बि हार की राजनीति में एक नए युग की आहट सुनाई दे रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार के जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) में शामिल होने के साथ ही प्रदेश की सियासत में उत्तराधिकार को लेकर चल रही अटकलों पर विराम लग गया है, लेकिन इसके साथ ही सवालों का एक नया अंबार भी खड़ा हो गया है। पार्टी के युवा विधायकों और जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं में निशांत को लेकर एक जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है। लंबे समय से यह मांग उठ रही थी कि निशांत सक्रिय राजनीति में आएं ताकि पार्टी के भविष्य को एक सुरक्षित नेतृत्व मिल सके।
कार्यकर्ताओं का मानना है कि निशांत के आने से न केवल पार्टी एकजुट रहेगी, बल्कि भविष्य के चुनावों में संगठन को नई ऊर्जा भी मिलेगी। हालांकि, राजनीति की डगर इतनी आसान नहीं होती, जितनी दूर से नजर आती है। नीतीश कुमार ने पिछले तीन दशकों में जिस तरह की राजनीति की है और अपनी जो विशिष्ट छवि बनाई है, उसे आगे ले जाना निशांत के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा।
उनके सामने फिलहाल पांच ऐसी बड़ी चुनौतियां हैं, जो यह तय करेंगी कि क्या वे अपने पिता की विशाल सियासी विरासत को संभालने की काबिलियत रखते हैं या नहीं।
निशांत कुमार के सामने सबसे पहली और प्रमुख चुनौती जेडीयू के उस ‘कोर वोट बैंक’ को सहेज कर रखने की है जिसे नीतीश कुमार ने दशकों की मेहनत से तैयार किया है। साल 1994 में जब नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव से अलग हुए थे, तब उन्होंने समता पार्टी के माध्यम से गैर-यादव पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग को गोलबंद करना शुरू किया था। 1995 के चुनाव में भले ही पार्टी को कम सफलता मिली, लेकिन 2000 तक आते-आते यह संख्या 37 सीटों तक पहुंच गई। नीतीश कुमार की ताकत हमेशा से बिहार का अति पिछड़ा वर्ग रहा है। निशांत के लिए यह बड़ी चुनौती होगी कि वे इस वर्ग के नेताओं और मतदाताओं के बीच अपनी पैठ कैसे बनाते हैं। यदि इस पारंपरिक वोट बैंक में थोड़ी सी भी दरार आती है, तो जेडीयू के अस्तित्व पर संकट मंडरा सकता है। उन्हें यह साबित करना होगा कि वे केवल नीतीश कुमार के बेटे नहीं हैं, बल्कि अति पिछड़ों के हितों की रक्षा करने वाले एक सजग नेता भी हैं।
दूसरी बड़ी चुनौती महिला मतदाताओं के भरोसे को बरकरार रखने की है। 2005 में सत्ता संभालने के बाद नीतीश कुमार ने बिहार में ‘साइलेंट वोटर’ के रूप में महिलाओं की एक ऐसी फौज तैयार की जो हर चुनाव में उनके लिए सुरक्षा कवच का काम करती रही है। पंचायती राज संस्थाओं में 50 प्रतिशत आरक्षण, साइकिल योजना, पोशाक योजना और बाद में शराबबंदी जैसे कड़े फैसले लेकर नीतीश ने महिलाओं का जो अटूट विश्वास जीता, उसे बनाए रखना निशांत के लिए अनिवार्य होगा। निशांत को यह सुनिश्चित करना होगा कि सरकार और पार्टी की नीतियों में महिला सशक्तिकरण का मुद्दा प्राथमिकता पर रहे। उन्हें अपनी कार्यशैली से यह संदेश देना होगा कि वे आधी आबादी की समस्याओं के प्रति उतने ही गंभीर हैं जितने उनके पिता रहे हैं।
निशांत के सामने तीसरी चुनौती पार्टी के भीतर अपनी स्वीकार्यता बनाना और संगठन पर पकड़ मजबूत करना है। जेडीयू में कई ऐसे कद्दावर नेता हैं जो नीतीश कुमार के साथ समता पार्टी के दौर से जुड़े हुए हैं। ऐसे अनुभवी नेताओं का सम्मान करते हुए, युवाओं को साथ जोड़ना और कार्यकर्ताओं का दिल जीतना निशांत के लिए एक कठिन संतुलनकारी कार्य होगा। साल 2030 के बिहार विधानसभा चुनाव को देखते हुए निशांत को अभी से अपनी एक अलग और प्रभावशाली पहचान बनानी होगी। इसके लिए उन्हें एयरकंडीशंड कमरों से निकलकर बिहार के गांवों और कस्बों की खाक छाननी होगी। जनता के बीच जाकर उनका दुख-दर्द समझना होगा, क्योंकि बिहार जैसे राज्य में नेता वही सफल होता है जिसकी जड़ें जनता के बीच गहरी होती हैं।
चौथी चुनौती बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच खुद को स्थापित करने की है। वर्तमान में चर्चाएं गर्म हैं कि नीतीश कुमार की सक्रिय राजनीति में भूमिका बदलने के बाद बिहार में सत्ता का केंद्र बदल सकता है। गठबंधन की राजनीति में बीजेपी और अन्य दलों के साथ तालमेल बिठाते हुए अपनी पार्टी की प्रासंगिकता बनाए रखना निशांत के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा। नई सरकार में उन्हें जो भी जिम्मेदारी मिले, उन्हें राजनीति में चौबीसों घंटे सक्रिय रहना होगा। उन्हें न केवल अपने प्रशासनिक कौशल को साबित करना होगा, बल्कि यह भी दिखाना होगा कि संकट के समय में वे पार्टी के लिए एक मजबूत ढाल बन सकते हैं। राजनीति कोई अंशकालिक पेशा नहीं है, और निशांत को अपनी मेहनत से यह दिखाना होगा कि वे लंबी रेस के खिलाड़ी हैं।
पांचवीं और सबसे महत्वपूर्ण चुनौती नीतीश कुमार की ‘मिस्टर क्लीन’ वाली छवि और उनके विकास कार्यों को आगे बढ़ाने की है। नीतीश कुमार की पहचान एक ऐसे राजनेता की रही है जिन पर भ्रष्टाचार का कोई दाग नहीं लगा। निशांत को भी इसी शुचिता के साथ काम करना होगा। उन्हें जनता को यह भरोसा दिलाना होगा कि वे न केवल अपने पिता के उत्तराधिकारी हैं, बल्कि उनके आदर्शों के भी रक्षक हैं। इसके लिए उन्हें व्यापक स्तर पर जनसभाएं करनी होंगी, प्रचार-प्रसार का सहारा लेना होगा और सीधे संवाद के जरिए लोगों के मन में यह बात बैठानी होगी कि निशांत में वही संयम, गंभीरता और काम करने का जज्बा है जो नीतीश कुमार में रहा है। अगर निशांत इन पांचों मोर्चों पर खुद को साबित कर पाते हैं, तभी वे नीतीश कुमार की उस महान विरासत के असली हकदार कहलाएंगे जिसने आधुनिक बिहार की नींव रखी है। आने वाला समय बिहार की राजनीति और निशांत कुमार के राजनीतिक कौशल के लिए निर्णायक साबित होने वाला है।

