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रूस-भारत तेल व्यापार पर अमेरिकी प्रतिबंधों का साया: भारत के लिए चुनौतियाँ और आत्मनिर्भरता की राह

ByBinod Anand

Jul 13, 2025

अंत में यही कहना चाहूंगा कि ‘सैंक्शनिंग रशिया एक्ट ऑफ 2025’ भारत के लिए एक बड़ी चुनौती प्रस्तुत करता है, लेकिन यह हमें अपनी ऊर्जा रणनीति पर पुनर्विचार करने और आत्मनिर्भरता की दिशा में दृढ़ कदम उठाने का अवसर भी प्रदान करता है। वैश्विक स्तर पर एकजुट होकर अमेरिकी ‘दादागिरी’ का विरोध करना और एक अधिक संतुलित और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ना समय की मांग है। भारत को अपनी आर्थिक सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देते हुए आगे बढ़ना होगा, ताकि भविष्य में इस तरह की भू-राजनीतिक उठापटक का सामना अधिक मजबूती से किया जा सके।

विनोद आनंद

मेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ‘सैंक्शनिंग रशिया एक्ट ऑफ 2025’ (Sanctioning Russia Act of 2025) के समर्थन ने भारत और रूस के बीच गहरे होते ऊर्जा व्यापार पर गंभीर संकट के बादल ला दिए हैं। यह विधेयक उन देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान करता है जो रूस से तेल, गैस, यूरेनियम और अन्य ऊर्जा संसाधनों का आयात करते हैं। चूंकि भारत इस समय चीन के साथ रूस का सबसे बड़ा कच्चे तेल का खरीदार है, जिसने वित्त वर्ष 2024-25 में अपने कुल तेल आयात का लगभग 35-40 प्रतिशत रूस से खरीदा है, ऐसे में यह कदम भारत की ऊर्जा सुरक्षा, आयात बिल और चालू खाता घाटे पर गहरा असर डालेगा। यह केवल भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजारों में भी एक बड़ी हलचल पैदा कर सकता है।

बदलते भू-राजनीतिक समीकरण और भारत की ऊर्जा रणनीति

यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के चलते रूस ने भारत जैसे देशों को भारी छूट पर तेल बेचना शुरू किया। 2022 में, भारत अपने कुल तेल आयात का केवल 2 प्रतिशत रूस से खरीदता था, लेकिन अब यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 40 प्रतिशत तक पहुंच गया है। यह बदलाव भारत के लिए न केवल लागत कम करने का एक प्रभावी जरिया बना, बल्कि इसने देश की ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता भी सुनिश्चित की। भारतीय तेल मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने इस बात पर जोर दिया है कि रूसी तेल पर कभी भी वैश्विक प्रतिबंध नहीं लगे थे और भारत वैश्विक बाजार को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उनका तर्क है कि दुनिया भर के समझदार निर्णयकर्ता वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखलाओं की वास्तविकताओं को समझते हैं और भारत रियायती दरों पर तेल खरीदकर वैश्विक बाजारों की मदद कर रहा है।

डोनाल्ड ट्रम्प ने इस विधेयक को “ऑप्शनल” या वैकल्पिक बताते हुए कहा है कि इसका उपयोग उनके विवेक पर निर्भर करेगा, लेकिन उन्होंने इस पर “गंभीरता से विचार” करने के संकेत भी दिए हैं। यह अनिश्चितता भारत के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि यदि यह विधेयक लागू होता है, तो भारत के लिए रूसी कच्चे तेल का आयात अत्यधिक महंगा हो जाएगा, जिससे हमारी तेल रिफाइनरियां जो रूसी तेल को रिफाइन करके यूरोपीय देशों को सस्ते दामों पर उपलब्ध कराती थीं, वह प्रक्रिया भी बाधित हो जाएगी। इसका असर न केवल भारत और चीन पर पड़ेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार भी बुरी तरह प्रभावित होगा।

अमेरिकी ‘दादागिरी’ और वैश्विक विरोध की आवश्यकता

अमेरिका का यह कदम, जिसे कई लोग ‘दादागिरी’ की संज्ञा दे रहे हैं, वैश्विक स्तर पर व्यापक विरोध का हकदार है। किसी भी देश को अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए स्वतंत्र रूप से व्यापार करने का अधिकार है, विशेष रूप से ऐसे समय में जब वैश्विक ऊर्जा बाजार अस्थिरता का सामना कर रहा है। रूस वैश्विक तेल उत्पादन का लगभग 10% हिस्सा रखता है, और यदि इसकी आपूर्ति बाधित होती है, तो वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें 120-130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर दबाव पड़ेगा। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिका में सीनेटर लिंडसे ग्राहम से बातचीत कर भारत की ऊर्जा सुरक्षा संबंधी चिंताओं से उन्हें अवगत कराया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि भारत का रुख स्पष्ट है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि है और भारत वहां से तेल खरीदेगा जहां से यह सस्ता मिलेगा।

यह विधेयक, ‘सैंक्शनिंग रशिया एक्ट ऑफ 2025’, का प्राथमिक उद्देश्य रूस को यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए बातचीत की मेज पर लाना है। हालांकि, इसकी संभावित आर्थिक मार केवल रूस तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह उन सभी देशों को प्रभावित करेगी जो रूस से ऊर्जा खरीदते हैं। इस तरह के एकतरफा प्रतिबंधों का वैश्विक व्यापार और कूटनीति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, और यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अनावश्यक तनाव पैदा करता है। यह समय है जब वैश्विक समुदाय को एकजुट होकर अमेरिका को यह अहसास कराना चाहिए कि किसी भी अति का अंत होता है और इसके परिणाम कभी सुखद नहीं होते।

भारत के लिए आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम

इस भू-राजनीतिक चुनौती के आलोक में, भारत को अपनी आत्मनिर्भरता की नीति को और मजबूत करने की आवश्यकता है। यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए एक अनिवार्यता है। पेट्रोलियम पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने के लिए, भारत को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों जैसे **सौर ऊर्जा, ईंधन-सेल, प्रौद्योगिकियों* (जैसे हाइड्रोजन और इथेनॉल), और **इलेक्ट्रॉनिक वाहनों** पर अनुसंधान और विकास में अपने बजट को काफी बढ़ाना चाहिए। इन क्षेत्रों में निवेश न केवल हमारी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा करेगा और जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी मदद करेगा।

इसके अतिरिक्त, भारत को दुर्लभ पृथ्वी तत्व (Rare Earth Elements), यूरेनिय और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों के घरेलू उत्पादन और प्रसंस्करण पर विशेष ध्यान देना चाहिए, जो हमें विभिन्न उद्योगों में आत्मनिर्भर बनाते हैं। इन महत्वपूर्ण संसाधनों की आपूर्ति श्रृंखला में विविधता लाना और घरेलू क्षमताओं का विकास करना भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्यक है।

अमेरिकी डॉलर के विकल्प और बहुध्रुवीय विश्व की ओर

अमेरिकी प्रतिबंधों का एक और दूरगामी परिणाम डॉलर की वैश्विक प्रभुत्व पर प्रश्नचिह्न लगाना है। ऐसे में, दुनिया के सभी प्रभावित देशों को अमेरिकी डॉलर के विकल्प में एक अलग अंतरराष्ट्रीय मुद्रा का विकल्प ढूंढ लेना चाहिए। ब्रिक्स (BRICS) जैसे संगठन, जो ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका जैसे उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह है, को मजबूत करने और इसके सदस्य संख्या बढ़ाने की आवश्यकता है। यह संगठन एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, जहां व्यापार और वित्तीय लेनदेन डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता के बिना किए जा सकें। एक वैकल्पिक भुगतान प्रणाली और एक साझा मुद्रा की संभावना पर विचार करना उन देशों के लिए आवश्यक है जो अमेरिका के एकतरफा प्रतिबंधों के अधीन हैं। यह न केवल आर्थिक स्थिरता प्रदान करेगा, बल्कि विभिन्न देशों को अपनी संप्रभुता बनाए रखने में भी मदद करेगा।

अंत में यही कहना चाहूंगा कि ‘सैंक्शनिंग रशिया एक्ट ऑफ 2025’ भारत के लिए एक बड़ी चुनौती प्रस्तुत करता है, लेकिन यह हमें अपनी ऊर्जा रणनीति पर पुनर्विचार करने और आत्मनिर्भरता की दिशा में दृढ़ कदम उठाने का अवसर भी प्रदान करता है। वैश्विक स्तर पर एकजुट होकर अमेरिकी ‘दादागिरी’ का विरोध करना और एक अधिक संतुलित और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर बढ़ना समय की मांग है। भारत को अपनी आर्थिक सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देते हुए आगे बढ़ना होगा, ताकि भविष्य में इस तरह की भू-राजनीतिक उठापटक का सामना अधिक मजबूती से किया जा सके।

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