artisan selection travel stories escort listings exclusive offers official site ceramic mugs home decor travel stories storefront adult services local directory home decor online store urban lifestyle escort listings best deals best deals product catalog home decor official site escort listings urban lifestyle local directory ceramic mugs storefront adult services creative works best deals shop now product catalog escort listings local directory buy online urban lifestyle handmade gifts product catalog official site shop now escort listings exclusive offers online store ceramic mugs premium collection travel stories escort listings exclusive offers exclusive offers storefront local directory online store home decor city guide exclusive offers adult services urban lifestyle creative works travel stories home decor local directory home decor
  • Thu. Apr 2nd, 2026

AVN Antarkatha

केरल की धरती से तेजस्वी का ‘पिछड़ा बिहार’ राग: सियासी भूचाल या कड़वा सच?

ByBinod Anand

Apr 2, 2026

बि हार की राजनीति में ‘बिहारी अस्मिता’ और ‘राज्य के विकास’ के बीच की जंग अक्सर बयानों के गलियारों से होकर गुजरती है, लेकिन हाल ही में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव द्वारा केरल की धरती से दिया गया बयान एक बड़े राजनीतिक तूफान की आहट दे गया है।

कोझिकोड में एक मीडिया एजेंसी से बात करते हुए तेजस्वी यादव ने जो शब्द कहे, वे केवल एक राज्य की तुलना दूसरे राज्य से करने तक सीमित नहीं थे, बल्कि उन्होंने बिहार के वर्तमान और भविष्य की राजनीतिक दिशा पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। तेजस्वी यादव का यह कहना कि बिहार देश का सबसे गरीब राज्य है और शिक्षा व स्वास्थ्य के मानकों पर यह सबसे निचले पायदान पर खड़ा है, सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी और एनडीए गठबंधन के लिए एक तीखा हमला बन गया है। इस बयान के बाद बिहार की राजनीति दो ध्रुवों में बंट गई है—एक तरफ वह पक्ष है जो इसे कड़वा सच मानता है और दूसरी तरफ वह पक्ष जो इसे बिहार के गौरव और अस्मिता पर प्रहार करार दे रहा है।

​तेजस्वी यादव का केरल दौरा राजनीतिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि वहां वे एलडीएफ (LDF) के समर्थन में प्रचार करने पहुंचे थे। केरल और बिहार, दोनों ही राज्य अपनी अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं और सामाजिक ढांचे के लिए जाने जाते हैं। केरल जहां मानव विकास सूचकांक (HDI) में देश के शीर्ष राज्यों में शुमार है, वहीं बिहार की चुनौतियां बुनियादी विकास से जुड़ी रही हैं। तेजस्वी ने इसी अंतर को ढाल बनाकर केंद्र सरकार और बिहार की वर्तमान एनडीए सरकार पर निशाना साधा।

उन्होंने कहा कि चूंकि वे एक ऐसे राज्य से आते हैं जो गरीबी की मार झेल रहा है, इसलिए वे विकास की असली परिभाषा को बेहतर समझ सकते हैं। उनका यह तर्क कि केरल ने पिछले दस वर्षों में अभूतपूर्व प्रगति की है और वहां की स्वास्थ्य व शिक्षा व्यवस्था उच्चतम स्तर पर है, सीधा संदेश था कि बिहार इन मानकों पर पिछड़ गया है। तेजस्वी ने न केवल राज्य की स्थिति पर टिप्पणी की, बल्कि केंद्र सरकार पर केरल के साथ ‘सौतेला व्यवहार’ करने का आरोप लगाकर विपक्षी एकजुटता की राष्ट्रीय राजनीति को भी हवा दे दी।

​जैसे ही तेजस्वी यादव का यह बयान मीडिया में प्रसारित हुआ, बिहार में सत्ताधारी दल भाजपा ने इसे राज्य के स्वाभिमान से जोड़कर एक बड़ा मुद्दा बना दिया। भाजपा के प्रवक्ताओं और बड़े नेताओं ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। विशेष रूप से भाजपा प्रवक्ता नीरज कुमार का बयान, जिसमें उन्होंने आदेशात्मक लहजे में तेजस्वी से माफी की मांग की, यह दर्शाता है कि सत्ता पक्ष इस मुद्दे को जनता के बीच ‘बिहारी अस्मिता’ के अपमान के रूप में ले जाने की पूरी तैयारी में है। भाजपा का तर्क सीधा है—कोई भी नेता चाहे वह पक्ष का हो या विपक्ष का, उसे दूसरे राज्य की धरती पर जाकर अपने ही राज्य की छवि को धूमिल नहीं करना चाहिए।

भाजपा का मानना है कि तेजस्वी यादव ने बिहार की 13 करोड़ जनता का अपमान किया है और उनके गौरवशाली इतिहास को नजरअंदाज कर केवल नकारात्मकता फैलाई है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का तंज कि ‘तेजस्वी से बिहार संभल नहीं रहा और वह केरल में प्रचार कर रहे हैं’, इस राजनीतिक हमले को और व्यक्तिगत और आक्रामक बनाता है।
​इस विवाद के पीछे का गहरा विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट होता है कि बिहार की राजनीति अब आंकड़ों और भावनाओं के बीच फंस गई है। एक तरफ नीति आयोग की रिपोर्ट और विभिन्न वैश्विक संस्थाओं के आंकड़े हैं, जो अक्सर बिहार को गरीबी, कुपोषण और बुनियादी ढांचे के मामले में पिछड़ता हुआ दिखाते हैं। तेजस्वी यादव संभवतः इन्हीं आंकड़ों को अपनी राजनीति का आधार बना रहे हैं ताकि वे नीतीश कुमार और भाजपा के लंबे शासनकाल की विफलताओं को उजागर कर सकें।

उनकी पार्टी आरजेडी की ओर से भी यह स्पष्ट किया गया है कि सच बोलना कोई अपराध नहीं है। राजद का कहना है कि यदि बिहार पिछड़ गया है, तो इसे स्वीकार करना और इसे सुधारने की दिशा में काम करना ही असली देशभक्ति और राज्यभक्ति है। उनके समर्थकों का मानना है कि केरल और बिहार की तुलना करके तेजस्वी असल में बिहार के लोगों को यह दिखा रहे हैं कि एक बेहतर सरकार क्या कर सकती है।

​हालांकि, राजनीति केवल आंकड़ों से नहीं चलती, वह भावनाओं और धारणाओं (Perception) से चलती है। भाजपा इस बात को बखूबी समझती है कि बिहार का मतदाता अपने राज्य की प्रतिष्ठा को लेकर अत्यंत संवेदनशील है। ‘बिहारी’ शब्द का इस्तेमाल अक्सर बाहर के राज्यों में नकारात्मक अर्थों में किया जाता रहा है, और ऐसे में जब राज्य का अपना ही नेता प्रतिपक्ष बाहर जाकर उसे ‘सबसे पिछड़ा’ और ‘सबसे गरीब’ बताता है, तो एक बड़े वर्ग को यह बुरा लग सकता है। भाजपा इसी भावना को कैश करने की कोशिश कर रही है। उनका मकसद तेजस्वी यादव को एक ऐसे नेता के रूप में चित्रित करना है जो राज्य के विकास में गौरव महसूस करने के बजाय उसकी कमियां गिनाने में ज्यादा रुचि रखते हैं।

यह ‘अस्मिता कार्ड’ बिहार की चुनावी राजनीति में पहले भी कई बार सफल रहा है, और अब एक बार फिर इसे धार दी जा रही है।
​इस पूरे प्रकरण में एक और महत्वपूर्ण पहलू केंद्र और राज्य के रिश्तों का है। तेजस्वी ने केरल में जाकर जिस तरह से केंद्र सरकार पर सौतेले व्यवहार का आरोप लगाया, वह यह दर्शाता है कि वे आने वाले समय में ‘क्षेत्रीय गौरव’ और ‘केंद्रीय उपेक्षा’ को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाना चाहते हैं। वे बिहार के पिछड़ेपन का दोष वर्तमान राज्य सरकार के साथ-साथ केंद्र की नीतियों पर भी मढ़ना चाहते हैं। लेकिन विरोधाभास तब पैदा होता है जब वे केरल की प्रशंसा करते हैं, क्योंकि केरल की वामपंथी सरकार और केंद्र सरकार के बीच भी वैचारिक मतभेद जगजाहिर हैं।

तेजस्वी यह संदेश देना चाह रहे हैं कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद केरल ने प्रगति की, जबकि बिहार के पास ‘डबल इंजन’ की सरकार होने के बावजूद वह आज भी सबसे निचले पायदान पर है।

​आने वाले दिनों में बिहार की राजनीतिक फिजां में यह बयानबाजी और तेज होने वाली है। सत्ता पक्ष इसे ‘बिहारी अस्मिता’ पर चोट बताकर रैलियों और सोशल मीडिया पर बड़ा अभियान चलाएगा, वहीं विपक्ष इसे ‘सच्चाई का आईना’ बताकर सरकार से जवाब मांगेगा। इस विवाद ने यह भी साफ कर दिया है कि बिहार में अगला चुनाव केवल जातिगत समीकरणों पर नहीं, बल्कि ‘विकास के दावों’ बनाम ‘जमीनी हकीकत’ के बीच लड़ा जाएगा। तेजस्वी यादव ने एक बड़ा राजनीतिक जोखिम मोल लिया है। अगर वे जनता को यह समझाने में सफल रहे कि उनकी मंशा बिहार को सुधारने की है, तो वे एक विजनरी नेता के रूप में उभर सकते हैं। लेकिन अगर भाजपा की यह मुहिम रंग लाई कि उन्होंने बिहार को नीचा दिखाया है, तो यह उनके लिए एक बड़ा राजनीतिक घाटा भी साबित हो सकता है।

​अंततः, यह विवाद केवल बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बिहार की उस विडंबना को दर्शाता है जहां विकास की भूख तो बहुत है, लेकिन उस पर होने वाली चर्चा अक्सर ‘पहचान की राजनीति’ की भेंट चढ़ जाती है। तेजस्वी का केरल दौरा और वहां से दिया गया बयान बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय लिख चुका है, जिसकी गूंज आगामी विधानसभा चुनाव तक सुनाई देगी। भाजपा द्वारा ‘माफी’ की मांग और राजद द्वारा ‘सच के साथ खड़े होने’ की जिद ने बिहार के आम नागरिक के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है—क्या राज्य की कमियों को स्वीकार करना उसका अपमान है, या उन कमियों को छिपाकर गौरव का झूठा गान करना? इस सवाल का जवाब बिहार की जनता आने वाले समय में अपने जनादेश के जरिए देगी। फिलहाल, बिहार की राजनीति में आरोपों और प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो चुका है और यह देखना दिलचस्प होगा कि यह ऊंट किस करवट बैठता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *