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आलेख:-नुसरत प्रवीण

विश्व उर्दू दिवस, जिसे ‘आलमी-यौम-ए-उर्दू’ के नाम से जाना जाता है, हर साल 9 नवंबर को मनाया जाता है। यह दिन महान शायर, दार्शनिक, और राजनीतिज्ञ अल्लामा मुहम्मद इकबाल के जन्मदिवस (यौम-ए-पैदाईश) के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। यह दिवस केवल एक तारीख नहीं, बल्कि उर्दू भाषा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, साहित्यिक परंपरा, और भाषाई विविधता का उत्सव है। इसका उद्देश्य उर्दू की महत्ता को उजागर करना, उसकी लोकप्रियता बढ़ाना और इसके संरक्षण को बढ़ावा देना है।

यह दिन इस बात पर ज़ोर देता है कि उर्दू भाषा किसी धर्म विशेष की नहीं, बल्कि भारत और उपमहाद्वीप की साझा विरासत और ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ का एक अभिन्न हिस्सा है।

तराना-ए-हिंदी: ‘सारे जहाँ से अच्छा’ के रचियता को नमन

इस दिवस का सीधा संबंध अल्लामा मुहम्मद इकबाल से है, जिन्होंने सन् 1904 में ‘तराना-ए-हिंदी’ की रचना की थी। इसकी शुरुआती पंक्तियाँ हैं:

सारे जहां से अच्छा हिंदूस्तान हमारा ,

हम बुलबुले हैं ,जिसकी यह गुलिस्तान हमारा ।।

यह तराना भारत की आजादी से पहले लिखा गया था और आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रवाद और देशभक्ति का एक शक्तिशाली प्रतीक बन गया। आज भी, यह गीत भारतीय सशस्त्र बलों के लिए मार्चिंग गीत के रूप में और सार्वजनिक कार्यक्रमों एवं परेडों के दौरान बजाया जाता है, जिसने इसे राष्ट्रीय गीत की उपलब्धि दिलाई। इकबाल की इस रचना ने यह सिद्ध कर दिया कि उर्दू केवल प्रेम और ग़ज़ल की ही भाषा नहीं, बल्कि अदम्य देशभक्ति और राष्ट्रीय एकता की भावना को व्यक्त करने का भी एक सशक्त माध्यम है।

उर्दू: तहज़ीब और सलीके की ज़ुबान

उर्दू को अक्सर ‘मीठी व सलीके मंद ज़ुबान’ कहा जाता है। यह भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि विनम्रता, शिष्टाचार और उच्च संस्कृति को अपनी जड़ों में समेटे हुए है। इसकी यह ख़ासियत शायरों की पंक्तियों में साफ झलकती है:

लखनऊ के उर्दू शायर मनीष शुक्ला ने उर्दू की इस विशेषता को यूँ बयां किया था:

बात करने का हंसी तौर तरीका सिखा!,

हमने उर्दू के बहाने से सलीका सीखा ।।

वहीं, उर्दू शायर रविश सिद्दीकी ने इसकी खूबसूरती को एक नए आयाम में प्रस्तुत किया:

उर्दू जिसे कहते हैं तहजीब का चश्मा है,

वह शख्स मोहज्ज़ब है, जिसको यह जुबा़ आई ।।

इस ज़ुबान की खूबसूरती का आलम यह है कि, दो लफ्ज़ किसी अंधेरे कमरे में गूंज जाए तो, फानूस की शमां सी रोशनी हो जाए ।।

यह भाव स्पष्ट करता है कि उर्दू जुबान का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति स्वतः ही सुसंस्कृत और विनम्र माना जाता है। यह भाषा भावनाओं को जिस गहराई और नज़ाकत से व्यक्त करती है, वह किसी जादू से कम नहीं है।

भारतीय विरासत में उर्दू का स्थान

उर्दू एक इंडो-आर्यन भाषा है, जो मुख्य रूप से दक्षिण एशिया में बोली जाती है। भारत में, इसे आठवीं अनुसूची की भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है, जो इसकी संवैधानिक स्थिति और सांस्कृतिक विरासत को सुनिश्चित करती है। इसे कई भारतीय राज्यों में आधिकारिक दर्जा भी प्राप्त है।

उर्दू पत्रकारिता का इतिहास भी भारत की साझा संस्कृति को दर्शाता है। उर्दू का पहला अखबार ‘जाम-ए-जहां-नुमा’ जिसकी स्थापना 1822 ईस्वी में हरिहर दत्त ने कोलकाता में की थी। इसका अर्थ होता है, ‘दुनिया को देखने वाला प्याला’। यह भारत में प्रकाशित होने वाला पहला उर्दू समाचार पत्र था।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस अखबार के पहले संपादक सदा सुख लाल थे, जो एक पंजाबी हिंदू थे। यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि उर्दू पत्रिका की शुरुआत से ही यह किसी धर्म विशेष तक सीमित नहीं थी, बल्कि साझा भाषाई प्रेम और विचारों के प्रसार का माध्यम थी।

महान साहित्यकारों पर उर्दू का प्रभाव

भारत के अनेक महान साहित्यकारों और विचारकों ने उर्दू के महत्व को समझा और उसे अपनी रचनाओं में स्थान दिया।

मुंशी प्रेमचंद:

महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा एक मदरसे में उर्दू और फारसी में हासिल की थी। उन्होंने अपनी लेखनी का आरंभ भी उर्दू में ‘नवाब राय’ के नाम से किया था। उनका पहला कहानी संग्रह ‘सोज-ए-वतन’ उर्दू में ही प्रकाशित हुआ था।

हरिवंश राय बच्चन:

कवि हरिवंश राय बच्चन को भी उर्दू का अच्छा ज्ञान था। उन्होंने कायस्थ पाठशाला में अपनी शुरुआती शिक्षा उर्दू में की थी। उस समय कानून की डिग्री के लिए उर्दू को पहला कदम माना जाता था। वे उमर खय्याम की कविताओं से काफी प्रभावित थे।

जयशंकर प्रसाद:

छायावादी युग के प्रमुख स्तंभ जयशंकर प्रसाद भी उर्दू से काफी प्रभावित थे। उन्हें हिंदी और संस्कृत के अलावा उर्दू और फारसी के शिक्षक भी नियुक्त किए गए थे।

फ़िराक गोरखपुरी:

प्रसिद्ध शायर फिराक गोरखपुरी उर्दू के बारे में कहते हैं:

मेरी घुट्टी में पड़ी थी हो के हल उर्दू जवां,

जो भी मैं कहता गया हुस्न बयां बनता गया

ये सभी उदाहरण यह दर्शाते हैं कि उर्दू भाषा भारतीय ज्ञान और साहित्य की एक महत्वपूर्ण धारा रही है, जिसने विभिन्न समुदायों के लेखकों और कवियों को पोषित किया है।

उर्दू और जनमानस

उर्दू की खूबसूरती का असर केवल साहित्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह फिल्मी गीतों और आम बातचीत में भी गहरी पैठ रखती है। गीतों में अक्सर उर्दू के महत्व का गुणगान किया जाता रहा है। उदाहरण के लिए, एक प्रसिद्ध गीत में कहा गया है:

ओ यार है जो खुशबू की तरह,

जिसकी जुबान उर्दू की तरह ।

यह पंक्तियाँ इस बात की तस्दीक करती हैं कि उर्दू जुबान की मिठास को सबसे बड़ी खूबी के तौर पर पेश किया जाता है। शायर अनीश देहलवी ने भी इस बात को स्वीकार किया है:

जो दिल बांधे वह जादू जानता है ,

मिरा महबूब उर्दू जानता है ।।

मशहूर शायर मुनव्वर राणा उर्दू और हिंदी ज़ुबान को ‘सगी दो बहनें’ मानते हैं, जो एक-दूसरे के पूरक हैं।

स्वतंत्रता संग्राम और उर्दू का योगदा

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी उर्दू ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुस्लिम समुदायों के बीच जागरूकता फैलाने और एकजुटता को दर्शाने के लिए उर्दू का उपयोग एक शक्तिशाली उपकरण के रूप में किया गया था। ‘तराना-ए-हिंदी’ इसी एकता की भावना का सबसे बड़ा प्रतीक है।

यहां तक कि आज भी, उर्दू के चाहने वालों की तादाद भारत में बहुत ज्यादा है। शायर हसन काज़मी साहब ने इस देश में उर्दू को मिले प्यार और दुलार को इस अंदाज़ में लिखा था:

सब मिरे चाहने वाले हैं मिरा कोई नहीं,

मैं भी इस मुल्क में उर्दू की तरह रहता हूं ।

यह शे’र उर्दू के प्रति देश के प्रेम को दर्शाता है।

भविष्य में उर्दू का महत्व

अंततः, उर्दू को अपनी भाषा में विनम्रता और शिष्टाचार कोf दर्शाने वाला माना जाता है। भविष्य में उर्दू का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि यह एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, साहित्यिक परंपरा और भाषाई विविधता का प्रतिनिधित्व करती है। यह भाषा हमें सिखाती है कि हम किस तरह अपनी बातों को नज़ाकत और सलीके से पेश कर सकते हैं। विश्व उर्दू दिवस हमें इस अनमोल विरासत को सहेजने और उसे नई पीढ़ी तक पहुँचाने का संकल्प लेने का अवसर देता है।

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