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  • Thu. Jan 15th, 2026

सम्पादकीय: संप्रभुता का संकट और बदलती विश्व व्यवस्था

ByBinod Anand

Jan 5, 2026

वेनेजुएला संकट वैश्विक राजनीति के उस दोराहे पर है जहाँ अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप और संप्रभुता के बीच संघर्ष स्पष्ट दिखता है। अमेरिकी ‘नार्को-पॉलिटिक्स’ और हितों के टकराव के इस दौर में, वेनेजुएला पर वैश्विक चुप्पी भविष्य में अन्य स्वतंत्र राष्ट्रों के लिए खतरा बन सकती है। ऐसे में ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ और ‘गुटनिरपेक्षता’ के अपने मूल सिद्धांतों के कारण भारत की भूमिका निर्णायक है। हालाँकि भारत ने अब तक एक संतुलित रुख अपनाया है, लेकिन उभरते भू-राजनीतिक समीकरणों और वैश्विक व्यवस्था में अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए अब भारत को अपनी विदेश नीति में अधिक स्पष्टता और मुखरता लानी होगी।

(विनोद आंनद)

​वेनेजुएला की धरती पर अमेरिकी डेल्टा फोर्स की हालिया सैन्य कार्रवाई और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की उनकी पत्नी सहित गिरफ्तारी ने इक्कीसवीं सदी के वैश्विक कूटनीतिक इतिहास में एक ऐसा अध्याय लिख दिया है, जिसके प्रभाव दशकों तक महसूस किए जाएंगे।

यह घटना केवल एक देश के भीतर ‘शासन परिवर्तन’ के प्रयास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय कानून की उस आधारशिला पर सीधा प्रहार है जो किसी भी संप्रभु राष्ट्र को अपनी सीमाओं के भीतर स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार देती है।

जब हम वैश्विक व्यवस्था की बात करते हैं, तो संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों का हवाला दिया जाता है, लेकिन जिस प्रकार अमेरिका ने एक संप्रभु देश के निर्वाचित प्रमुख को सैन्य बल के जरिए उनके आवास से उठाकर न्यूयॉर्क की एक अदालत में खड़ा कर दिया, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि आज की दुनिया में ‘शक्ति ही सत्य है’ का सिद्धांत एक बार फिर प्रभावी हो रहा है।

​इस पूरे घटनाक्रम की जड़ें काफी गहरी हैं। अमेरिका लंबे समय से निकोलस मादुरो पर नार्को-टेररिज्म और मानवाधिकारों के हनन के आरोप लगाता रहा है, लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया या अंतरराष्ट्रीय न्यायिक संस्था के हस्तक्षेप के बिना सीधे तौर पर सैन्य अभियान चलाना एक खतरनाक मिसाल कायम करता है।

यदि कोई भी शक्तिशाली देश अपनी सुरक्षा चिंताओं या वैचारिक मतभेदों के आधार पर दूसरे देश के राष्ट्राध्यक्ष को गिरफ्तार करने लगे, तो फिर अंतरराष्ट्रीय सीमाओं और संप्रभुता के कोई मायने नहीं रह जाएंगे।

इस अमेरिकी नीति के विरोध में अब तक रूस, चीन, ईरान, क्यूबा और ब्राजील जैसे बड़े देश मजबूती से आगे आए हैं। रूस ने इसे “आर्मड अग्रेशन” यानी सशस्त्र आक्रामकता करार दिया है, जबकि चीन ने इसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बुनियादी मानदंडों का उल्लंघन बताते हुए मादुरो की तुरंत रिहायी की मांग की है।

क्यूबा और मेक्सिको जैसे लैटिन अमेरिकी देशों ने इसे “आतंकवादी कृत्य” और “साम्राज्यवादी दादागिरी” की संज्ञा दी है, जो दर्शाता है कि अमेरिका के खिलाफ वैश्विक रोष गहरा रहा है।

​इतिहास गवाह है कि अमेरिका पूर्व में भी कई देशों के साथ इसी तरह की हस्तक्षेपवादी नीतियों को अपनाकर वहां की सत्ता पलट चुका है। 1953 में ईरान के निर्वाचित प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेघ का तख्तापलट हो या 1954 में ग्वाटेमाला के जैकोबो अर्बेंज की सरकार गिराना, अमेरिका का हस्तक्षेपवाद पुराना है।

1973 में चिली में साल्वाडोर अलेंदे की लोकतांत्रिक सरकार को गिराकर तानाशाही को संरक्षण देना और 1989 में पनामा के राष्ट्रपति मैनुअल नोरिएगा को इसी तरह गिरफ्तार कर अमेरिका ले जाना, वर्तमान घटनाक्रम की ऐतिहासिक कड़ियाँ हैं।

इराक में सद्दाम हुसैन और लीबिया में मुअम्मर गद्दाफी का अंत भी अमेरिकी ‘रेजीम चेंज’ नीति का ही हिस्सा था, जिसने उन क्षेत्रों को दशकों तक अस्थिरता और गृहयुद्ध की आग में झोंक दिया। अमेरिका ने हमेशा अपनी सुविधा के अनुसार सरकारों को बनाया और बिगाड़ा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय शांति के बजाय अराजकता ही अधिक फैली है।

​आने वाले दिनों में अमेरिका की इस आक्रामक नीति का शिकार कई अन्य देश भी हो सकते हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले ही कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो को “अपनी खैर मनाने” की खुली चेतावनी दे दी है, जिससे स्पष्ट है कि लैटिन अमेरिका में वामपंथी विचारधारा वाली सरकारों पर खतरा मंडरा रहा है।

क्यूबा और निकारागुआ जैसे देश भी अमेरिका की हिट-लिस्ट में ऊपर हैं। इसके अलावा, ईरान के खिलाफ बढ़ता तनाव और दक्षिण चीन सागर को लेकर चीन के प्रति अमेरिका का कड़ा रुख संकेत दे रहा है कि भविष्य में एशिया और मध्य-पूर्व के कई संप्रभु राष्ट्र इस तरह के हाइब्रिड या सीधे सैन्य हस्तक्षेप का शिकार बन सकते हैं।

यदि आज वेनेजुएला पर दुनिया चुप रहती है, तो कल किसी भी उस देश की बारी हो सकती है जो अमेरिकी हितों या उसकी ‘नार्को-पॉलिटिक्स’ की परिभाषा में फिट नहीं बैठता।
​इस जटिल वैश्विक परिदृश्य में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत हमेशा से ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ और ‘गुटनिरपेक्षता’ का पक्षधर रहा है। वेनेजुएला के मामले में भारत का रुख संतुलित है, लेकिन आने वाले समय में भारत को अपनी नीति में और अधिक स्पष्टता लानी होगी।

भारतीय विदेश मंत्रालय ने शांतिपूर्ण समाधान की अपील की है, लेकिन भारत की असली नीति यह होनी चाहिए कि वह किसी भी पक्ष का अंधसमर्थन करने के बजाय संयुक्त राष्ट्र के मंच पर ‘बहुपक्षवाद’ और अंतरराष्ट्रीय कानून की सर्वोच्चता की वकालत करे। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि लैटिन अमेरिका में उसके तेल संपदा और निवेश से जुड़े हितों पर आंच न आए। भारत को स्पष्ट रूप से यह संदेश देना चाहिए कि किसी भी देश में शासन परिवर्तन केवल वहां की जनता के जनादेश से होना चाहिए, न कि बाहरी कमांडो ऑपरेशन से।

​भारत की नीति में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का भाव झलकता है, इसलिए हमें वेनेजुएला के आम नागरिकों की सुरक्षा और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए एक वैश्विक आम सहमति बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। भारत को अमेरिका और रूस-चीन खेमे के बीच एक सेतु का कार्य करते हुए यह याद दिलाना होगा कि “जिसकी लाठी उसकी भैंस” का नियम 21वीं सदी की दुनिया के लिए घातक है। अंततः, विश्व को यह समझना होगा कि यदि अंतरराष्ट्रीय कानून की दीवारें गिरती हैं, तो जंगल राज की वापसी को कोई नहीं रोक पाएगा।

वेनेजुएला की घटना एक चेतावनी है कि संवाद के रास्ते बंद होना पूरी मानवता के लिए एक बड़ी त्रासदी है। भारत जैसे जिम्मेदार राष्ट्र को अब अपनी आवाज बुलंद करनी होगी ताकि दुनिया को ‘बंदूक की कूटनीति’ से बचाकर ‘कानून की कूटनीति’ की ओर ले जाया जा सके।

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