दानापुर डिवीजन अंतर्गत पूर्व मध्य रेलवे जोन के बख्तियारपुर रेलवे स्टेशन पटना से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर है। पूर्व में इस स्टेशन का नाम नालंदा रेलवे स्टेशन था, परंतु पूर्व प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को यह नाम पसंद नहीं आया और 1953 में उन्होंने “नालंदा रेलवे स्टेशन” का नाम बदलकर मोहम्मद बिन बख्तियार खिलजी के नाम पर “बख्तियारपुर जंक्शन” कर दिया। उस खिलजी के नाम क़ो महिमा मंडित करने के पीछे नेहरू जी का मकसद क्या था यह तो बहस का विषय है,लेकिन बख्तियार खिलजी ने जिस तरह नालंदा विश्व विद्यालय क़ो जलाकर सैकड़ो विद्वानों का कत्ले आम किया इतिहास उसे कभी नहीं भूलेगा, पढ़िए पत्रकार एवं साहित्यकार जयप्रकाश मिश्र का यह लेख

जयप्रकाश मिश्र
(पत्रकार, साहित्यकार)
ट्रे न में यदि खिड़की वाली सीट मिल जाए तो जिन्हें नींद नहीं आने की बीमारी है, उन्हें भी सुकून भरी नींद आ जाएगी। ट्रेन के विपरीत गोल-गोल घूमती दुनिया को देखते-देखते कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला। गर्म चाय.. गर्मागर्म कॉफी.. ताजा मूंगफली के शोर से नींद टूटी तो सामने स्टेशन नेम बोर्ड पर बख्तियारपुर जंक्शन पढ़ते ही वर्ष 2005-06 की धुंधली-सी तस्वीर कौंध गई।
2005 में लिए गए एक प्रस्ताव को बिहार सरकार ने 2006 में रेल मंत्रालय को भेजा था, जिसमें बख्तियारपुर रेलवे स्टेशन का नाम शीलभद्र याजी नगर करने की मांग की गई थी। उसके बाद क्या हुआ, कुछ पता नहीं चला।
धीरे-धीरे लोग इस प्रसंग को भूल गए। शीलभद्र याजी स्वतंत्रता सेनानी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सहयोगी थे।
दानापुर डिवीजन के अधीन पूर्व मध्य रेलवे जोन अंतर्गत बख्तियारपुर रेलवे स्टेशन हावड़ा-पटना-पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन मुख्य लाइन पर स्थित है, जो पटना से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर है। पूर्व में इस स्टेशन का नाम नालंदा रेलवे स्टेशन था, परंतु प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को यह नाम पसंद नहीं आया और 1953 में उन्होंने “नालंदा रेलवे स्टेशन” का नाम बदलकर मोहम्मद बिन बख्तियार खिलजी के नाम पर “बख्तियारपुर जंक्शन” कर दिया।

हद तो यह कि यह सब आजाद भारत में हुआ। खिलजी इतिहास में एक क्रूर और बर्बर कृत्य के रूप में देखा जाता है, जिसने शिक्षा और संस्कृति के महत्वपूर्ण केंद्रों को नष्ट कर दिया था। इसके विरोध में उसी वर्ष (1953 में) फिल्म डिवीज़न ऑफ़ इंडिया ने बिहार और नालंदा विश्वविद्यालय पर केंद्रित एक दस्तावेजी फिल्म “लैंड ऑफ इनलाइटनमेंट” (प्रबोधन की भूमि या ज्ञान की भूमि) बनाई थी, जिसमें नालंदा रेलवे स्टेशन का पुख्ता सबूत दिखाया गया था। यह सवाल आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना तब रहा होगा कि आखिर नेहरू जी ने ऐसा क्यों किया?

जिसके नाम पर बख्तियारपुर स्टेशन नाम रखा गया, संभव है बहुतों को उस क्रूर तुर्क शासक मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी का इतिहास ज्ञात भी नहीं हो। अफगानिस्तान का रहने वाला खिलजी कुतुबुद्दीन ऐबक का सेनापति के साथ ही रिश्तेदार भी था। वह मोहम्मद गौरी का भी रिश्तेदार था। आगे चलकर अलाउद्दीन खिलजी भी उसके रिश्तेदारों की सूची में शामिल हो गए ।
13वीं शताब्दी की शुरुआत में बंगाल के तुर्क शासक खिलजी ने विश्व प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय को खाक में मिलाकर हजारों बौद्ध, जैन और हिंदू विद्वानों का कत्ल करवा दिया था। उनके कुकृत्य से नालंदा की अनमोल पुस्तकें, पांडुलिपियां, अभिलेख आदि जलकर खाक हो गए थे।
दरअसल, खिलजी असम के रास्ते तिब्बत जाना चाहता था। तिब्बत उस समय चीन, मंगोलिया, भारत, अरब एवं सुदूर पूर्व के देशों के बीच व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र था, जिस पर खिलजी कब्जा जमाना चाहता था। लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए असम के राजा पृथु को लांघना अनिवार्य था, जो उसका रास्ता रोके खड़े थे।
1203 में बंगाल पर विजय प्राप्त करने तथा नालंदा और विक्रमशिला को तहस-नहस करने के बाद इतिहास में अमर होने के लिए खिलजी ने अपने नाम पर बिहार में बख्तियारपुर नामक शहर की स्थापना की। यहीं तक खिलजी रुक जाता तो उसकी उतनी अपमानजनक एवं भयानक मौत नहीं होती।

बिहार-बंगाल जीतने के बाद उन्मादी खिलजी सन 1206 ईस्वी में असम जीतने पहुंच गया। अभी उसके कदम कामरूप में पड़े ही थे कि एक जोशीली आवाज गूंजी,
“बख्तियार खिलजी, तू ज्ञान के मंदिर नालंदा को जलाकर कामरूप (असम) की धरती पर आया है… अगर तू और तेरा एक भी सिपाही ब्रह्मपुत्र को पार कर सका तो मां चंडी (कामातेश्वरी) की सौगंध मैं जीते-जी अपनी समाधि ले लूंगा…”
यह चेतावनी थी राजा पृथु अथवा राजा बरथू की। राजा पृथु ने सौगंध खाई कि किसी भी सूरत में खिलजी को ब्रह्मपुत्र नदी पार कर तिब्बत की ओर नहीं जाने देंगे।
27 मार्च 1206 को असम की धरती (आधुनिक गुवाहाटी के पास) पर एक ऐसी लड़ाई लड़ी गई जो मानव अस्मिता के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया। एक ऐसी लड़ाई, जिसमें लड़ने तो आई थी 12000 फौज, परंतु जिंदा बची सिर्फ एक सौ। ऐसी मिसाल दुनिया भर के इतिहास में शायद ही देखने को मिले। इसका जिक्र गुवाहाटी के पास एक शिलालेख में अंकित है।
राजा पृथु एवं उनके आदिवासी योद्धाओं ने जहर बुझे तीरों, खुरकी, बरछी, छोटी लेकिन घातक तलवारों से खिलजी की सेना का पूरी तरह कत्लेआम कर दिया। इससे घबराकर खिलजी अपने सैनिकों के साथ जंगल और पहाड़ों का फायदा उठाकर भागने लगा, परंतु असम की धरती में पले-बढ़े जन्मजात योद्धाओं से बचकर भाग नहीं सका। भगोड़ों को अपने पतले और जहरीले तीरों से बींध डाला।
खिलजी अपने बचे हुए एक सौ सैनिकों के साथ जमीन पर घुटनों के बल बैठकर जीवनदान की भीख मांगने लगा। राजा पृथु ने उनके बचे हुए सभी सौ सैनिकों को बंदी बना लिया और खिलजी को अकेले जिंदा छोड़ दिया।
खिलजी को घोड़े पर लादकर कहा, “तू वापस अफगानिस्तान लौट जा और रास्ते में जो भी मिले उसे कहना, तूने नालंदा को जलाया था, फिर तुझे राजा पृथु मिल गया… बस इतना ही कहना लोगों से….।”
खिलजी रास्ते भर इतना बेइज्जत हुआ कि जब वह वापस अपने ठिकाने पहुंचा तो उसकी दास्तां सुनकर उसके ही भतीजे अली-मर्दान खिलजी ने चाचा का सिर कलम कर दिया और खुद को बंगाल का शासक घोषित कर दिया। अब आप ही तय कीजिए कि इतना क्रूर शासक इस सम्मान का हकदार है?
इस कहानी का पुनर्पाठ इसलिए जरूरी लगा, क्योंकि एक तरफ राजा पृथु जैसे देश भक्तों के नाम के शिलालेखों को भी ढूंढना पड़ता है और दूसरी तरफ B’day जैसे क्रूर शासकों को चंदन बनाकर ललाट पर लगा दिया जाता है।
(जय प्रकाश मिश्र के फेसबुक वॉल से )
