अनंत सिंह का दो दशक लंबा सियासी सफर रहा है, लेकिन उनका आपराधिक इतिहास उससे कहीं ज़्यादा लंबा और काला है। वह अपनी बेखौफ और दबंग छवि के लिए प्रसिद्ध रहे हैं, और उनके आतंक का आलम यह रहा है कि उन्हें ‘छोटे सरकार’ कहा जाता है। दुलारचंद की हालिया हत्या ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि मोकामा में बाहुबल की सियासत की जड़ें कितनी गहरी हैं।

मो कामा की धरती पर एक बार फिर बारूद की गंध घुली है। राजद नेता दुलारचंद की हत्या के मामले में पूर्व विधायक अनंत सिंह की गिरफ्तारी ने बिहार की राजनीति के सबसे खूनी और बाहुबली अध्याय को फिर खोल दिया है। यह नाम, जिसे इलाके में लोग ‘छोटे सरकार’ कहते हैं, महज एक नेता का नहीं, बल्कि तीन दशकों से चल रही खूनी अदावत, बेखौफ सत्ता और आतंक की एक महागाथा का प्रतीक है। अगर आप अनंत सिंह की कहानी जानना चाहते हैं, तो आपको अस्सी के दशक के उस अँधेरे युग में चलना होगा, जब उनके कुनबे का आतंक पूरे बिहार के दियारा क्षेत्रों पर छाया हुआ था।
कहते हैं, अपराध की दुनिया में अनंत सिंह की एंट्री एक खूनी बदले की कहानी से हुई थी। उनके बड़े भाई, और पटना के अपराध जगत में तूती बोलने वाले पूर्व मंत्री दिलीप सिंह की सत्ता जहां पटना तक फैली थी, वहीं बाढ़ और मोकामा पर छोटे भाई अनंत सिंह की आपराधिक सत्ता कायम हो चुकी थी। लेकिन इस वर्चस्व की नींव एक पुरानी अदावत ने रखी। गांव के ही मुन्नी लाल सिंह से छिड़ी उनकी खूनी जंग ने बाढ़ की जमीन को खून से सींच दिया। इस बदले की आग में अनंत सिंह ने पहले मुन्नी लाल सिंह के कई स्वजनों को मौत के घाट उतारा, फिर मुन्नी लाल सिंह ने उनके बड़े भाई विरंची सिंह की हत्या कर दी। इस हत्याकांड ने अनंत सिंह के भीतर की सारी मर्यादा तोड़ दी और वह क्रूरता के नए शिखर पर पहुँच गए। जब बेगूसराय के पास मुन्नी लाल सिंह की हत्या हुई, तो अनंत सिंह कुनबे का खौफ इस कदर गहरा गया कि उनके खिलाफ जुबान खोलने की हिम्मत किसी में नहीं बची। आवाज निकालने वाले की जुबान हमेशा के लिए खामोश कर दी जाती थी।

दिलीप सिंह
यह दौर केवल मुन्नी लाल सिंह तक सीमित नहीं रहा। मोकामा में उनकी अदावत महेश सिंह से ठन गई, और उनकी आपराधिक सत्ता की गूंज पूरे बिहार में फैल चुकी थी। महेश सिंह को रास्ते से हटाने के लिए उन्होंने मोकामा के एक और कुख्यात, रंगरुट नरेश सिंह से हाथ मिलाया और 1985 में नगर के जेपी चौक पर बम मारकर महेश सिंह का काम तमाम कर दिया गया।
राजनीति और अपराध की यह गठजोड़ तब और मजबूत हुआ जब उनके भाई दिलीप सिंह ने 1985 में चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। इस राजनीतिक हार के बाद मानो दोनों भाइयों का आतंक और भी बढ़ गया। इस कालखंड में, बाढ़ के राजपूत लड़ाकों से उनकी भीषण खूनी जंग छिड़ गई, जिसमें अनंत सिंह ने दर्जनों राजपूत युवकों की निर्मम हत्या कर अपना वर्चस्व स्थापित किया।
जैसे-जैसे राजनीति में उनके कदम बढ़े, खून-खराबा और भी भयावह होता गया। 1995 के चुनाव में जब उनके भाई सच्चिदानंद सिंह उर्फ फाजो सिंह की हार हुई, तो अनंत सिंह ने इसकी जिम्मेदारी अपने ही वंश के विवेका पहलवान पर डाल दी। इस बदले ने विवेका पहलवान को गांव छोड़ने पर मजबूर कर दिया, लेकिन यह दुश्मनी रुकी नहीं। इस भीषण जंग में अनंत सिंह के कई शूटर और रिश्तेदार मारे गए, जिसका जवाब उन्होंने राजपूत समाज के दर्जनों लोगों की क्रूरतापूर्वक हत्या करवा कर दिया। उनका आतंक इतना गहरा था कि कई वारदातों की तो प्राथमिकी तक दर्ज नहीं हो पाती थी, और खुद अपने ही गांव लदमा में भी उन्होंने कई लोगों को मौत के घाट उतारा।

सूरजभान सिंह औऱ अनंत सिंह
2000 का चुनाव आया, और वर्चस्व की लड़ाई एक नए क्रूरतम मुकाम पर पहुँच गई। अपने भाई दिलीप सिंह को चुनाव जिताने के लिए, अनंत सिंह ने सूरजभान समर्थक बच्चू सिंह को घर से खींच कर न सिर्फ गोलियों से भून दिया, बल्कि क्रूरता की सारी हदें लांघते हुए उसका सिर भी काट लिया। यह घटना उनकी बेखौफ और निर्मम छवि को हमेशा के लिए स्थापित कर गई। साल 2014 में बाढ़ में यादव समाज के पुटुस यादव और एक अन्य युवक की बेरहमी से हुई हत्या में भी उनकी गिरफ्तारी हुई थी।
अनंत सिंह का दो दशक लंबा सियासी सफर रहा है, लेकिन उनका आपराधिक इतिहास उससे कहीं ज़्यादा लंबा और काला है। वह अपनी बेखौफ और दबंग छवि के लिए प्रसिद्ध रहे हैं, और उनके आतंक का आलम यह रहा है कि उन्हें ‘छोटे सरकार’ कहा जाता है। दुलारचंद की हालिया हत्या ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि मोकामा में बाहुबल की सियासत की जड़ें कितनी गहरी हैं।
यह गिरफ्तारी, इस लंबी और खूनी कहानी में एक और कड़वा मोड़ है, जो हमें याद दिलाता है कि बिहार की राजनीति में अपराध और सत्ता का यह खतरनाक गठजोड़ अभी भी खत्म नहीं हुआ है।
नोट :-इस लेख में छोटे सरकार औऱ उनके अपराध से सम्बंधित कोई भी विवरण का अंतर्कथा पुष्टि नहीं करता है, भिन्न भिन्न अखबारो में प्रकाशित सूचनाओं के आधार पर यह आलेख तैयार किया गया है. पूरी घटनाक्रम मे छोटे सरकार पर आरोप लगे हैं, जो कुछ कोर्ट में विचाराधीन है तो कुछ मामले में कोई साक्ष्य नही मिला लेकिन इनकी लोकप्रियता इतनी रही की पांच बार यें मोकामा विधानसभा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं
