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कौन थे बिग्रेडियर भावनी सिंह जिन्होंने लाहौर पर कब्जा करने की कर ली थी तैयारी,मिला उन्हें महावीर चक्र सम्मान

ByBinod Anand

Apr 17, 2025

ये छाछरो युद्ध के नायक और भारत-पाक युद्ध के हीरो महावीर चक्र विजेता ब्रिगेडियर भवानी सिंह की वीरगाथा है जो आज भी जयपुर की गलियों में सुनाई जाती है.

सा ल 1971 में हुये भारत-पाकिस्तान की जंग में कई बीर सैनिक ने अपने साहस और बलिदान से भारतीय इतिहास में अपना अमिट छाप छोड़ गए जिन्हें आने वाले पीढ़ी कभी भूल नही सकते।आज वैसे हीं एक भारतीय सेना के एक जवांज नायक का यहां चर्चा करते हैं जिसका नाम स्वर्ण अक्षर में भारतीय इतिहास में दर्ज है.

ये छाछरो युद्ध के नायक और भारत-पाक युद्ध के हीरो महावीर चक्र विजेता ब्रिगेडियर भवानी सिंह की वीरगाथा है जो आज भी जयपुर की गलियों में सुनाई जाती है. भारतीय सेना के वीर योद्धा और जयपुर राजघराने के अंतिम महाराजा ब्रिगेडियर भवानी सिंह ना सिर्फ राजस्थान, बल्कि पूरे देश के लिए गौरव का प्रतीक हैं.

उन्होंने साल 1971 के भारत-पाक युद्ध में साहसिक प्रदर्शन किया था।जिस से आज भी सेना प्रेरणा के रूप में लेते हैं।

इस युद्ध के दौरान ब्रिगेडियर भवानी सिंह, तत्कालीन 10 पैराशूट ब्रिगेड के कमांडर के रूप में पश्चिमी मोर्चे पर तैनात थे. पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र में छाछरो कस्बे को जीतने के लिए उन्होंने गहरी रणनीति के साथ एक तेज और साहसी सैन्य अभियान चलाया. उनके नेतृत्व में भारतीय सेना की टुकड़ी ने सीमित समय और कठिन परिस्थितियों में दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया. इस विजय ने भारत की सामरिक स्थिति को मजबूत करने के साथ-साथ सैनिकों के मनोबल को भी बढ़ाया.

उनके हौसले थे बुलंद,लाहौर में कर ली थी तिरंगा लहराने की थी तैयारी : 

भारत और पाकिस्तान के बीच जंग की तैयारी लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह ने तत्कालीन सेना प्रमुख मानेकशाह के इशारे पर 5 महीने पहले ही शुरू कर दी थी. इस दौरान आर्मी के पैरा ट्रूपर सैनिकों को आसमान से रेगिस्तान में कूदने का प्रशिक्षण दिया गया, ताकि वे अंधेरे में पाकिस्तान के इलाकों पर कब्जा कर लें.

इस दौरान भवानी सिंह पैरारेजीमेंट के शीर्ष अधिकारी थे और इस प्रशिक्षण का उन्होंने ही नेतृत्व किया था.
छाताधारी सैनिकों की अगुवाई कर ‘डेजर्ट ऑपरेशन’ के शुरू होने के बाद, भवानी सिंह के नेतृत्व में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के छाछरो नाम के शहर पर कब्जा कर लिया था. पांच दिनों की लड़ाई में भारतीय सेना के आगे दुश्मन मुल्क के पैटन टैंक भी नहीं टिके. भारतीय सेना ने इस्लामकोट, नगर पारकर और वीरावाह तक तिरंगा लहरा दिया. लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह ने पाकिस्तान के लुनियो में भी तिरंगा फहरा दिया, तभी रुकने का आदेश आ गया, वरना उनका लक्ष्य लाहौर पर कब्जा करना था.

उनके इस उपलब्धि पर स्वागत के लिए उमड़ पड़ा पूरा जयपुर :

 लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह पाकिस्तान को जंग में शिकस्त देकर जब जयपुर लौटे, तो यहां जन सैलाब ने उनका स्वागत किया. इतिहासकार जितेंद्र सिंह शेखावत बताते हैं कि उस दौरान सांगानेर एयरपोर्ट से महाराजा भवानी सिंह को अपनी ईष्ट देवी शिला माता के दर्शन के लिए आमेर जाना था, जब खुली जीप में सवार होकर वे निकले, तो एयरपोर्ट से आमेर की दूरी को तय करने में उन्हें पूरा दिन लग गया. जयपुर के जौहरी बाजार में इस दौरान भीड़ का ऐतिहासिक नजारा था.

कौन थे भवानी सिंह ?

ब्रिगेडियर भवानी सिंह ना सिर्फ युद्ध के मैदान के ही नायक नहीं थे, बल्कि जयपुर राजपरिवार के अंतिम आधिकारिक महाराजा भी थे. 24 जून 1970 को उन्होंने अपने पिता महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय के निधन के बाद गद्दी संभाली. 28 दिसंबर 1971 को संविधान में किए गए 26वें संशोधन के जरिए राजा-महाराजाओं के अधिकार खत्म कर दिए गए और उनकी पदवी सांकेतिक रह गए, लेकिन उनका रुतबा खत्म नहीं हुआ.

शैंपेन के बुलबुले और नाम पड़ा बबल्स : 

भवानी सिंह का जन्म 22 अक्तूबर 1931 को हुआ था. उनके पिता जयपुर के महाराजा मानसिंह द्वितीय और माता का नाम महारानी मरुधर कंवर था. भवानी सिंह का जन्म जयपुर राज परिवार के लिए किसी सौगात से कम नहीं था, क्योंकि यहां कई पीढ़ियों के बाद बेटे का जन्म हुआ था, वरना इसके पहले पुत्र गोद लिए गए थे. बताया जाता है कि पुत्र जन्म के जश्न के दौरान शैंपेन की इतनी बोतलें खुलीं कि चारों ओर बुलबुले (बबल्स) ही दिख रहे थे. इसलिए पिता मान सिंह ने उनका उपनाम बबल्स रख दिया था.

जाने कैसे मिली ब्रिगेडियर की उपाधि : 

साल 1951 में तीसरी कैवेलरी रेजिमेंट में कमीशन पाने वाले सेकेंड लेफ्टिनेंट भवानी सिंह ने साल 1974 में बटालियन के कमांडर पद लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी. श्रीलंका में ऑपरेशन पवन के तहत भारतीय सेना की कार्रवाई के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें वहां अपनी यूनिट का मनोबल बढ़ाने के लिए भेजा था. इसमें सफलता मिलने पर उनको साल 1991 में ब्रिगेडियर की मानक पदवी से सम्मानित किया गया।

राजनीति के खट्टे-मीठे अनुभव : 

सेना के अफसर के रूप में भवानी सिंह को 1971 के युद्ध में बहादुरी दिखाने पर महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था, लेकिन 4 साल बाद ही जेल में डाल दिया गया. 1975 में आपातकाल के दौरान उन्हें अपनी सौतेली मां महारानी गायत्री देवी के साथ तिहाड़ जेल में भी रखा गया था. जिसका जिक्र द हाउस ऑफ जयपुर नाम की किताब में है. जिस पार्टी ने उन्हें जेल में डाला, उसी ने 15 साल बाद टिकट देकर चुनाव में भी उतार दिया. ब्रिगेडियर सवाई भवानी सिंह राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए और राजीव गांधी के कहने पर साल 1989 का लोकसभा चुनाव भी लड़ा, लेकिन भाजपा नेता गिरधारी लाल भार्गव से मात खा गए. फिर महाराजा ने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली.

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