
भूमि धंसाव और आग के अभिशाप के बीच, कार्बन मोनोऑक्साइड ने छीनीं दो जानें; 10,000 की आबादी पर विस्थापन का साया। क्या दशकों से लंबित पुनर्वास ही एकमात्र रास्ता है?
परिचय : एक नया संकट पुराना अभिशाप
विनोद आनंद
झा रखंड का धनबाद, जिसे भारत की कोयला राजधानी कहा जाता है, दशकों से भूमिगत आग और अप्रत्याशित भूमि धंसाव (गोफ) के खतरों के साए में जीता रहा है। लेकिन जनवरी 2025 में, इस कोयलांचल ने एक नया और अधिक घातक खतरा देखा है—कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) गैस रिसाव। यह अदृश्य, गंधहीन ज़हर केन्दुआडीह क्षेत्र के राजपूत बस्ती और आस-पास के मोहल्लों में दो मासूम जिंदगियों को लील गया, जबकि 30 से अधिक लोगों को अस्पताल के बिस्तर पर ला दिया।
दो दिनों के अंतराल में दो महिलाओं – 32 वर्षीय प्रियंका देवी और 55 वर्षीय ललिता देवी – की मौत ने पूरे इलाके में दहशत फैला दी है। यह घटना सिर्फ स्थानीय त्रासदी नहीं, बल्कि कोयला खनन के इतिहास की लापरवाही, प्रशासनिक सुस्ती और लंबित पुनर्वास नीति के एक गंभीर संकट की चेतावनी है। विशेषज्ञों की सर्वसम्मत राय है: स्थायी समाधान केवल तत्काल और व्यापक पुनर्वास है, और हर एक दिन की देरी एक और संभावित मौत का कारण बन सकती है।
केन्दुआडीह की त्रासदी: जब हवा जानलेवा बन गई
केन्दुआडीह के निवासियों के लिए, जीवन हमेशा से अनिश्चित रहा है। उनके पैरों के नीचे की धरती या तो धंसती रही है, या दशकों से लगी भूमिगत खदान की आग से तपती रही है। लेकिन इस बार, खतरा जमीन से निकलकर हवा में घुल गया। स्थानीय लोगों के अनुसार, पिछले कुछ दिनों से इलाके में एक तीखी दुर्गन्ध महसूस की जा रही थी, जिसके बाद लोगों को सांस लेने में तकलीफ, चक्कर आना और उल्टी जैसे लक्षण दिखने लगे।
3 जनवरी को प्रियंका देवी और 4 जनवरी को ललिता देवी की मौत ने पुष्टि कर दी कि यह साधारण बदबू नहीं, बल्कि एक जानलेवा ज़हर था। गैस का स्तर रात में इतना बढ़ जाता है कि घरों के अंदर दम घुटने लगता है। एक प्रभावित महिला के शब्दों में, “घर के पीछे से गैस निकल रही है। बच्चे रोते हैं, हम बाहर भी नहीं निकल सकते। रात गुजारना मुश्किल हो गया है।”
कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) का घातक प्रोफाइल
सीएसआईआर-सीआईएमएफआर (CSIR-CIMFR) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. संतोष कुमार राय के मुताबिक, यह समस्या भूमिगत खदानों की आग से जुड़ी है।
“यहां कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा बहुत अधिक पाई गई है। CO हवा से हल्की होने के कारण ऊपर उठती है और कमरों में भर जाती है। बंद जगह में यह तेजी से इकट्ठा होकर जानलेवा बन जाती है। सीलिंग और ब्रैकेटिंग से अस्थायी राहत मिल सकती है, लेकिन स्थायी समाधान सिर्फ पुनर्वास है।”
कार्बन मोनोऑक्साइड एक साइलेंट किलर है। यह रक्त के हीमोग्लोबिन से ऑक्सीजन की तुलना में 200 गुना अधिक तेज़ी से जुड़ता है, जिससे शरीर के महत्वपूर्ण अंगों में ऑक्सीजन की सप्लाई रुक जाती है। यही वजह है कि केन्दुआडीह में पीड़ित लोगों को तत्काल ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत पड़ी और कई लोगों को शहीद नर्मदेस्वर मोदी अस्पताल और अन्य निजी क्लीनिकों में भर्ती कराना पड़ा।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया और खोखले आश्वासन
घटना की गंभीरता को देखते हुए, धनबाद जिला प्रशासन और बीसीसीएल (BCCL – भारत कोकिंग कोल लिमिटेड) के शीर्ष अधिकारी मौके पर पहुंचे। उपायुक्त आदित्य रंजन, एसएसपी प्रभात कुमार, बीसीसीएल के सीएमडी मनोज कुमार अग्रवाल और डीजीएमएस (DGMS) के डिप्टी डायरेक्टर मोहम्मद जावेद सहित कई वरिष्ठ अधिकारियों ने प्रभावित परिवारों और स्थानीय नेताओं से मुलाकात की।
बीसीसीएल के सीएमडी मनोज कुमार अग्रवाल ने स्वीकार किया कि यह संकट पुरानी खदानों में बचे कोयले के रासायनिक प्रतिक्रिया के कारण गर्म होने और उससे उत्पन्न होने वाले बैक्टीरिया और जहरीली गैसों से जुड़ा है।
उन्होंने आईआईटी(आईएसएम) धनबाद, सीआईएमएफआर और डीजीएमएस की संयुक्त टीम द्वारा तकनीकी जांच कराए जाने और गैस के स्रोत को सील करने का काम शुरू करने की जानकारी दी।
“गैस के स्रोत को चिह्नित कर सीलिंग का काम तेजी से चल रहा है, लेकिन इसे पूरी तरह रोकना सम्भव नहीं है। लोगों को आपसी सहमति से पुनर्वास स्वीकार करना होगा।”
हालांकि, इन प्रयासों को विशेषज्ञ सिर्फ एक अस्थायी समाधान मानते हैं।
81 खतरनाक साइटें और 30 साल की विस्थापन की कहानी
केन्दुआडीह की त्रासदी एक व्यापक संकट का सिर्फ एक हिस्सा है। डीजीएमएस और सीआईएमएफआर के वैज्ञानिकों ने पूरे झारखंड कोयलांचल क्षेत्र में कुल 81 स्थानों को ‘अति-खतरनाक’ घोषित किया है। इनमें केन्दुआडीह, राजपूत बस्ती, मस्जिद मोहल्ला, ऑफिसर कॉलोनी जैसे कई इलाके शामिल हैं। इन सभी साइटों पर भूमिगत आग सक्रिय है और जहरीली गैसों का उत्पादन हो रहा है।
डीजीएमएस के डिप्टी डायरेक्टर मोहम्मद जावेद ने 30 साल पुरानी विस्थापन योजना की विफलता पर गंभीर सवाल उठाए।
“पिछले 30 साल से बेलगड़िया टाउनशिप में विस्थापितों को बसाने की योजना चल रही है, लेकिन अब तक बीसीसीएल और जिला प्रशासन पूरा नहीं कर सके।… आजादी से पहले की खदानें हैं, उनके कोई आधिकारिक दस्तावेज नहीं हैं। उस समय सुरक्षा नियमों का पालन नहीं होता था। 81 चिह्नित साइटों पर रहने वाले सभी लोगों को शिफ्ट करना जरूरी है, वरना भविष्य में और बड़े हादसे होंगे।”
उपायुक्त आदित्य रंजन ने भी स्वीकार किया कि केन्दुआडीह का यह इलाका पहले से ही ‘डेंजर जोन’ में चिह्नित था और परिवारों का विस्थापन एक साल पहले ही होना था, लेकिन “विभिन्न कारणों से प्रक्रिया लम्बित रही।”
यह “विभिन्न कारणों” का वाक्यांश ही समस्या की जड़ है। इसमें शामिल हैं:
बीसीसीएल की धीमी गति: पुनर्वास स्थल, जैसे बेलगड़िया टाउनशिप, का विकास कछुआ गति से हुआ है।
मुआवजे और सुविधाओं पर विवाद: विस्थापित होने वाले लोग नई जगह पर रोज़ी-रोटी, दुकान, और घर के पर्याप्त मुआवजे/व्यवस्था की मांग कर रहे हैं, जो अक्सर प्रशासन द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता।
राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी: विस्थापन एक संवेदनशील मुद्दा है, और अक्सर जनप्रतिनिधि त्वरित और कड़े कदम उठाने से बचते हैं।
स्थानीय लोगों का आक्रोश और राजनीतिक शून्यता
दो मौतों और दर्जनों लोगों के बीमार होने के बावजूद, स्थानीय लोगों में केवल डर नहीं, बल्कि गहरा आक्रोश है। उनका गुस्सा प्रशासन की धीमी कार्रवाई और राजनीतिक उदासीनता पर केंद्रित है।
निष्क्रियता का आरोप: प्रभावित लोगों का कहना है कि अधिकारी चार दिनों से “सिर्फ मीटिंग” कर रहे हैं, जबकि गैस का स्तर लगातार बढ़ रहा है।
नेताओं की अनुपस्थिति: सबसे बड़ा रोष इस बात पर है कि दो महिलाओं की मौत के बाद भी कोई “बड़ा नेता” (सिर्फ स्थानीय विधायक राज सिन्हा ने दौरा किया) मौके पर नहीं पहुंचा। अन्य दिग्गज नेताओं की चुप्पी ने लोगों को अकेला महसूस कराया है।
रोजी-रोटी की चिंता: विस्थापन का मतलब सिर्फ नया घर नहीं है, बल्कि अपनी पूरी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को उखाड़ फेंकना है। स्थानीय लोग पूछ रहे हैं, “रोजी-रोटी का क्या होगा? शिफ्टिंग की बात तो करते हैं, लेकिन मुआवजा और नई जगह पर घर-दुकान का इंतजाम कब होगा?”
‘कोयलांचल नागरिक मंच’ के अध्यक्ष राजीव शर्मा ने अपनी मांग में एक तकनीकी समाधान भी जोड़ा है:
“बीसीसीएल को तुरंत सभी 81 खतरनाक साइटों पर स्थायी गैस मॉनिटरिंग सिस्टम लगाना चाहिए। रियल-टाइम डेटा से पहले ही खतरे का पता चल जाएगा और जान-माल बचाया जा सकेगा। साथ ही प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा और तत्काल पुनर्वास दिया जाए।”
यह मांग एक महत्वपूर्ण अंतर को उजागर करती है: आज के तकनीकी युग में भी, धनबाद के लोग अपनी जान बचाने के लिए सटीक और वास्तविक समय की चेतावनी प्रणाली से वंचित हैं।
निष्कर्ष: एक चेतावनी, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता
केन्दुआडीह में CO गैस रिसाव की घटना एक साधारण दुर्घटना नहीं है; यह दशकों पुरानी अनदेखी, अनियोजित खनन और प्रशासनिक विफलता का परिणाम है। यह त्रासदी एक स्पष्ट चेतावनी है कि कोयलांचल का पुराना अभिशाप अब एक नए और अधिक खतरनाक रूप में सामने आ गया है। भूमि धंसाव और आग दृश्यमान खतरे थे, लेकिन कार्बन मोनोऑक्साइड जैसा अदृश्य ज़हर और भी घातक साबित हो रहा है।
विशेषज्ञों का मत एक है: पुनर्वास के अलावा कोई विकल्प नहीं है। जब तक इन 81 चिह्नित खतरनाक स्थानों से आबादी को पूरी तरह से हटाकर सुरक्षित बेलगड़िया टाउनशिप या अन्य स्थानों पर नहीं बसाया जाता, तब तक भविष्य में और बड़े हादसे होते रहेंगे।
धनबाद के निवासियों का जीवन सामान्य हो, इसके लिए प्रशासन को अब सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि निश्चित समय-सीमा के भीतर ठोस कार्रवाई करनी होगी। दो मौतों का दुःख अब कार्रवाई में बदलना चाहिए। भारत की ऊर्जा सुरक्षा में योगदान देने वाले इन परिवारों को सुरक्षा, सम्मान और एक सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करना देश और राज्य सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है। केन्दुआडीह की यह घटना कोयलांचल के इतिहास में एक ऐसा काला धब्बा है, जो तभी मिट सकता है, जब सरकारें और बीसीसीएल 30 साल पुरानी पुनर्वास योजना को गंभीरता से पूरा करें।
यह इंतजार अब जीवन और मृत्यु का प्रश्न बन चुका है।
- है. धनबाद के केन्दुआडीह क्षेत्र में बीते दो दिनों में कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) गैस रिसाव से दो महिलाओं की मौत हो चुकी है, जबकि 30-35 लोग गंभीर रूप से प्रभावित हैं. इलाके में तेज दुर्गन्ध के साथ जहरीली गैस का स्तर खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है, जिससे करीब 10 हजार की आबादी प्रभावित है. विशेषज्ञों का एकमत है कि प्रभावित परिवारों को तत्काल दूसरी जगह शिफ्ट करना ही एकमात्र विकल्प है. दो दिन में दो मौतें, कई अस्पताल में भर्ती 3 जनवरी 2025 को राजपूत बस्ती निवासी प्रियंका देवी (32) और गुरुवार को ललिता देवी (55) ने जहरीली गैस की चपेट में आने से दम तोड़ दिया. दोनों की मौत के बाद इलाके में दहशत का माहौल है. प्रभावित 30-35 लोगों को शहीद नर्मदेस्वर मोदी अस्पताल, पटेल चेस्ट क्लीनिक और निजी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है. कई मरीजों को ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखा गया है. स्थानीय लोगों का कहना है कि रात में गैस का स्तर और बढ़ जाता है. घरों के अंदर रहना मुश्किल हो गया है. बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा परेशान हैं. एक प्रभावित महिला का कहना है कि उसके घर के पीछे से ही गैस निकल रही है. बच्चे रोते रहते हैं, बाहर भी नहीं निकल सकते. वहीं, डीजीएमएस के अधिकारी और देश की प्रमुख शोध संस्थान CSIR CIMFR (Central Institute of Mining and Fuel Research) के वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर अग्नि प्रभावित और भू धसान क्षेत्र में बसे लोगों को दूसरी जगह शिफ्ट नहीं कराया गया, ऐसे हादसे फिर से देखने को मिल सकते हैं. 81 खतरनाक साइटें चिह्नित, केन्दुआडीह भी शामिल डीजीएमएस (Directorate General of Mines Safety) और CSIR-CIMFR के वैज्ञानिकों ने झारखण्ड के कोयलांचल क्षेत्र में कुल 81 स्थानों को अति-खतरनाक घोषित किया है. इनमें से अधिकांश स्थानों पर भूमिगत खदानों में दशकों से लगी आग के कारण कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य जहरीली गैसें बन रही हैं. केन्दुआडीह, राजपूत बस्ती, मस्जिद मोहल्ला, ऑफिसर कॉलोनी सहित कई इलाके इन 81 साइटों में शामिल हैं. “यहां कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा बहुत अधिक पाई गई है. CO हवा से हल्की होने के कारण ऊपर उठती है और कमरों में भर जाती है. बंद जगह में यह तेजी से इकट्ठा होकर जानलेवा बन जाती है. सीलिंग और ब्रैकेटिंग से अस्थायी राहत मिल सकती है, लेकिन स्थायी समाधान सिर्फ पुनर्वास है.”-डॉ. संतोष कुमार राय, वरिष्ठ वैज्ञानिक, CIMFR प्रशासन और बीसीसीएल की टीम मौके पर घटना की गम्भीरता को देखते हुए बुधवार-गुरुवार को उपायुक्त आदित्य रंजन, एसएसपी प्रभात कुमार, बीसीसीएल के सीएमडी मनोज कुमार अग्रवाल, डीजीएमएस के डिप्टी डायरेक्टर मोहम्मद जावेद सहित कई वरिष्ठ अधिकारी केन्दुआडीह पहुंचे. अधिकारियों ने प्रभावित परिवारों, मजदूर यूनियन नेताओं और स्थानीय प्रतिनिधियों के साथ लम्बी बैठक की. पुरानी खदानों में बचा कोयला रासायनिक प्रतिक्रिया के कारण गर्म हो रहा है. इससे बैक्टीरिया पैदा होते हैं और जहरीली गैस बनती है. IIT(ISM) धनबाद, CIMFR और डीजीएमएस की संयुक्त टीम तकनीकी जांच कर रही है. गैस के स्रोत को चिह्नित कर सीलिंग का काम तेजी से चल रहा है, लेकिन इसे पूरी तरह रोकना सम्भव नहीं है. लोगों को आपसी सहमति से पुनर्वास स्वीकार करना होगा.”- मनोज कुमार अग्रवाल, सीएमडी, बीसीसीएल एक साल पहले होना था विस्थापन उपायुक्त आदित्य रंजन ने बताया कि केन्दुआडीह का यह इलाका पहले से ही डेंजर जोन में चिह्नित था. एक साल पहले ही यहां के परिवारों का विस्थापन होना था, लेकिन विभिन्न कारणों से प्रक्रिया लम्बित रही. अब प्रशासन ने तय समय-सीमा में शिफ्टिंग पूरा करने का निर्देश दिया है. विशेषज्ञ बोले–पुनर्वास के अलावा कोई विकल्प नहीं डीजीएमएस के डिप्टी डायरेक्टर मोहम्मद जावेद ने स्पष्ट कहा कि पिछले 30 साल से बेलगड़िया टाउनशिप में विस्थापितों को बसाने की योजना चल रही है, लेकिन अब तक बीसीसीएल और जिला प्रशासन पूरा नहीं कर सके. जितनी जल्दी लोगों को बसाया जाए, उतना अच्छा. आजादी से पहले की खदानें हैं, उनके कोई आधिकारिक दस्तावेज नहीं हैं. उस समय सुरक्षा नियमों का पालन नहीं होता था. खदान के अंदर लगी आग से लगातार गैस बन रही है. इसे ढकने से स्थायी हल नहीं निकलेगा. 81 चिह्नित साइटों पर रहने वाले सभी लोगों को शिफ्ट करना जरूरी है, वरना भविष्य में और बड़े हादसे होंगे. स्थानीय लोगों में आक्रोश प्रभावित लोग प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से नाराज हैं. उनका कहना है कि चार दिनों से सिर्फ मीटिंग हो रही है, कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. दो महिलाओं की मौत के बाद भी कोई बड़ा नेता नहीं आया. रोजी-रोटी का क्या होगा? शिफ्टिंग की बात तो करते हैं, लेकिन मुआवजा और नई जगह पर घर-दुकान का इंतजाम कब होगा?. हालांकि धनबाद विधायक राज सिन्हा ही घटना के पहले और बाद में एक बार जायजा लेने पहुंचे थे. अन्य जनप्रतिनिधियों और दिग्गज नेताओं का अभी तक कोई अता-पता नहीं है, जिससे लोगों में और रोष है. GAS LEAK IN DHANBAD गैस रिसाव की जांच करती टीम (ETV Bharat) “बीसीसीएल को तुरंत सभी 81 खतरनाक साइटों पर स्थायी गैस मॉनिटरिंग सिस्टम लगाना चाहिए. रियल-टाइम डेटा से पहले ही खतरे का पता चल जाएगा और जान-माल बचाया जा सकेगा. साथ ही प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा और तत्काल पुनर्वास दिया जाए.”- राजीव शर्मा, अध्यक्ष, कोयलांचल नागरिक मंच पुरानी खदानों का पुराना अभिशाप झारखंड का कोयलांचल क्षेत्र देश का सबसे पुराना कोयला खनन क्षेत्र है. आजादी से पहले ब्रिटिश कम्पनियों ने यहां सैकड़ों खदानें खोदी थीं. सुरक्षा मानकों की अनदेखी और अनियोजित खनन की वजह से कई खदानों में आग लग गई, जो आज तक बुझ नहीं पाई है. इन आग से लगातार जहरीली गैस बन रही है. समय-समय पर भूमि धंसाव, गोफ और अब गैस रिसाव की घटनाएं सामने आती रही हैं. GAS LEAK IN DHANBAD इलाके का दौरा करने पहुंचे अधिकारी (ETV Bharat) विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक इन सभी खतरनाक स्थानों से आबादी को पूरी तरह हटाकर सुरक्षित जगह नहीं बसाया जाता, तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे. केन्दुआडीह की मौजूदा घटना एक चेतावनी है कि अब और देरी बर्दाश्त नहीं की जा सकती. प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि आने वाले कुछ दिनों में शिफ्टिंग प्रक्रिया शुरू हो जाएगी, लेकिन स्थानीय लोग अभी भी इंतजार कर रहे हैं कि कब उनका जीवन फिर से सामान्य होगा.
