समकालीन साहित्य के आकाश में प्रतीक्षा गाँगुली नाथ एक ऐसी प्रखर किरण बनकर उभरी हैं, जिन्होंने बैंकिंग क्षेत्र के कड़े अनुशासन और पारिवारिक उत्तरदायित्वों के बीच शब्दों की साधना को एक जीवंत आंदोलन का रूप दिया है। मूलतः बिहार की मिट्टी से जुड़ी और वर्तमान में कोलकाता को अपनी कर्मभूमि बनाने वाली प्रतीक्षा जी बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। वे न केवल दर्जनों कालजयी कृतियों की रचनाकार हैं, बल्कि ‘शिवोहम प्रकाशन’ के माध्यम से नवोदित प्रतिभाओं के सपनों को पुस्तकाकार देने वाली एक सशक्त संबल भी हैं। तकनीक, संगीत और साहित्य के अनूठे संगम से सजा उनका व्यक्तित्व आज की युवा पीढ़ी के लिए संकल्प और सकारात्मकता का अनुपम उदाहरण है।
आ ज का युग संक्रमण काल से गुजर रहा है। अति-भौतिकवाद की अंधी दौड़, सुख-सुविधाओं की अंतहीन चाहत और ‘अर्थ’ (पैसा) को ही परम पुरुषार्थ मान लेने की होड़ ने मनुष्य को मशीन बना दिया है। संवेदनाएं सूख रही हैं और सृजन के अंकुर कंक्रीट के जंगलों में दम तोड़ रहे हैं। ऐसे समय में जब युवा पीढ़ी केवल ‘पैकेज’ और ‘प्रोफाइल’ के पीछे भाग रही है, तब साहित्य के आकाश में प्रतीक्षा गाँगुली नाथ जैसी शख्सियत का उदय एक ठंडी फुहार की तरह है। वे केवल एक लेखिका या प्रकाशिका नहीं हैं, बल्कि वे उस रचनात्मक आंदोलन का प्रतीक बन गई हैं, जो मरती हुई संवेदनाओं को पुनर्जीवित करने का संकल्प लिए हुए है।
बैंकिंग की व्यस्तता और साहित्य का अनुराग
प्रतीक्षा जी के व्यक्तित्व का सबसे विस्मयकारी पक्ष उनका समय प्रबंधन और समर्पण है। वर्तमान में बैंकिंग सेक्टर जैसे चुनौतीपूर्ण और तनावपूर्ण क्षेत्र में कार्यरत होने के बावजूद, साहित्य के प्रति उनकी ललक रत्ती भर भी कम नहीं हुई है। अक्सर लोग करियर की ऊंचाइयों पर पहुंचकर अपनी कलात्मक रुचियों को तिलांजलि दे देते हैं, लेकिन प्रतीक्षा जी ने बैंकिंग के अनुशासन, कार्यकुशलता और जिम्मेदारी के गुणों को अपने लेखन और प्रकाशन में समाहित कर लिया। उनके लिए बैंकिंग एक पेशा है, तो साहित्य उनकी आत्मा की पुकार।
शिवोहम प्रकाशन: नवोदित प्रतिभाओं का संबल
साहित्यिक जगत में अक्सर नए लेखकों को दोयम दर्जे का समझा जाता है। स्थापित प्रकाशन संस्थान नवोदित रचनाकारों के लिए अपने द्वार बंद रखते हैं। इसी बाधा को दूर करने के लिए प्रतीक्षा गाँगुली नाथ ने ‘शिवोहम प्रकाशन‘ की नींव रखी। यह महज एक व्यापारिक संस्थान नहीं, बल्कि एक ‘मंच’ है—उन सपनों के लिए जो कागजों पर तो उतर आए थे, लेकिन जिल्द (Binding) की तलाश में थे।

हाल ही में उनसे हुई दूरभाष चर्चा के दौरान उनकी दृष्टि की स्पष्टता दिखाई दी। एक साझा काव्य संकलन के लिए रचनाएं आमंत्रित करते समय उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था कायम करना है जहाँ एक आम रचनाकार भी वाजिब खर्च पर अपनी कृति को पुस्तकाकार दे सके। वे चाहती हैं कि आर्थिक तंगी या अनुभव की कमी किसी की मेधा के आड़े न आए।
बहुमुखी प्रतिभा का धनी व्यक्तित्व
प्रतीक्षा जी का व्यक्तित्व बहुआयामी है। उनकी प्रतिभा केवल कलम तक सीमित नहीं है:
लेखन और प्रकाशन: उनकी दर्जनों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जो अमेजन और किंडल जैसे वैश्विक मंचों पर पाठकों के लिए उपलब्ध हैं।
तकनीकी दक्षता: कंप्यूटर और ग्राफिक डिजाइनिंग में उनकी विशेष रुचि ने ‘शिवोहम प्रकाशन’ को एक आधुनिक पहचान दी है। वे स्वयं तकनीकी बारीकियों को समझती हैं, जिससे उनके प्रकाशन की गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय मानकों को छूती है।
कलात्मक अभिरुचि: गायन में उनकी रुचि उनके भीतर की कोमलता और लयबद्धता को दर्शाती है। साहित्य, तकनीक और कला का यह त्रिवेणी संगम उन्हें समकालीन रचनाकारों से अलग खड़ा करता है।
बिहार की माटी से कोलकाता की संस्कृति तक
मूल रूप से बिहार की माटी से जुड़ी प्रतीक्षा के भीतर वह जुझारूपन और जुड़ाव स्पष्ट दिखता है जो इस प्रदेश की विशेषता है। वर्तमान में कोलकाता (साहित्य और कला की नगरी) में निवास करते हुए उन्होंने पारिवारिक जिम्मेदारियों और व्यावसायिक प्रतिबद्धताओं के बीच जो संतुलन बनाया है, वह अनुकरणीय है। एक गृहणी, एक बैंकर और एक साहित्यकार—इन तीनों भूमिकाओं को वे पूरी निष्ठा के साथ जी रही हैं।
एक आकस्मिक शुरुआत, एक स्थायी पहचान
जीवन की विडंबना देखिए, कई बार हम जिन रास्तों पर चलने की योजना नहीं बनाते, वही रास्ते हमारी मंजिल बन जाते हैं। प्रतीक्षा जी के लिए भी साहित्य और प्रकाशन की शुरुआत शायद एक संयोग रही हो, लेकिन आज यही क्षेत्र उनकी पहचान का आधार है। उन्होंने साबित कर दिया है कि यदि संकल्प दृढ़ हो, तो व्यक्ति शून्य से शिखर तक का सफर तय कर सकता है।
आने वाली पीढ़ी की प्रेरणा
प्रतीक्षा गाँगुली नाथ आज अनेक उभरते हुए लेखकों के लिए विश्वास का दूसरा नाम बन चुकी हैं। उन्होंने ‘शिवोहम प्रकाशन’ के माध्यम से न केवल पुस्तकें छापी हैं, बल्कि लेखकों के आत्मविश्वास को भी नया जीवन दिया है। उनकी सकारात्मक सोच और मार्गदर्शन ने एक ऐसे रचनात्मक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) का निर्माण किया है, जहाँ हर कलमकार खुद को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करता है।
साहित्य के प्रति उनका यह निस्वार्थ अनुराग और सृजनात्मक आंदोलन आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मशाल का काम करेगा। वे उन सभी के लिए उत्तर हैं जो कहते हैं कि ‘वक्त नहीं मिलता’।

