स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में, कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व उच्च जातियों और प्रभुत्वशाली वर्गों के एक सीमित समूह तक ही सिमटा रहा। ग्रामीण और शैक्षिक/आर्थिक रूप से कमज़ोर पृष्ठभूमि के व्यक्तियों के लिए पार्टी या सरकार में उच्च पदों तक पहुँचना अत्यंत कठिन था।भूमि सुधारों और सामाजिक न्याय के बड़े एजेंडे को प्रभावी ढंग से लागू करने में कांग्रेस की विफलता ने पिछड़े वर्गों को और अधिक हाशिये पर धकेल दिया। इस सामाजिक-राजनीतिक अन्याय ने 1960 के दशक में एक बड़े जन-आंदोलन को जन्म देने के लिए उपजाऊ ज़मीन तैयार की।
(विनोद आनंद)
आज बिहार में पिछले दो दशक से नीतीश कुमार औऱ उसके पूर्व दो दशक लालू प्रसाद यादव या उनकी पार्टी ने बिहार में शासन का बागडोर संभाला यह दौर समाजिक न्याय औऱ पिछड़ों के सत्ता में भागीदारी का दौर रहा। इस बार के चुनाव में भी पिछड़े समुदाय को आशाजनक राजनितिक प्रतिभागिता मिली लेकिन लालू के शासन काल छोड़कर वर्तमान समय में बिहार की राजनिति में सवर्णों का प्रभाव रहा । आज भी नीतीश कुमार की पूरी शासन व्यवस्था सवर्णों के प्रभाव औऱ इशारों पर चल रहा है. लेकिन सच पूछा जाय तो भारतीय राजनीति के इतिहास में सामाजिक न्याय के लिए हुए अनवरत संघर्षों का परिणाम है कि आज पिछड़े वर्ग क़ी सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित हो सकी है।
इस संघर्ष का एक निर्णायक मोड़ 1960 के दशक में आया जब कांग्रेस की एकाधिकारवादी नीतियों को डॉ. राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में सशक्त चुनौती मिली।
यह भारतीय राजनीति का इतिहास केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय के लिए हुए अनवरत संघर्षों का भी लेखा-जोखा है। आजादी के बाद से ही, देश की बहुसंख्यक आबादी – विशेष रूप से पिछड़े और अति-पिछड़े वर्ग – को उनके संवैधानिक और राजनीतिक अधिकार दिलाने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी गई। जिसने तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस के एकाधिकार को चुनौती दी और पहली बार समाज के दबे-कुचले वर्गों को नेतृत्व की शीर्ष पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया। बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र से तीन अति-पिछड़े नेताओं ने एक साथ आकर राज्य की राजनीति की धुरी बदल दी—एक घटना जिसे कई राजनीतिक विश्लेषक “न भूतो न भविष्यति” की संज्ञा देते हैं।
कांग्रेस का पिछड़ों को राजनितिक भागीदारी से वंचित रखने की नीति
कांग्रेस की पिछड़े समाज को और पीछे धकेलने की नीति ने उसे मुट्ठी भर लोगों की पार्टी बना दिया था। जिसका उदाहरण है कि उस समय भारतीय संविधान का अनुच्छेद 340 के तहत सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की दशाओं के अन्वेषण के लिए एक आयोग के गठन का प्रावधान किया गया। कांग्रेस सरकार ने 1952 में काका कालेलकर आयोग का गठन किया था। यह आयोग, जिसे प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग भी कहा जाता है, ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें पिछड़े वर्गों की पहचान और उनके उत्थान के लिए सिफारिशें की गई थीं।
काका कालेलकर आयोग भारतीय इतिहास में पहला प्रमुख कदम था जिसका उद्देश्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान करना था।
यह आयोग 29 जनवरी 1953 को भारत के राष्ट्रपति के आदेश से।गांधीवादी विचारक और शिक्षाविद्काका साहेब कालेलकर क़ी अध्य्क्षता में गठित की गयी.इस समिति का उद्देश्य था कि उन वर्गों की पहचान करना जिन्हें संविधान के प्रयोजनों के लिए सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा समझा जाना चाहिए।इसके तहत उनकी कठिनाइयों की जाँच करना। उनकी स्थिति में सुधार के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा उठाए जाने वाले कदमों की सिफारिश करना, विशेष रूप से शिक्षा और सार्वजनिक सेवाओं में दिए जाने वाले अनुदानों और रियायतों के संबंध में निर्णय लेना था।
यह आयोग 1955 में रिपोर्ट प्रस्तुत किया. आयोग ने 2,399 जातियों/समुदायों को पिछड़ा वर्ग के रूप में सूचीबद्ध किया । इस आयोग के रिपोर्ट में एक विवादास्पद फहलू भी था।आयोग के अध्यक्ष काका कालेलकर ने अपनी रिपोर्ट के साथ एक अध्यक्षीय नोट भी संलग्न किया था।
इस नोट में उन्होंने जाति को पिछड़ेपन का एकमात्र आधार बनाने पर संदेह व्यक्त किया और कहा कि आरक्षण का आधार आर्थिक स्थिति होनी चाहिए। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने आयोग की सिफारिशों को लागू करने से इनकार कर दिया। सरकार का तर्क था कि रिपोर्ट में अपनाए गए मानदंड अस्पष्ट थे और इससे सामाजिक विभाजन और बढ़ेगा।परिणाम स्वरूप इस रिपोर्ट को संसद के पटल पर रखा गया, लेकिन इसे लागू नहीं किया गया और यह वर्षों तक लंबित रही।
रिपोर्ट को लागू नहीं करने के पीछे का वजह पिछड़े समाज की राजनीतिक भागीदारी में इच्छाशक्ति की कमी और उन्हें मुख्यधारा से दूर रखने की एक सोची-समझी रणनीति के रूप में देखा गया। देश की लगभग 65% आबादी को पीछे रखकर, राष्ट्रीय प्रगति की बात करना एक विरोधाभास था! जिसका सीधा प्रमाण कांग्रेस की इन नीतियों में था। इस असंतोष की जड़ें यहीं से मजबूत हुईं।
सत्ता का केंद्रीकरण और ‘मुट्ठी भर’ लोगों का प्रभुत्व
स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में, कांग्रेस पार्टी उच्च जाति और प्रभुत्वशाली वर्गों के सीमित समूह के हाथों में सिमटी रही। ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले, शैक्षिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए पार्टी के भीतर और सरकार में उच्च पदों तक पहुँचना अत्यंत कठिन था। कांग्रेस की नीतियाँ, जो भूमि सुधारों और सामाजिक न्याय के बड़े एजेंडे को प्रभावी ढंग से लागू नहीं कर पाईं, ने पिछड़े वर्गों को और अधिक हाशिये पर धकेल दिया। इस सामाजिक-राजनीतिक अन्याय ने 1960 के दशक में एक बड़ा जन-आंदोलन खड़ा करने के लिए उपजाऊ जमीन तैयार की।
1960 का दशक: डॉ. लोहिया का उदय और सोशलिस्ट पार्टी का शंखनाद
कांग्रेस की इन ‘गलत नीतियों’ के खिलाफ एक ऐसी आवाज उठी जिसने दशकों तक चली आ रही सामाजिक जड़ता को हिला दिया—यह आवाज थी डॉ. राम मनोहर लोहिया की।
डॉ. लोहिया ने इस बात को पहचान लिया था कि जब तक पिछड़े वर्ग को सत्ता में वास्तविक भागीदारी नहीं मिलेगी, तब तक सामाजिक न्याय केवल एक कागजी अवधारणा रहेगी। उन्होंने 1967 में कांग्रेस से अलग होकर सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया और पिछड़े समाज को संगठित करने के लिए एक सीधा और शक्तिशाली नारा दिया। वह नारा था
”पिछड़ा पावे 100 में 60।”
यह नारा केवल आरक्षण या नौकरियों की मांग नहीं था, बल्कि यह सत्ता में 60% भागीदारी की खुली घोषणा थी, जो देश की बहुसंख्यक आबादी के लिए उनके राजनीतिक अधिकार का दावा था।
डॉ. लोहिया के इस नारे और सोशलिस्ट पार्टी के गठन का प्रभाव तुरंत और प्रचंड हुआ। वर्ष 1967 में हुए विधानसभा चुनावों में, इस जनवादी लहर के बदौलत भारत के 13 राज्यों में से 08 राज्यों में कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई और सोशलिस्ट पार्टी ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। इस चुनाव परिणाम को भारतीय राजनीति में ‘कांग्रेस प्रणाली के अंत की शुरुआत’ के तौर पर भी देखा जाता है।
बिहार में, यह परिवर्तन विशेष रूप से निर्णायक था। सोशलिस्ट पार्टी के उदय के कारण बिहार में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ। यह बिहार की राजनीति में एक युगांतकारी घटना थी, जिसने सामाजिक न्याय की राजनीति को राज्य के केंद्र में स्थापित कर दिया। इस सरकार में कर्पूरी ठाकुर जी को उप-मुख्यमंत्री बनाया गया, जो अति-पिछड़े समाज से आने वाले एक संघर्षशील नेता थे।
मिथिलांचल का स्वर्णिम कालखंड: तीन अति-पिछड़े नेताओं का प्रभुत्व
इस कालखंड को पिछड़ों ke राजनितिक भागीदारी के उदय का स्वर्णिम काल” माना जाता है, उसका शीर्ष-बिंदु दरभंगा जिले से उभरे तीन अति-पिछड़े नेताओं का संयुक्त नेतृत्व था। यह महज संयोग नहीं था, बल्कि लोहिया की सामाजिक-राजनीतिक रणनीति की सफलता थी, जिसने अति-पिछड़े समाज को सत्ता के शिखर पर पहुँचाया। यह असाधारण उपलब्धि 1967 के विधानसभा चुनावों में मिली, और फिर 1969 के पुनः चुनाव में जनादेश सोशलिस्ट पार्टी के पक्ष में आने पर और भी मजबूत हुई।
इसका कारण था उस समय कर्पूरी ठाकुर दरभंगा के ताजपुर विधानसभा से जीत कर आये जो गैर कोंग्रेसी सरकार में प्रथम उप मुख्यमंत्री बने वहीं मधुबनी जिला के फूलपरास से जीत कर धनिक लाल मंडल बिहार विधानसभा के अध्यक्ष (स्पीकर) बने।
इसी तरह झंझारपुर विधानसभा से जीतकर रामफल चौधरी भी राज्य में मंत्री बने।
इस राजनीति इतिहास में परिवर्तन के कारण कर्पूरी ठाकुर जैसे जननायक का उदय हुआ. वे ताजपुर विधानसभा से सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप में जीतकर आए बाद में वे बिहार के मुख्यमंत्री भी बने औऱ आज भारत सरकार ने उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया, वे अति-पिछड़े वर्ग (नाई समुदाय) से आते थे। कांग्रेस के चरम के दौर में उन्हें मुख्यमंत्री (या शुरुआती गैर-कांग्रेसी सरकार में उप-मुख्यमंत्री) बनाया जाना, सामाजिक न्याय की राजनीति की सबसे बड़ी जीत थी। उनका नेतृत्व इस बात का प्रमाण था कि ‘पिछड़े समाज को आगे लाने वाली राजनीति’ अब केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि सत्ता की हकीकत बन चुकी थी।
वहीं फुलपरास विधानसभा से सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर विजयी हुए धनिक लाल मंडल संवैधानिक ऊँचाई तक पहुंचे, वे बिहार विधानसभा का अध्यक्ष (स्पीकर),केंद्रीय गृह राज्य मंत्री औऱ हरियाणा के राज्यपाल तक बने।
वे अति-पिछड़े वर्ग धानुक से आते थे जो उपरोक्त पदों पर रहते हुए संवैधानिक गरिमा वाले पदों पर भी पिछड़े समाज का प्रतिनिधित्व किया।
इसी तरह रामफल चौधरी
झंझारपुर विधानसभा से जीतकर आए रामफल चौधरी जी को कर्पूरी प्रथम मंत्रिमंडल में नियुक्ति राज्य मंत्री का पद मिला। ‘नियुक्ति’ जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक विभाग का प्रभार पिछड़े समाज के नेता को मिलना यह सुनिश्चित करता था कि प्रशासनिक निर्णयों और नियुक्तियों में अब एक समतावादी दृष्टिकोण शामिल होगा, जिससे वंचितों को उनका हक मिल सके।
सामाजिक न्याय के संघर्ष की स्थायी विरासत
1960 के दशक का यह कालखंड भारतीय राजनीति के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था। कांग्रेस की उस नीति के विरोध में, जिसने दशकों तक सामाजिक और राजनीतिक भागीदारी को नियंत्रित रखा था, सोशलिस्ट पार्टी ने एक जन-आंदोलन खड़ा किया। मिथिलांचल के इन तीन अति-पिछड़े नेताओं—कर्पूरी ठाकुर, धनिक लाल मंडल, और रामफल चौधरी—का एक साथ शीर्ष नेतृत्व में आना केवल बिहार के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के सामाजिक न्याय आंदोलन के लिए एक प्रेरणास्रोत बन गया। इस ‘स्वर्णिम कालखंड’ ने सिद्ध कर दिया कि देश की बहुसंख्यक पिछड़ी आबादी को दरकिनार कर कोई भी पार्टी या नेतृत्व लंबे समय तक प्रभावी नहीं रह सकता।
इस दौर ने बिहार की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया, जिसकी गूँज आज भी भारतीय राजनीतिक विमर्श में सुनाई देती है। यह वह विरासत है जिसने बाद के दशकों में मंडल आयोग की राजनीति और क्षेत्रीय सामाजिक न्याय की ताकतों के उदय का मार्ग प्रशस्त किया।
