जांच एजेंसियों द्वारा बिना किसी ठोस आधार के किसी भी राजनीतिक हस्ती के विरुद्ध कार्रवाई करना न केवल व्यक्ति विशेष के मौलिक अधिकारों का हनन है, बल्कि यह भविष्य के लिए एक डरावनी मिसाल है। यदि आज इसे नहीं रोका गया, तो आने वाले समय में कोई भी व्यक्ति सत्ता के कोपभाजन से सुरक्षित नहीं रहेगा।
भा रत जैसे जीवंत लोकतंत्र में ‘कानून का शासन’ और ‘संस्थागत निष्पक्षता’ दो ऐसे स्तंभ हैं, जिन पर आम नागरिक का भरोसा टिका होता है। नेशनल हेराल्ड मामले में दिल्ली कोर्ट का हालिया रुख न केवल राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा करने वाला है, बल्कि यह देश की शीर्ष जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। जब अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) के आरोपपत्र पर संज्ञान लेने से इनकार करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि न यहाँ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला है और न ही ‘अपराध की कमाई’ (Proceeds of Crime) का कोई प्रमाण, तो यह केवल एक कानूनी जीत नहीं, बल्कि उस नैरेटिव की हार है जिसे वर्षों से बुना जा रहा था।
षड्यंत्र का पर्दाफाश और सत्य की शक्ति
पिछले कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति के केंद्र में नेशनल हेराल्ड का मामला एक ‘ब्रह्मास्त्र’ की तरह इस्तेमाल किया गया। सोनिया गांधी और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को घंटों तक पूछताछ के नाम पर बुलाना, मानसिक दबाव बनाना और सार्वजनिक पटल पर एक अपराधी की तरह पेश करने की कोशिशें की गईं। राहुल गांधी ने अक्सर अपनी रैलियों में कहा है कि “सत्य की ताकत सत्ता से ज्यादा शक्तिशाली होती है।” आज कोर्ट के फैसले ने इस वाक्य को एक संवैधानिक मुहर दे दी है।
अदालत का यह कहना कि संपत्ति के लेन-देन का कोई सबूत नहीं है, सीधे तौर पर यह संकेत देता है कि यह मामला कानूनी आधार पर कम और राजनीतिक द्वेष की बुनियाद पर ज्यादा खड़ा किया गया था। यह ‘सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं’ के सिद्धांत की जीवंत विजय है।
एजेंसियों की गिरती साख: एक चिंताजनक रुझान
विपक्ष का यह आरोप अब और प्रबल हो गया है कि केंद्रीय एजेंसियां स्वतंत्र रूप से काम करने के बजाय सत्ता के ‘हथियार’ के रूप में इस्तेमाल हो रही हैं। चाहे वह अरविंद केजरीवाल का मामला हो या हेमंत सोरेन का, जब जांच एजेंसियां महीनों तक किसी व्यक्ति को सलाखों के पीछे रखने के बाद भी कोर्ट में पुख्ता सबूत पेश नहीं कर पातीं, तो उनकी पेशेवर साख धूल धूसरित हो जाती है।
“जब जांच एजेंसियां तथ्यों के बजाय ‘इशारों’ पर काम करने लगती हैं, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होने लगती है। निर्दोष की छवि पर लगाया गया दाग और घंटों की प्रताड़ना की भरपाई कौन करेगा?”
राजनीतिक दुर्भावना और अलोकतांत्रिक आचरण
पिछले एक दशक में भारत की राजनीतिक संस्कृति में एक खतरनाक बदलाव आया है। विरोधियों को राजनीतिक रूप से हराने के बजाय उन्हें कानूनी पेचीदगियों में फंसाकर ‘खत्म’ करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। सोशल मीडिया पर गलत नैरेटिव गढ़ना, टीवी डिबेट्स में अमर्यादित भाषा का प्रयोग और असंसदीय व्यवहार ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की छवि को वैश्विक स्तर पर चोट पहुंचाई है।
जांच एजेंसियों द्वारा बिना किसी ठोस आधार के किसी भी राजनीतिक हस्ती के विरुद्ध कार्रवाई करना न केवल व्यक्ति विशेष के मौलिक अधिकारों का हनन है, बल्कि यह भविष्य के लिए एक डरावनी मिसाल है। यदि आज इसे नहीं रोका गया, तो आने वाले समय में कोई भी व्यक्ति सत्ता के कोपभाजन से सुरक्षित नहीं रहेगा।
उत्तरदायित्व तय करने का समय
अब समय आ गया है कि एक ऐसा ‘कानूनी सुरक्षा घेरा’ (Legal Framework) तैयार किया जाए, जो एजेंसियों की निरंकुशता पर लगाम लगा सके।
- जवाबदेही: यदि कोई एजेंसी बिना सबूत के किसी की प्रतिष्ठा को धूमिल करती है या उसे प्रताड़ित करती है, तो संबंधित अधिकारियों और उनके पीछे की शक्तियों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।
- न्यायिक समीक्षा: गिरफ्तारी से पहले साक्ष्यों की प्रारंभिक न्यायिक समीक्षा अनिवार्य होनी चाहिए, ताकि PMLA जैसे कठोर कानूनों का दुरुपयोग रोका जा सके।
- मुआवजा: गलत तरीके से फंसाए गए व्यक्तियों के लिए क्षतिपूर्ति का प्रावधान हो।
