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आज सपना फिर से स्कूल जा रही है, आंखों में उम्मीद और आत्मविश्वास की चमक लिए। यह सिर्फ एक बच्ची की जीत नहीं, बल्कि पूरे समाज की जीत थी। सपना की कहानी हम सबको यह सिखाती है कि गरीबी, परंपरा और मजबूरी के नाम पर किसी भी बच्ची का बचपन छीनना अन्याय है। हमें समझना होगा कि पढ़ाई ही वह रास्ता है जो बच्चियों को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाता है।

(प्रियंका)

ई दिल्ली : सोचिए, आज जब इंसान चांद पर पहुंच चुका है और मंगल ग्रह पर बसने की तैयारी कर रहा है, तब भी हमारे समाज में कई बच्चियों का बचपन समय से पहले छीन लिया जाता है। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि बिहार के समस्तीपुर के एक छोटे से गांव की 13 साल की सपना (बदला हुआ नाम) की सच्ची हकीकत है।

सपना 7 वीं क्लास में पढ़ रही थी और चार बहनों में से एक थी। गरीबी से तंग आकर, उसके माता-पिता को लगा कि जितनी जल्दी बेटी की शादी कर देंगे, उतनी जल्दी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएंगे। उन्होंने अपनी बड़ी बेटी का भी बाल विवाह कर दिया था, और अब सपना की बारी थी।

एक दिन अचानक माता-पिता ने सपना से कहा, “लड़का देख लिया है। अब शादी की तैयारी करनी है।” सहमी हुई सपना ने हिम्मत जुटाकर कहा, “मुझे पढ़ाई करनी है विवाह नहीं।” लेकिन पिता ने उसकी बात अनसुनी कर डांटते हुए कहा, “पढ़ाई-लिखाई की जरूरत नहीं है।” यह सुनते ही सपना भीतर तक हिल गई, पर उसने हार न मानने का फैसला कर लिया।

अगले ही दिन, किस्मत ने जैसे उसके इरादों को सुन लिया। गांव में जवाहर ज्योति बाल विकास केन्द्र ने बाल विवाह के खिलाफ एक जागरूकता शिविर लगाया। उत्सुकता से वहां पहुंची सपना ने पहली बार सुना कि शादी की सही उम्र क्या होती है और शिक्षा क्यों जरूरी है। उसे एहसास हुआ कि वह अकेली नहीं है।

वह भीड़ के सामने खुलकर बोल नहीं पाई, लेकिन उसकी आंखें और हाव-भाव सब कुछ कह रहे थे। संगठन के कार्यकर्ताओं ने तुरंत समझ लिया कि इस मासूम बच्ची के साथ कुछ गड़बड़ है।

अगले ही दिन, प्रशासन, पंचायत और बाल विकास केन्द्र की संयुक्त टीम सामुदायिक बैठक का बहाना बनाकर सपना के घर पहुंची। टीम को देखते ही सपना खुशी से झूम उठी। थोड़ी हिम्मत जुटाकर उसने धीमी आवाज में कहा, “मैं पढ़ना चाहती हूं… कुछ बनना चाहती हूं, लेकिन पापा मेरी शादी करवा रहे हैं।”

जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) के सहयोगी संगठन जवाहर ज्योति बाल विकास केन्द्र से जुड़ी रानी कुमारी ने उस पल को याद करते हुए कहा कि सपना की मासूम आंखों में पढ़ाई की जो ललक और जिद थी, उससे उन्हें यकीन हो गया कि सही वक्त पर आवाज़ उठाई जाए तो एक नहीं, पूरे परिवार और समाज का भविष्य बदल सकता है।

टीम ने माता-पिता को समझाया कि सपना अभी बहुत छोटी है। उसकी शादी कराना न सिर्फ गलत है, बल्कि कानूनन अपराध भी है। शुरुआत में घरवाले सहमत नहीं हुए, लेकिन जब उन्हें बाल विवाह कराने पर जेल हो सकने की बात समझाई गई, तो वे डर गए। हालांकि डर ही एकमात्र कारण नहीं था; असली वजह उनकी बेटी के लिए छिपा हुआ प्यार भी था।

धीरे-धीरे उनका मन बदला और आखिरकार उन्होंने शपथ पत्र पर हस्ताक्षर कर कहा कि सपना की शादी अब तभी होगी जब वह पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी।

उस दिन पूरे गांव ने देखा कि कैसे एक नन्ही बच्ची की हिम्मत और समाज का सामूहिक प्रयास मिलकर इस कुप्रथा को खत्म कर सकता है। सपना की शादी रुक गई। उसका बचपन बच गया और उसके सपनों को नई उड़ान मिल गई।

आज सपना फिर से स्कूल जा रही है, आंखों में उम्मीद और आत्मविश्वास की चमक लिए। यह सिर्फ एक बच्ची की जीत नहीं, बल्कि पूरे समाज की जीत थी। सपना की कहानी हम सबको यह सिखाती है कि गरीबी, परंपरा और मजबूरी के नाम पर किसी भी बच्ची का बचपन छीनना अन्याय है। हमें समझना होगा कि पढ़ाई ही वह रास्ता है जो बच्चियों को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाता है।

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