artisan selection travel stories escort listings exclusive offers official site ceramic mugs home decor travel stories storefront adult services local directory home decor online store urban lifestyle escort listings best deals best deals product catalog home decor official site escort listings urban lifestyle local directory ceramic mugs storefront adult services creative works best deals shop now product catalog escort listings local directory buy online urban lifestyle handmade gifts product catalog official site shop now escort listings exclusive offers online store ceramic mugs premium collection travel stories escort listings exclusive offers exclusive offers storefront local directory online store home decor city guide exclusive offers adult services urban lifestyle creative works travel stories home decor local directory home decor
  • Fri. Mar 6th, 2026

AVN Antarkatha

भारतीय राजनीति के ऋषि-तुल्य मनीषी: रामेश्वर ठाकुर की गौरव गाथा

ByBinod Anand

Mar 6, 2026

बिहार की पावन माटी के लाल, रामेश्वर ठाकुर भारतीय राजनीति के उन विरले महानायकों में से थे, जिन्होंने 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की क्रांति से लेकर आधुनिक भारत के निर्माण तक अपनी अमिट छाप छोड़ी। एक प्रखर स्वतंत्रता सेनानी और ‘इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया’ (ICAI) के पूर्व अध्यक्ष के रूप में उन्होंने वित्तीय शुचिता के नए मानक स्थापित किए। केंद्रीय मंत्री और चार राज्यों (ओडिशा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश) के राज्यपाल के पद को सुशोभित करने वाले ठाकुर जी का संपूर्ण जीवन ‘सादगी ही शक्ति है’ के गांधीवादी दर्शन का जीवंत उदाहरण रहा।

लेखक :-विनोद आनंद 

तिहास के झरोखों से जब हम भारत के स्वर्णिम कालखंड की ओर देखते हैं, तो हमें कुछ ऐसे नक्षत्र दिखाई देते हैं जो अपनी चमक से नहीं, बल्कि अपनी तपस्या से संपूर्ण आकाश को आलोकित करते हैं। बिहार की उर्वर माटी के लाल और भारतीय राजनीति के सादगी पसंद मनीषी, स्वर्गीय रामेश्वर ठाकुर जी एक ऐसा ही नाम हैं। उनका जीवन किसी महाकाव्य की भांति है, जिसमें संघर्ष की अग्नि है, राष्ट्रभक्ति का अटूट संकल्प है और सत्यनिष्ठा की वह सुगंध है जो आने वाली पीढ़ियों का मार्ग प्रशस्त करती रहेगी। यह कथा उस बालक की है जिसने संताल परगना की धूल भरी गलियों से निकलकर देश के सर्वोच्च राजभवनों तक का सफर तय किया, लेकिन अपनी सादगी और मिट्टी की सोंधी महक को कभी ओझल नहीं होने दिया।

​28 जुलाई 1927 की वह सुबह, गोड्डा (तत्कालीन अविभाजित बिहार, वर्तमान झारखंड) के छोटे से गाँव सागरपुर के लिए सामान्य रही होगी, पर नियति वहां एक इतिहास लिख रही थी। एक ऐसे बालक का जन्म हुआ जिसे आगे चलकर देश की अर्थव्यवस्था और राजनीति के बीच एक सेतु बनना था। रामेश्वर बाबू का बचपन अभावों में नहीं, बल्कि उन मूल्यों के बीच बीता जहां राष्ट्र सर्वोपरि था। उनकी आँखों में केवल व्यक्तिगत उन्नति के सपने नहीं थे, बल्कि एक पराधीन राष्ट्र की बेड़ियाँ काटने का अटूट साहस था। जब वे पटना विश्वविद्यालय और बाद में कलकत्ता विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, तब भारत अपनी स्वाधीनता के निर्णायक मोड़ पर खड़ा था।

​वर्ष 1942 का वह दौर जब समूचा देश ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की ज्वाला में धधक रहा था, युवा रामेश्वर ठाकुर के भीतर का छात्र राजनीतिज्ञ जाग उठा। महात्मा गांधी का ‘करो या मरो’ का आह्वान उनके हृदय में तीर की तरह उतर गया। उन्होंने किताबों को एक ओर रखकर क्रांति की मशाल थाम ली। वह दृश्य आज भी इतिहास के पन्नों में जीवंत है, जब एक मेधावी छात्र अपनी सुध-बुध खोकर भूमिगत हो गया था। महीनों तक वे पुलिस की नज़रों से बचकर आज़ादी के दीवानों को संगठित करते रहे। जेल की सलाखें भी उनके हौसलों को नहीं तोड़ सकीं। स्वतंत्रता की वह अग्नि, जिसमें वे उस समय तपे थे, उनके चरित्र में अंत तक एक कुंदन जैसी चमक पैदा करती रही।

​आज़ादी के बाद, जब देश निर्माण का समय आया, तो रामेश्वर ठाकुर जी ने अपनी विद्वत्ता को एक नया आयाम दिया। वे केवल एक भावुक क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि एक सूक्ष्म बुद्धि वाले अर्थशास्त्री भी थे। उन्होंने चार्टर्ड अकाउंटेंसी के कठिन मार्ग को चुना और अपनी मेधा से इस क्षेत्र में शिखर पर पहुँचे। उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि वे व्यापार और अर्थ के पेचीदा आंकड़ों में भी नैतिकता की खोज करते थे। ‘इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया’ (ICAI) के अध्यक्ष के रूप में उनकी पारी ने इस पेशे को एक नई गरिमा और शुचिता प्रदान की। उनके लिए चार्टर्ड अकाउंटेंसी केवल लाभ-हानि का विवरण नहीं था, बल्कि राष्ट्र की आर्थिक सेहत की पहरेदारी थी।

​उनकी इस बौद्धिक प्रखरता और निष्कलंक छवि ने उन्हें राजनीति की मुख्यधारा में खींच लिया। दिल्ली की सत्ता के गलियारों में जब वे पहुँचे, तो अपने साथ बिहार की उस माटी की ईमानदारी लेकर आए थे जहाँ पद प्रतिष्ठा के लिए नहीं, बल्कि सेवा के लिए होते हैं। केंद्रीय मंत्री के रूप में उन्होंने ग्रामीण विकास और राजस्व जैसे मंत्रालयों में अपनी गहरी छाप छोड़ी। उनका मानना था कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है और जब तक एक गरीब किसान की आय में पारदर्शिता नहीं आएगी, तब तक राष्ट्र सशक्त नहीं होगा। उन्होंने राजस्व के जटिल नियमों को जन-सामान्य के हित में मोड़ने का भागीरथी प्रयास किया।

​रामेश्वर ठाकुर जी के जीवन का सबसे गरिमामय अध्याय तब शुरू हुआ जब उन्हें राज्यों के संवैधानिक प्रमुख की जिम्मेदारी सौंपी गई। ओडिशा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे विशाल और विविध संस्कृति वाले राज्यों के राज्यपाल के रूप में उन्होंने ‘राजभवन’ को ‘जन-भवन’ में बदल दिया। उन्होंने सिद्ध किया कि पद पर रहते हुए भी कैसे एक व्यक्ति अपनी जड़ों से जुड़ा रह सकता है। उनकी कार्यशैली में एक ऋषिवत गंभीरता थी। जब वे किसी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में होते थे, तो वे एक कुलाधिपति नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक शिक्षक नजर आते थे। उनकी निष्पक्षता का सम्मान सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों समान रूप से करते थे।

​उनका साहित्यिक और बौद्धिक पक्ष भी उतना ही प्रगाढ़ था। वे अक्सर कहा करते थे कि सत्यनिष्ठा केवल शब्दों में नहीं, बल्कि हमारे चरित्र में झलकनी चाहिए। उनके व्याख्यानों में केवल आंकड़े नहीं होते थे, बल्कि उनमें उपनिषदों का सार और गांधीवादी दर्शन की सादगी होती थी। वे एक ऐसे राजनेता थे जो सत्ता के कोलाहल में भी मौन की शक्ति को समझते थे। उनके जीवन का उत्तरार्ध भी उतना ही कर्मयोगी रहा। 15 जनवरी 2015 को जब उन्होंने इस नश्वर संसार से विदा ली, तो पीछे छोड़ गए शुचिता की एक ऐसी विरासत, जिसकी मिसाल आज के दौर में दुर्लभ है।

​आज जब हम रामेश्वर ठाकुर जी की पावन स्मृति को नमन करते हैं, तो हमें याद आता है वह सागरपुर का लड़का जो आज़ादी की लड़ाई में भागा था, वह सीए जो ईमानदारी की मिसाल बना, और वह राज्यपाल जिसके लिए कर्तव्य ही सबसे बड़ा धर्म था। वे बिहार के उस स्वाभिमान के प्रतीक हैं जो झुकना नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलना जानता है। उनकी जीवन-गाथा केवल एक व्यक्ति का इतिहास नहीं है, बल्कि स्वतंत्र भारत के उन मूल्यों की यात्रा है जिन्हें बचाए रखना आज अत्यंत आवश्यक है। कोटि-कोटि नमन उस महामानव को, जिसने अपने कर्मों से भारतीय लोकतंत्र को गौरवान्वित किया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *