राजनीतिक वाद-विवाद के बीच यह तथ्य सामने आता है कि पुलों के गिरने की समस्या किसी एक शासनकाल तक सीमित नहीं रही। लालू यादव, कांग्रेस या फिर नीतीश कुमार—हर सरकार में पुल टूटने की घटनाएं होती रही हैं। लेकिन हाल के वर्षों (2024-25) में यह संख्या रिकॉर्ड स्तर तक पहुँच गई है, जिससे सवाल उठता है: क्या हाल में चल रहे अभियानों, बढ़े हुए बजट और नए इंजीनियरिंग मानदंडों के बावजूद, भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की समस्या और गहरी हो गई है?

विनोद आनंद
बि हार में हाल ही के वर्षों में पुलों के ढहने की घटनाओं ने न केवल राज्य की विकास नीति, बल्कि सरकारी जवाबदेही और सार्वजनिक धन के उपयोग पर भी बड़े सवाल उठाए हैं।
2024-25 में रिकॉर्ड स्तर पर पुल टूटे, जिससे आम जनता की सुरक्षा, यातायात व्यवस्था और आर्थिक गतिविधियों पर सीधा असर पड़ा। ये घटनाएं प्रशासनिक लापरवाही, गुणवत्ता नियंत्रण की विफलता और भ्रष्टाचार की गहराई को उजागर करती हैं।
घटनाक्रम और आँकड़े
पुल गिरने की वारदातें: ताजा रुझान
2024 में 2 मार्च को सुपौल जिले में कोसी नदी पर 1200 करोड़ रुपये की लागत से बन रहा बड़ा पुल गिर गया।
18 जून 2024: अररिया जिले में 12 करोड़ की लागत से बना नया पुल उद्घाटन से पहले ही ढह गया।
22 जून: सीवान में 40-45 साल पुराना गंडक नदी का पुल भी गिर गया।
27 जून एवं 30 जून: किशनगंज में दो पुल अलग-अलग तारीखों में टूटे।
3 जुलाई 2024: सीवान और छपरा जिलों में एक ही दिन में पांच पुल गिरने का रिकॉर्ड बना।
15 दिनों में कुल 12 पुल गिर गए; बहुत सी ऐसी घटनाएं भी हैं जिनकी पूरी गिनती ट्रैक नहीं हो सकी।
प्रमुख प्रभावित जिले

तारीख – जिला पुल की स्थिति/कारण – लागत (करोड़ रु.)
2 मार्च 2024 – सुपौल निर्माणाधीन, कोसी नदी – 1200
18 जून अररिया उद्घाटन से पहले ढहा
22 जून सीवान 40-45 वर्ष पुराना पुल —
23 जून पूर्वी चंपारण निर्माणाधीन पुल गिरा 1.5
27-30 जून किशनगंज लगातार दो पुल गिरे —
3 जुलाई सीवान/छपरा एक दिन में 5 पुल/पुलिया —
विकास और जवाबदेही पर सवाल विपक्ष की तीखी आवाज़
आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव ने कटाक्ष करते हुए कहा कि सरकार इन पुल दुर्घटनाओं का दोष भी मुगलों, अंग्रेजों या विपक्षियों के सिर मढ़ेगी।
तेजस्वी यादव ने इसे “मंगलकारी भ्रष्टाचार” करार दिया और सीधे तौर पर सरकार, खासकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जिम्मेदार ठहराया है।
सरकार का पक्ष और सरकारी प्रतिक्रिया
सरकार का दावा है कि कुछ पुल भारी बारिश और अपवाह की बदलती दिशा के कारण गिरे।
उपमुख्यमंत्री समेत अन्य नेताओं ने पुराने और निर्माणाधीन पुलों की चौकसी और निगरानी का आश्वासन दिया है।
सुप्रीम कोर्ट में भी अब इन घटनाओं की निष्पक्ष जांच की मांग की गई है।
कारण क्या हैं?
खराब निर्माण सामग्री और गुणवत्ता नियंत्रण में भारी कमी: कई पुल, उद्घाटन से पहले ही ढह गए। निर्माणाधीन पुलों में घटिया सामग्री का उपयोग आम शिकायत बन चुकी है।
इंजीनियरिंग और रखरखाव की खामियां: पुराने पुलों का समय पर निरीक्षण और रखरखाव नहीं होना भी बड़ी समस्या है।
भ्रष्टाचार: राज्य के लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण, पंचायती राज, राजस्व, शिक्षा और स्वास्थ्य विभागों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। परियोजनाओं में फंड के दुरुपयोग और रिश्वतखोरी की दर्जनों शिकायतें सामने आ चुकी हैं।
जलवायु परिवर्तन और बाढ़: लगातार बारिश और नदियों का बदलता रुख भी, खासकर कमज़ोर नींव वाले पुराने या निर्माणाधीन पुलों के लिए, अतिरिक्त जोखिम का कारण है।
शासनकाल के अनुसार तुलनात्मक चित्र
राजनीतिक वाद-विवाद के बीच यह तथ्य सामने आता है कि पुलों के गिरने की समस्या किसी एक शासनकाल तक सीमित नहीं रही। लालू यादव, कांग्रेस या फिर नीतीश कुमार—हर सरकार में पुल टूटने की घटनाएं होती रही हैं। लेकिन हाल के वर्षों (2024-25) में यह संख्या रिकॉर्ड स्तर तक पहुँच गई है, जिससे सवाल उठता है: क्या हाल में चल रहे अभियानों, बढ़े हुए बजट और नए इंजीनियरिंग मानदंडों के बावजूद, भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की समस्या और गहरी हो गई है?
प्रशासनिक सुधार और राहत उपाय हालिया सरकारी पहलें
पुल हेल्थ कार्ड और संधारण नीति 2025: बिहार भारत का पहला राज्य बन गया है जिसने पुलों की सुरक्षा और संधारण हेतु नीति लागू की।
बीते 18 वर्ष में 3,968 पुलों का निर्माण; जिनमें 532 बड़े ब्रिज/ओवरब्रिज।

मेंटेनेंस पॉलिसी: ‘ब्रिज हेल्थ कार्ड’ के तहत हर पुल की नियमित मॉनिटरिंग की जाएगी। इससे लाइफ बढ़ेगी और मरम्मत खर्च घटेगा।
मुख्यमंत्री ने विभागों को मेंटेनेंस पॉलिसी लाने का निर्देश भी दिया है, जिससे निर्माणाधीन व पुराने पुलों की समय-समय पर जांच हो।
राजनीतिक बयानबाजी और दोषारोपण
जेडीयू, आरजेडी और भाजपा—हर दल ने पुल गिरने को चुनावी मुद्दा बनाया है।
सरकार ने कभी “प्राकृतिक आपदा” तो कभी “विपक्ष की लापरवाही” पर ठीकरा फोड़ा। मगर असली जिम्मेदारी तय करना अब भी शेष है।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका और मीडिया की गंभीरता से सरकार पर दबाव बढ़ा है।
जनता पर असर
आवागमन ठप: पुल टूटने से कई कस्बों, गांवों का संपर्क कट जाता है, जिससे चिकित्सा, शिक्षा और बाजार जैसी बुनियादी सुविधाएं बाधित होती हैं।
आर्थिक नुकसान: निर्माण में अरबों खर्च, हर हादसे में दोबारा निवेश की जरूरत पड़ती है; जनता करदाताओं के पैसे की बर्बादी महसूस करती है।आ
आगे की राह
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप बंद कर दोषियों पर कड़ी कार्यवाही हो।
पुल निर्माण और संधारण में गुणवत्ता, पारदर्शिता और सार्वजनिक निगरानी अनिवार्य की जाए।
सभी पुलों की रेगुलर ऑडिटिंग और ‘हेल्थ कार्ड’ व्यवस्था को व्यापक स्तर पर लागू किया जाए।
भ्रष्टाचार रोकने के लिए कठोर कानून और दंड का प्रावधान हो, साथ ही ज़िम्मेदार पदाधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित हो।
सारांश:
बिहार में पुलों के बार-बार टूटने की समस्या ने विकास, जवाबदेही और प्रशासनिक मजबूती पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। जब तक प्रशासनिक पारदर्शिता और जिम्मेदारी सुनश्चित नहीं की जाती, तब तक जनता के पैसों का ऐसा दुरुपयोग रुकना मुश्किल है। “कहीं विकास की दौड़ में भ्रष्टाचार विजेता न बन जाए”—यह सोचने और कार्रवाई करने का समय है

