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सम्पादकीय : विकास के दावे और पलायन की पीड़ा: युवाओं के सपनों का अधूरा बिहार

ByBinod Anand

Oct 30, 2025

बिहार जैसे कृषि-प्रधान राज्यों से पलायन की गंभीर समस्या को रोकने के लिए केवल सरकारी योजनाओं पर निर्भर रहना अपर्याप्त है। यह एक अनिवार्य शर्त है कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के ठोस अवसर सृजित किए जाएँ। इसके लिए राज्य को अपनी प्राथमिकताएं बदलनी होंगी: निजी निवेश, औद्योगिक गलियारों, तथा स्टार्टअप ईकोसिस्टम को बढ़ावा देना होगा। खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, बागवानी और कपड़ा उद्योगों की नीति को कागज़ों से निकालकर, ज़मीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू करना आवश्यक है, जो गाँवों में ही हज़ारों रोज़गार पैदा कर सकता है। इसके समानांतर, उच्च शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता और मापदंडों में सुधार करना पलायन की जड़ पर सीधा प्रहार होगा। केवल तब ही हम युवाओं के लिए राज्य में एक बेहतर भविष्य सुनिश्चित कर सकते हैं।

विनोद आनंद

बि हार में विधानसभा चुनावों की सरगर्मी एक बार फिर तेज़ है। पोस्टर, रैलियाँ, जनसभाएँ—हर तरफ़ वही पुराने नारों की गूंज है: “विकास”, “बदलाव”, “नया बिहार”। राजनीतिक दलों की भाषा में इन शब्दों का जादू चलता आ रहा है। लेकिन इन नारों के शोर में जब कोई सवाल उठाता है कि क्या वास्तव में बिहार के युवाओं के जीवन में कोई ठोस परिवर्तन हुआ है, तो जवाब में केवल चुप्पी या आंकड़ों की झिलमिलाहट मिलती है।

बिहार की युवा पीढ़ी, जो अपने राज्य के भविष्य की सबसे बड़ी ताक़त बन सकती थी, आज भी बड़े पैमाने पर पलायन की नियति झेल रही है।बिहार के लिए पलायन कोई नया अध्याय नहीं, बल्कि उसके सामाजिक इतिहास का हिस्सा बन गया है।

हर साल लाखों युवा अपने गाँव-शहर से निकलकर दिल्ली, मुंबई, पंजाब, गुजरात, राजस्थान या दक्षिण भारत के औद्योगिक नगरों की ओर जाते हैं। ट्रेनें, बसें और ट्रक उनके सपनों और विवशता का प्रतीक बन गई हैं।

त्योहारों पर जब वे घर लौटते हैं, तो उनके चेहरों पर अपने मिट्टी से जुड़ने की सुकून भरी मुस्कान होती है, लेकिन उसी के साथ यह दर्द भी छिपा होता है कि अगले हफ्ते फिर किसी फैक्ट्री की मशीनों के शोर में खो जाना है।

‘बिहारी’ कहकर व्यंग्य करने वाले समाज में अपनी अस्मिता को बचाए रखने की कोशिश इन युवाओं के जीवन का स्थायी संघर्ष बन चुकी है।यह सवाल अब केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि विकास नीति की असफलता का प्रमाण है।

बिहार की बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर है। ग्रामीण इलाकों में कृषि पर निर्भर जीवन तेजी से सिकुड़ रहा है, और शहरी क्षेत्रों में नौकरी के अवसर सीमित हैं। राज्य में पर्याप्त उद्योग न होने की वजह से शिक्षित और अकुशल—दोनों वर्गों के युवा रोजगार के लिए घर छोड़ने को मजबूर हैं।

पिछले दो दशकों में राज्य ने सड़कों, पुलों और बिजली के मोर्चे पर प्रगति की बात की, लेकिन यही विकास रोजगार और निवेश के अवसरों में नहीं बदल सका।वर्तमान चुनावों में एक बार फिर वही दृश्य दोहराया जा रहा है। राजनीतिक दल रोजगार के मुद्दे पर प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं—कोई हर परिवार में एक नौकरी देने का वादा करता है, तो कोई एक करोड़ रोजगार सृजन की घोषणा करता है।

यह सुनने में आश्वस्त करने वाला लगता है, लेकिन इन वादों के भीतर दीर्घकालिक दृष्टि की कमी साफ झलकती है। सरकारी नौकरी के नाम पर वादे करना आसान है, लेकिन यह किसी भी राज्य की अर्थव्यवस्था और युवाओं के भविष्य का स्थायी हल नहीं हो सकता। असली सवाल यह है कि क्या कोई भी दल बिहार के लिए एक ऐसी औद्योगिक नीति लेकर आया है जो स्थायी निवेश, कौशल विकास और उद्यमिता को साथ जोड़ सके?

पलायन रोकने के लिए रोजगार के स्थानीय अवसर पैदा करना अनिवार्य शर्त है। इसके लिए राज्य को केवल सरकारी योजनाओं के भरोसे नहीं रहना चाहिए। निजी निवेश, औद्योगिक गलियारे, कृषि-आधारित उद्योग और स्टार्टअप ईकोसिस्टम को प्राथमिकता बनाना होगा। बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य में अगर खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, बागवानी और कपड़ा उद्योग की नीति को स्थानीय स्तर पर लागू किया जाए, तो गाँवों में ही हज़ारों रोज़गार पैदा किए जा सकते हैं। लेकिन अब तक की नीतियाँ केवल कागज़ों में घोषणाओं तक सीमित रही हैं; उनके ज़मीन पर असर का प्रमाण नगण्य है।शिक्षा का हाल भी पलायन की जड़ से जुड़ा हुआ है। बिहार के युवा उच्च शिक्षा के लिए बड़े पैमाने पर बाहर जाते हैं क्योंकि राज्य में मापदंड के अनुरूप संस्थान नहीं हैं।

मेडिकल, इंजीनियरिंग और प्रबंधन संस्थानों की संख्या और गुणवत्ता दोनों सीमित हैं। अगर हर प्रमंडल में उच्च गुणवत्ता वाले विश्वविद्यालय और कौशल-केंद्रित संस्थान स्थापित किए जाएँ, तो युवाओं का न केवल पलायन रुकेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर शोध और नवाचार की संस्कृति भी विकसित होगी। यह भी आवश्यक है कि शिक्षा महज डिग्री प्राप्ति का साधन न रह जाए, बल्कि रोजगारोन्मुख कौशल पर आधारित हो।बिहार में उद्योग लगाने में सबसे बड़ी बाधाएँ—बिजली, सड़क और नौकरशाही की जटिलताएँ—अब भी बनी हुई हैं। राज्य के कई उद्योगपति और निवेशक मानते हैं कि ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के वास्तविक अर्थ यहाँ आज भी अधूरे हैं।

लालफीताशाही, राजनीतिक हस्तक्षेप और सुरक्षा से जुड़ी अनिश्चितता ने बाहरी पूँजी को दूर रखा है। यह स्थिति तब और विडंबनापूर्ण बन जाती है, जब राजनीतिक रैलियों में रोजगार और निवेश की बड़ी बातें की जाती हैं। किसी भी राज्य की औद्योगिक प्रगति का पहला कदम प्रशासनिक पारदर्शिता और नियंत्रण की स्थिरता होती है—जिसे बिहार अभी तक हासिल नहीं कर पाया है।वर्तमान सरकार तथा पूर्ववर्ती सरकारों ने युवाओं के लिए कौशल विकास योजनाएँ, शिक्षा ऋण और इंटर्नशिप जैसी पहल जरूर की हैं, लेकिन इनकी पहुँच सीमित है।

ज़रूरत ‘पहल’ से ज्यादा ‘परिणाम’ की है। राज्य को युवाओं के लिए केवल योजनाओं की घोषणा करनी नहीं, बल्कि उनका जमीनी क्रियान्वयन भी सुनिश्चित करना होगा। इसके अलावा, निजी क्षेत्र के साथ स्थायी साझेदारी बनाकर प्रशिक्षण से लेकर रोज़गार तक की श्रृंखला तैयार करनी होगी।बिहार के भविष्य की असली परीक्षा अब यह है कि क्या वह अपने आर्थिक ढांचे को आत्मनिर्भर बना पाएगा। जब तक यहाँ उद्योगों का विकेंद्रीकरण नहीं होगा, बिजली और कनेक्टिविटी ग्रामीण स्तर तक नहीं पहुँचेगी, और शिक्षा प्रणाली का कायाकल्प नहीं किया जाएगा—तब तक पलायन का प्रवाह रुकने वाला नहीं है।

सड़कों पर पोस्टरों से सजता ‘नया बिहार’ तभी साकार होगा, जब हर गाँव और कस्बे में युवाओं को अपने सपनों के लिए बाहर न जाना पड़े।राजनीतिक दृष्टि से यह भी उतना ही जरूरी है कि चुनाव अब केवल नारों की होड़ का मैदान न रह जाए। जनता को विकास की परिभाषा में सिर्फ सड़क और बिजली नहीं, बल्कि रोजगार और उद्यमिता को भी शामिल करना होगा। बिहार का युवा अब वादों से थक चुका है। वह आंकड़ों और घोषणाओं नहीं, बल्कि कार्य योजना मांगता है—ऐसी नीति जो बिहार को मज़दूरों का नहीं, मेधावी उद्यमियों का राज्य बनाए।यह समय है जब राजनीतिक पार्टियों को एहसास हो कि पलायन रोकना केवल भावनात्मक मुद्दा नहीं, बल्कि बिहार की अर्थव्यवस्था और अस्मिता का प्रश्न है। यह भी स्पष्ट है कि कोई भी सरकार अकेले यह लड़ाई नहीं जीत सकती। इसके लिए सरकार, निवेशक और समाज—तीनों को मिलकर एक साझा दृष्टि बनानी होगी।बिहार जब तक अपनी सबसे बड़ी पूँजी—युवा शक्ति—को वापस नहीं पा लेता, तब तक विकास की कोई भी कहानी अधूरी रहेगी।

सत्ता किसकी होगी, यह अगले कुछ हफ्तों में तय हो जाएगा; लेकिन असली चुनौती सत्ता में आने के बाद इस ‘युवा बिहार’ के वास्तविक पुनर्निर्माण की है। चुनावी भाषणों में विकास की बात करना आसान है, पर अब समय इस पीड़ा को नीतिगत प्राथमिकता में बदलने का है। ‘नए बिहार’ की सच्ची शुरुआत तभी होगी, जब उसके बेटे-बेटियाँ अपने ही गाँव-कस्बों में अपने सपनों का भविष्य गढ़ सकेंगे।

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