स्मृति लेख: सीता राम गोस्वामी (ज्येष्ठ पुत्र )
साँसो को सहज कर दिया
औरों की पीर चूराकर…।
वह मसीहा चला गया,
मानवता का मान बढ़ा कर ।।
उद्भव: एक साधारण बीज से वटवृक्ष तक
सन् 1943 का वह समय, जब भारत अपनी स्वतंत्रता की दहलीज पर खड़ा था, उसी कालखंड में एक अत्यंत साधारण परिवार में एक बालक का जन्म हुआ—देवनारायण गोस्वामी। संसाधनों की कमी थी, सुविधाएं सीमित थीं, लेकिन आँखों में कुछ कर गुजरने का संकल्प और हृदय में करुणा का समंदर हिलोरे मार रहा था। बचपन से ही उन्होंने अभावों को देखा, शायद इसीलिए वे जीवन भर अभावग्रस्तों के ‘अपने’ बने रहे। शिक्षा प्राप्त करना उस दौर में सहज नहीं था, किंतु अपनी मेधा और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर उन्होंने चिकित्सा के क्षेत्र को चुना। यह चुनाव केवल एक करियर का नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन का था।
चिकित्सा: पेशा नहीं, ‘मानव-धर्म’ का पर्याय
जब देवनारायण जी ने अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी की, तो उनके सामने महानगरों की चकाचौंध और धन-दौलत के अंबार लगाने के कई रास्ते खुले थे। लेकिन उन्होंने उस कठिन मार्ग को चुना जिसे ‘त्याग का मार्ग’ कहा जाता है। उन्होंने ग्रामीण अंचलों और विशेषकर झारखंड के ‘कोयलांचल’ की माटी को अपनी कर्मभूमि बनाया।
कोयलांचल—जहाँ मजदूर पसीने और कोयले की कालिख के बीच अपनी जिंदगी गुजारते हैं। बाबा ने देखा कि यहाँ गरीबी के कारण लोग छोटी-छोटी बीमारियों से दम तोड़ देते हैं। उन्होंने कसम खाई कि वे इन शोषितों और वंचितों के लिए ‘मसीहा’ बनेंगे। चिकित्सा उनके लिए कोई व्यवसाय नहीं थी, बल्कि एक ‘अनुष्ठान’ थी।
उन्होंने यह मिसाल कायम की कि एक डॉक्टर केवल सफेद कोट पहनने वाला पेशेवर नहीं, बल्कि ईश्वर का भेजा हुआ वह दूत है जो दूसरों के दुखों को अपनी झोली में भर लेता है।
नैतिकता का दीप: बाजारवाद के विरुद्ध एक युद्ध
डॉ. देवनारायण गोस्वामी, जिन्हें पूरा क्षेत्र ‘बाबा’ के नाम से पूजने लगा था, वर्तमान समय की व्यावसायिक चिकित्सा पद्धति से अत्यंत दुखी रहते थे। वे अक्सर कहते थे, “डॉक्टर के पास केवल स्टेथोस्कोप और दवा नहीं होनी चाहिए, उसके शब्दों में सांत्वना और आँखों में प्रेम होना चाहिए।” आज के दौर में जहाँ चिकित्सा एक लाभ कमाने वाला उद्योग बन चुकी है, बाबा ने उस धारा के विपरीत तैरने का साहस दिखाया। वे इस बात से बहुत व्यथित थे कि कैसे लोग मामूली बीमारियों को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं, अनावश्यक जांचें करवाते हैं और महंगी दवाएं लिखकर गरीब मरीजों की कमर तोड़ देते हैं। उनका सिद्धांत स्पष्ट था—”स्वस्थ रहना हर मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है।” उन्होंने जीवनपर्यंत यह सुनिश्चित किया कि उनके पास आने वाला कोई भी व्यक्ति केवल इसलिए इलाज से वंचित न रह जाए क्योंकि उसकी जेब खाली है।
“बाबा हॉस्पिटल”: अटूट विश्वास का एक मंदिर
कतरास बाजार स्थित ‘बाबा हॉस्पिटल’ केवल एक क्लीनिक या अस्पताल नहीं रहा, बल्कि वह हजारों परिवारों के लिए ‘आस्था का केंद्र’ बन गया। पिछले 50 वर्षों से इस संस्थान की दीवारें बाबा की सेवा भावना की गवाह रही हैं। आधी रात को किसी के कराहने की आवाज आए या तपती दोपहर में कोई असहाय दरवाजे पर दस्तक दे, बाबा ने कभी किसी को ‘कल आना’ नहीं कहा।
मरीजों के बीच यह बात प्रसिद्ध थी कि “बाबा का स्पर्श ही आधी बीमारी काट देता है।” यह उनके मेडिकल ज्ञान के साथ-साथ उनके भीतर की सात्विकता और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रभाव था। उन्होंने हजारों उन चेहरों पर मुस्कान लौटाई, जो निराशा के अंधकार में डूब चुके थे। उनके लिए मरीज केवल एक फाइल नंबर नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य था।
सादगी: महानता का वास्तविक आभूषण
इतने लंबे और सफल करियर के बावजूद, बाबा के जीवन में तनिक भी अहंकार नहीं आया। उनकी सौम्यता और सादगी उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी रही। उन्होंने सिखाया कि असली धन बैंकों में जमा राशि नहीं, बल्कि उन लोगों की ‘दुआएं’ हैं जिन्हें आपने नया जीवन दिया है। वे एक ऐसे तपस्वी थे जिन्होंने समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचकर ईश्वर की सेवा की।
महाप्रयाण और शून्य की स्थिति
6 मार्च 2024 का वह दिन समाज के लिए एक काला अध्याय बनकर आया, जब बाबा ने अपना भौतिक शरीर त्याग दिया। उनके प्रस्थान से कोयलांचल और ग्रामीण क्षेत्रों में एक ऐसा शून्य पैदा हो गया है, जिसे युगों तक भरा नहीं जा सकेगा। हवाओं में आज भी उनकी कमी महसूस होती है, गलियां आज भी 🤣उनकी मद्धम मुस्कान को ढूंढती हैं।
किंतु, महापुरुष कभी मरते नहीं। वे अपने विचारों, अपने संस्कारों और अपने कार्यों के माध्यम से सदैव जीवित रहते हैं। बाबा ने सेवा का जो पौधा लगाया था, वह आज एक विशाल वृक्ष बन चुका है। उनके संस्कार आज भी उनके परिवार और ‘बाबा हॉस्पिटल’ के कण-कण में रचे-बसे हैं।
संकल्प और विरासत हमारा परिवार और यह समाज
बाबा की इस 50 वर्षों की ‘तपस्या’ का ऋणी है। उनकी विरासत कोई संपत्ति नहीं, बल्कि वह ‘कर्तव्यपथ’ है जिसे उन्होंने अपने पैरों के निशानों से बनाया है। हम संकल्प लेते हैं कि हम उनके दिखाए सेवा, सच्चाई और निस्वार्थ भाव के मार्ग से कभी विचलित नहीं होंगे। बाबा हमारे विचारों में, हमारी प्रार्थनाओं में और हर उस चेहरे की मुस्कान में जीवित रहेंगे जिसे स्वास्थ्य का वरदान मिलेगा।

