धनबाद, जिसे देश की कोयला राजधानी कहा जाता है, वहां की राजनीति केवल सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह खदानों की गहराई, मजदूरों के पसीने और विस्थापन के दर्द से जुड़ी होती है। संजीव सिंह की इस जीत ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि जनता के दिलों पर राज करने के लिए केवल विज्ञापनों की जरूरत नहीं होती, बल्कि उस भरोसे की आवश्यकता होती है जिसे सूर्यदेव सिंह ने अपने संघर्षों से सींचा था।

(विनोद आनंद )
ध नबाद की तपती जमीन और कोयले की खानों से उठते धुएं के बीच पिछले पांच दशकों से एक नाम की गूंज कभी कम नहीं हुई, और वह नाम है ‘सिंह मेंशन’। आज जब संजीव सिंह ने मेयर पद पर अपनी जीत दर्ज कर धनबाद की सियासत को एक बार फिर गर्मा दिया है, तो यह केवल एक चुनावी जीत मात्र नहीं है, बल्कि उस अजेय राजनीतिक विरासत की पुनरावृत्ति है जिसकी नींव आधी सदी पहले महान मजदूर नेता सूर्यदेव सिंह ने रखी थी।
धनबाद, जिसे देश की कोयला राजधानी कहा जाता है, वहां की राजनीति केवल सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह खदानों की गहराई, मजदूरों के पसीने और विस्थापन के दर्द से जुड़ी होती है। संजीव सिंह की इस जीत ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि जनता के दिलों पर राज करने के लिए केवल विज्ञापनों की जरूरत नहीं होती, बल्कि उस भरोसे की आवश्यकता होती है जिसे सूर्यदेव सिंह ने अपने संघर्षों से सींचा था।
साल 1961 की वह बेला आज भी धनबाद के इतिहास में दर्ज है, जब उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के गोन्हिया छपरा गांव से एक 22 साल का गठीला और दृढ़ संकल्पी युवक रोजगार की तलाश में खाली हाथ झरिया पहुंचा था। उस वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि यह युवक आने वाले समय में न केवल धनबाद का ‘बेताज बादशाह’ बनेगा, बल्कि भारतीय राजनीति के शिखर पुरुषों में शुमार पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का सबसे विश्वसनीय साथी भी कहलाएगा।
सूर्यदेव सिंह का व्यक्तित्व केवल एक राजनेता का नहीं, बल्कि एक ऐसे रक्षक का था जिसने मजदूरों को उनके हक के लिए लड़ना सिखाया। कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण से पहले का वह दौर बेहद खौफनाक था, जहां मजदूरों का शोषण चरम पर था।
बाहर से आने वाले कामगारों की सुध लेने वाला कोई नहीं था, लेकिन सूर्यदेव सिंह ने अपनी शारीरिक शक्ति और अदम्य साहस के बल पर जल्द ही अपनी पहचान एक पहलवान और फिर एक निडर नेता के रूप में स्थापित कर ली। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि 1977 के आपातकाल के बाद जब देश में बदलाव की लहर चली, तो चंद्रशेखर के सुझाव पर उन्हें जनता पार्टी का टिकट मिला और वे पहली बार झरिया के विधायक बने।
1977 से लेकर 1991 तक झरिया की जनता ने उन्हें अपना अटूट प्रेम दिया। सूर्यदेव सिंह और चंद्रशेखर के बीच का संबंध इतना प्रगाढ़ था कि जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने धनबाद आकर इस मित्रता का मान बढ़ाया।
सूर्यदेव सिंह की मृत्यु 1991 में आरा लोकसभा चुनाव के परिणामों से ठीक पहले हृदय गति रुकने से हुई, लेकिन उनके जाने के बाद भी ‘सिंह मेंशन’ का दीपक बुझा नहीं, बल्कि उनकी विरासत को उनके परिवार ने और अधिक प्रज्वलित किया।
सूर्यदेव सिंह के बाद उनके भाई बच्चा सिंह ने झरिया की कमान संभाली और क्षेत्र की समस्याओं को सरकार के समक्ष मजबूती से रखा। इसके बाद सूर्यदेव सिंह की पत्नी कुंती सिंह ने अपनी सादगी और जनता के प्रति अपनी ममता से झरिया के लोगों के दिलों में जगह बनाई।
विरासत की यह मशाल जब संजीव सिंह के हाथों में आई, तो उन्होंने इसे आधुनिक राजनीति के तेवरों के साथ आगे बढ़ाया। विधायक के रूप में संजीव सिंह ने अपने पिता के उन अधूरे सपनों को पूरा करने का बीड़ा उठाया, जो मजदूरों और विस्थापितों के कल्याण से जुड़े थे।
हालांकि, समय के चक्र ने उन्हें जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया, लेकिन धनबाद की जनता का उनके प्रति विश्वास कम होने के बजाय और बढ़ गया। संजीव सिंह की अनुपस्थिति में उनकी पत्नी रागिनी सिंह ने जिस प्रकार मोर्चा संभाला है, वह किसी वीरांगना से कम नहीं है।
रागिनी सिंह ने न केवल सिंह मेंशन की गरिमा को अक्षुण्ण रखा, बल्कि झरिया के अस्तित्व को बचाने के लिए जो लड़ाई छेड़ी है, उसने पूरे धनबाद को एक सूत्र में पिरो दिया है।
झरिया आज आग और धंसान की समस्या से जूझ रहा है, जहां जमीन के नीचे धधकती आग लोगों के घरों तक पहुंच चुकी है। ऐसे में रागिनी सिंह का यह स्पष्ट रुख कि ‘झरिया को किसी भी हाल में खाली नहीं करने दिया जाएगा’, जनता के लिए एक बहुत बड़ा संबल बनकर उभरा है।
संजीव सिंह की मेयर पद पर जीत आज की राजनीति में एक बड़ा संकेत है। यह जीत बताती है कि धनबाद की जनता आज भी सूर्यदेव सिंह के उस उपकार को नहीं भूली है, जो उन्होंने मजदूरों के लिए किया था।
विरोधियों ने कई बार इस परिवार की छवि को धूमिल करने की कोशिश की, खूनी संघर्षों के आरोप लगे और कानूनी अड़चनें आईं, लेकिन सिंह मेंशन का द्वार आज भी आम आदमी के लिए चौबीसों घंटे खुला रहता है।
रागिनी सिंह जिस तरह से लगातार लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याओं को सुन रही हैं और संजीव सिंह के कार्यों को आगे बढ़ा रही हैं, उसने विरोधियों के तमाम समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है।
धनबाद की सियासत में इस परिवार का महत्व इसलिए भी है क्योंकि इन्होंने केवल सत्ता का उपभोग नहीं किया, बल्कि झरिया के उन मजदूरों के साथ खड़े रहे जो यूपी, बिहार और बंगाल से आकर यहां की मिटटी में मिल गए थे। संजीव सिंह की जीत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सूर्यदेव सिंह की विरासत आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी वह चार दशक पहले थी।
यह जीत उन तमाम दावों का जवाब है जो कहते थे कि नई पीढ़ी के बीच सिंह मेंशन का प्रभाव कम हो रहा है। इसके विपरीत, संजीव सिंह की लोकप्रियता ने यह दर्शाया है कि धनबाद की जनता अपने ‘मसीहा’ के परिवार को कभी अकेला नहीं छोड़ती।
आज जब धनबाद विकास और विस्थापन के दोराहे पर खड़ा है, तब संजीव सिंह की यह जीत एक नई उम्मीद लेकर आई है। यह जीत केवल मेयर पद की कुर्सी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह झरिया के उन हजारों परिवारों की जीत है जो अपनी जमीन और अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
सिंह परिवार ने पीढ़ी दर पीढ़ी यह साबित किया है कि वे जनता के सुख-दुख के साथी हैं। चाहे वह बच्चा सिंह का दौर हो, कुंती सिंह का मातृत्व हो, संजीव सिंह का संघर्ष हो या रागिनी सिंह की निडरता—इन सबके केंद्र में केवल सूर्यदेव सिंह का वह सेवा भाव है जो उन्होंने 1961 में बलिया से लेकर धनबाद तक के अपने सफर में कमाया था।
आने वाले समय में धनबाद की राजनीति और अधिक दिलचस्प होगी, क्योंकि संजीव सिंह की यह जीत एक नए युग का सूत्रपात है, जहां विरासत और जनता का विश्वास मिलकर धनबाद के भविष्य की नई इबारत लिखेंगे।
यह जीत इस बात का प्रमाण है कि जिस परिवार ने मजदूरों के आंसू पोंछे हैं, जनता उसे कभी सत्ता से बेदखल नहीं करती। सिंह मेंशन की यह अटूट धमक आने वाले कई दशकों तक धनबाद की फिजाओं में गूंजती रहेगी और सूर्यदेव सिंह का नाम मजदूरों के मसीहा के रूप में अमर रहेगा।

