्वारा नहीं पूछे जाते। लोकसभा में औसतन 40 प्रतिशत प्रश्न अनुत्तरित रहते हैं। बिहार विधानसभा में भी यही हाल—2025 बजट सत्र में मात्र 20 प्रतिशत सत्ताधारी विधायकों ने विकास संबंधी सवाल पूछे।
इसका परिणाम है अव्यवस्था: सड़कें टूटी, अस्पताल खाली, स्कूल बंद। जनता उम्मीद से चुनती है, लेकिन विधायक पार्टी लाइन पर चलते हैं। CAG की 2024 रिपोर्ट में बिहार के स्वास्थ्य विभाग में 30 प्रतिशत फंड का दुरुपयोग दर्ज है। खेल विभाग में 40 प्रतिशत प्रोजेक्ट अधर में लटके हैं। ऐसे में कोमल और मैथिली जैसी पहल क्रांतिकारी है। वे साबित कर रही हैं कि सत्ताधारी भी जनहित में बोल सकता है।
यह सकारात्मक राजनीति की शुरुआत है। संसदीय परंपरा में सवाल उठाना लोकतंत्र का आधार है। ब्रिटेन की वेस्टमिंस्टर मॉडल से प्रेरित हमारा संसदीय तंत्र यही अपेक्षा रखता है। महात्मा गांधी ने कहा था, “राजनीति का लक्ष्य जनसेवा है।” लेकिन आज यह सत्ता की भूख बन गई। इन विधायकों ने इसे चुनौती दी। जनता इन्हें सराहेगी, क्योंकि यही अपेक्षा है।
बिहार की 12 करोड़ जनता विकास चाहती है—रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा। 2025 चुनावों में NDA की जीत इसी वायदे पर हुई। अब विधायक जवाबदेह बनें, तो छवि सुधरेगी। विपक्ष इन सवालों का समर्थन करे, तो सदन मजबूत होगा।ऐतिहासिक संदर्भ देखें तो बिहार ने हमेशा विद्रोही विधायकों को जन्म दिया।
1990 के लालू प्रसाद युग में भी सत्ताधारी विधायक भ्रष्टाचार पर चुप थे। 2005 में नीतीश कुमार के आने से सुधार हुए, लेकिन स्थिरता लकीर खींचने वाली हो गई। 2020 के बाद गठबंधन राजनीति ने जटिलताएं बढ़ाईं। फिर भी, युवा विधायक जैसे मैथिली (30 वर्षीय) और कोमल (नवनिर्वाचित) नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं, जनता से जुड़े हैं। मैथिली की मिथिली भाषा मांग क्षेत्रीय अस्मिता को मजबूत करती है। कोमल का स्टेडियम मुद्दा युवा विकास पर केंद्रित है। यदि ऐसे 50 विधायक हों, तो बिहार बदल सकता है।भविष्य की संभावनाएं रोचक हैं। सरकार को इन सवालों पर कार्रवाई करनी चाहिए। स्वास्थ्य केंद्र का पुनर्निर्माण हो, स्टेडियम की जांच हो। इससे विश्वास बढ़ेगा। जनता इन विधायकों को इनाम देगी—2029 चुनावों में मजबूत समर्थन। लेकिन चुनौतियां हैं: पार्टी दबाव, ट्रोलिंग, फंड कटौती। फिर भी, संविधान अनुच्छेद 105 विधायकों को सदन में बोलने की स्वतंत्रता देता है। CAG और RTI जैसे उपकरण जनता को सशक्त बनाते हैं।
मीडिया को इन पहलों को बढ़ावा देना चाहिए।देश स्तर पर यह मॉडल अपनाया जाए। उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के सत्ताधारी विधायक सवाल कम उठाते हैं। केरल या तमिलनाडु में सत्ताधारी भी मुखर हैं। बिहार इनसे सीखे। युवा विधायकों की संख्या बढ़े, प्रशिक्षण हो। लोकसभा में 33 प्रतिशत युवा हों, तो क्रांति आएगी।अंततः, कोमल सिंह और मैथिली ठाकुर जैसी बेटियां बिहार का गौरव हैं। उन्होंने अव्यवस्था पर सरकार को घेरा, कर्तव्य निभाया। यह लोकतंत्र की पुनर्रचना है। जनता का आभार, सरकार का संदेश: सुधार लाएं। यदि सभी विधायक ऐसा करें, तो भारत सशक्त होगा।
ये दो आवाजें हजारों की प्रेरणा बनेंगी। बिहार विधानसभा ने साबित किया—युवा शक्ति परिवर्तन ला सकती है।

