धनिक लाल मंडल भारतीय राजनीति के उन दुर्लभ नेताओं में से एक थे, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आधुनिक लोकतंत्र तक का सफर तय किया। छात्र जीवन से शुरू होकर राज्यपाल पद तक उनका सफर संघर्ष, समर्पण और सेवा की गाथा है। वे समाजवादी मूल्यों के सच्चे अनुयायी थे, जो सत्ता के बजाय जनता की भलाई को प्राथमिकता देते थे।
(विनोद आनंद )
ध निक लाल मंडल का जन्म 30 मार्च 1932 को बिहार के मधुबनी जिले के बेल्हा गांव में हुआ था। मिथिला क्षेत्र की उपजाऊ भूमि और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाले इस गांव में जन्मे धनिक लाल मंडल ने अपने जीवन में सादगी, ईमानदारी और सामाजिक न्याय की मिसाल कायम की। वे अतिपिछड़े वर्ग से आने वाले एक ऐसे नेता थे, जिन्होंने कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए निरंतर संघर्ष किया और खुद को “कमजोर वर्गों के मसीहा” के रूप में स्थापित किया।

उनका बचपन और किशोरावस्था स्वतंत्रता संग्राम की लहरों से प्रभावित रही। उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अंतिम दौर से गुजर रहा था। युवा धनिक लाल छात्र जीवन से ही राष्ट्रप्रेम और राजनीतिक जागरूकता से ओत-प्रोत थे। उन्होंने दरभंगा के नॉर्थब्रुक डिस्ट्रिक्ट स्कूल (जिला स्कूल) में शिक्षा प्राप्त की। छात्र कांग्रेस के सक्रिय सदस्य के रूप में उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में भाग लिया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया। यह घटना उनके जीवन की एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई, क्योंकि इससे उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता और बलिदान की भावना और मजबूत हुई।
स्कूल से निकाले जाने के बावजूद उन्होंने शिक्षा को नहीं छोड़ा। उन्होंने मिथिला कॉलेज, दरभंगा से आगे की पढ़ाई की और अंततः इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. तथा एलएलबी की उपाधियां प्राप्त कीं। उच्च शिक्षा ने उन्हें वैचारिक रूप से परिपक्व बनाया और समाजवादी विचारधारा से जोड़ा। वे सादा जीवन जीने वाले, विनम्र और स्पष्टवादी नेता थे, जिनकी वाणी में हमेशा जनता की पीड़ा और न्याय की पुकार होती थी।
प्रारंभिक राजनीतिक जीवन और समाजवादी आंदोलन में प्रवेश
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद धनिक लाल मंडल ने कांग्रेस छोड़कर समाजवादी आंदोलन में कदम रखा। 1956 में सोशलिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (SPI) के संस्थापक सदस्य के रूप में उन्होंने पार्टी में शामिल होकर राजनीतिक सफर की शुरुआत की। 1957 में वे बिहार सोशलिस्ट पार्टी के सचिव बने और 1959 में पूरे भारत की सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव का पद संभाला। 1962 में उन्होंने समेकित सोशलिस्ट पार्टी के संयुक्त सचिव के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई।
उनका यह दौर समाजवादी विचारकों जैसे जयप्रकाश नारायण (जेपी), राम मनोहर लोहिया और अन्य नेताओं के आदर्शों से प्रभावित था। वे भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता और आर्थिक शोषण के खिलाफ आवाज उठाते थे। समाजवाद उनके लिए मात्र राजनीतिक विचारधारा नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका था। उन्होंने हमेशा सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत किया और पद या सत्ता के लालच से दूर रहे।
बिहार विधानसभा में योगदान

1967, 1969 और 1972 में तीन बार वे बिहार विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। 1967 में वे बिहार विधानसभा के स्पीकर (अध्यक्ष) बने। स्पीकर के रूप में उन्होंने सदन की गरिमा बनाए रखने, चर्चाओं को सुचारू रूप से संचालित करने और विपक्ष को उचित अवसर देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय बिहार की राजनीति अस्थिरता और गठबंधनों से भरी हुई थी, लेकिन धनिक लाल मंडल ने निष्पक्षता और संवैधानिक मूल्यों का पालन करते हुए अपनी जिम्मेदारी निभाई।
1974 में उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और जय प्रकाश नारायण के “संपूर्ण क्रांति आंदोलन” (Total Revolution) में सक्रिय रूप से शामिल हो गए। यह आंदोलन भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और कांग्रेस सरकार की तानाशाही के खिलाफ था। बिहार से शुरू हुआ यह आंदोलन पूरे देश में फैला और आपातकाल (Emergency) की पृष्ठभूमि तैयार की। धनिक लाल मंडल ने 1975-76 के दौरान आपातकाल के खिलाफ खुलकर संघर्ष किया। वे जेल गए, प्रताड़ित हुए, लेकिन लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपना संघर्ष जारी रखा। इस आंदोलन ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई और साबित किया कि वे सिद्धांतों के लिए किसी भी कीमत चुकाने को तैयार हैं।
लोकसभा चुनाव, केंद्रीय मंत्री और जनता पार्टी सरकार
1977 में आपातकाल समाप्त होने के बाद जनता पार्टी की लहर में धनिक लाल मंडल झंझारपुर (मधुबनी) से लोकसभा के लिए चुने गए। मोरारजी देसाई सरकार में उन्हें गृह राज्य मंत्री (Minister of State for Home Affairs) बनाया गया। जनवरी 1980 तक उन्होंने इस पद पर कार्य किया। गृह मंत्रालय में रहते हुए उन्होंने आंतरिक सुरक्षा, पुलिस सुधार और केंद्र-राज्य संबंधों जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर काम किया।
1980 में वे दूसरी बार झंझारपुर से लोकसभा सदस्य चुने गए। संसद में वे बिहार की जनता की समस्याओं—जैसे बाढ़, कृषि संकट, पिछड़ेपन और सामाजिक न्याय—को मजबूती से उठाते थे। उनकी संसदीय गतिविधियां हमेशा तथ्यपरक और जनहितकारी होती थीं। वे 1977 से 1984 तक लोकसभा में सक्रिय रहे।
सामाजिक सेवा और क्षेत्रीय विकास में योगदान
धनिक लाल मंडल केवल राजनीतिज्ञ नहीं, बल्कि एक समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता भी थे। उन्होंने मधुबनी में कई स्वयंसेवी संगठनों की स्थापना की, जिनमें मधुबनी जिला समग्र विकास संस्थान और शिक्षा समाज न्यास प्रमुख हैं। इन संगठनों के माध्यम से उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और महिला सशक्तिकरण पर कार्य किया।
वे हरिजन सेवक संघ, बिहार (1980-84) के अध्यक्ष रहे और अखिल भारतीय हरिजन सेवक संघ के सदस्य भी थे। महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों के उत्थान के लिए निरंतर प्रयास किए। 1992 में राष्ट्र के प्रति उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें शिरोमणि पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
मधुबनी और आसपास के क्षेत्र की जनता के लिए उनकी सेवा अतुलनीय रही। वे बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों में सक्रिय रहते, शिक्षा संस्थानों की स्थापना करते और युवाओं को नैतिक शिक्षा देते। उनकी लोकप्रियता का कारण उनकी सादगी और जनता से सीधा संवाद था। लोग उन्हें “धानुक जी” या “मिथिला के लाल” कहकर पुकारते थे। उनके प्रयासों से क्षेत्र में शिक्षा और विकास की कई परियोजनाएं शुरू हुईं, जो आज भी जनता को लाभ पहुंचा रही हैं।
हरियाणा के राज्यपाल के रूप में कार्यकाल
7 फरवरी 1990 को धनिक लाल मंडल को हरियाणा का राज्यपाल नियुक्त किया गया। वे 13 जून 1995 तक इस पद पर रहे (लगभग 5 वर्ष 4 माह)। राज्यपाल के रूप में उन्होंने संवैधानिक गरिमा बनाए रखी और राज्य की राजनीतिक अस्थिरता के दौर में निष्पक्ष भूमिका निभाई। हरियाणा में उस समय विभिन्न दलों की सरकारें आईं-गईं, लेकिन वे केंद्र और राज्य के बीच सामंजस्य बनाए रखने में सफल रहे।
मई 1993 से जून 1993 तक उन्हें राजस्थान का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया। राज्यपाल पद पर रहते हुए उन्होंने शिक्षा, कृषि और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा दिया। हरियाणा की जनता और राजनीतिक वर्ग में उन्हें सम्मान मिला क्योंकि वे प्रशासनिक अनुभव से समृद्ध और सिद्धांतवादी थे। उनके कार्यकाल को एक स्थिर और संवैधानिक शासन का उदाहरण माना जाता है।
इसके बाद उन्होंने शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश) से संसदीय चुनाव भी लड़ा, हालांकि इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली। फिर भी उन्होंने राजनीतिक सक्रियता बनाए रखी।
व्यक्तिगत जीवन, मूल्य और विरासत
धनिक लाल मंडल का व्यक्तिगत जीवन बेहद सादा था। वे ईमानदार, सदाचारी और स्पष्टवादी नेता के रूप में जाने जाते थे। पद पर रहते हुए भी वे विलासिता से दूर रहे और जनता की सेवा को ही अपना धर्म माना। उनके पुत्र भारत भूषण मंडल आरजेडी विधायक रहे हैं, जो राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
उनकी मृत्यु 13 नवंबर 2022 को चंडीगढ़ में 90 वर्ष की आयु में हुई। उनकी अंतिम यात्रा मधुबनी के बेल्हा गांव में राज्य सम्मान के साथ हुई। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें “लोकप्रिय नेता और कुशल प्रशासक” कहकर श्रद्धांजलि दी।
हरियाणा के राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने भी उनके योगदान को याद किया।
समाज और क्षेत्र के लिए उपलब्धियां एवं पद
धनिक लाल मंडल ने जिन पदों पर आसीन रहे, वे निम्नलिखित हैं:
छात्र कांग्रेस सक्रिय सदस्य (1942)
सोशलिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के संस्थापक सदस्य (1956)
बिहार सोशलिस्ट पार्टी सचिव (1957)
सोशलिस्ट पार्टी महासचिव (1959)
समेकित सोशलिस्ट पार्टी संयुक्त सचिव (1962)
बिहार विधानसभा सदस्य (1967, 1969, 1972)
बिहार विधानसभा स्पीकर (1967-69)
लोकसभा सदस्य, झंझारपुर (1977 और 1980)
गृह राज्य मंत्री, भारत सरकार (1977-1980)
हरिजन सेवक संघ बिहार अध्यक्ष (1980-84)
हरियाणा राज्यपाल (7 फरवरी 1990 – 13 जून 1995)
राजस्थान राज्यपाल अतिरिक्त प्रभार (मई-जून 1993)
शिरोमणि पुरस्कार विजेता (1992)
समाज के लिए उपलब्धियां:
लोकतंत्र की रक्षा: आपातकाल विरोध और जेपी आंदोलन में सक्रिय भूमिका।
सामाजिक न्याय: दलित, पिछड़े और हरिजन वर्गों के उत्थान के लिए हरिजन सेवक संघ के माध्यम से कार्य।
शिक्षा और विकास: मधुबनी में शिक्षा समाज न्यास और समग्र विकास संस्थान की स्थापना।
क्षेत्रीय सेवा:
बिहार के मधुबनी-झंझारपुर क्षेत्र में बाढ़ राहत, शिक्षा प्रसार और ग्रामीण विकास।
नैतिक राजनीति: सादगी और ईमानदारी की मिसाल पेश कर भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति को प्रोत्साहित किया।
उनकी उपलब्धियां केवल पदों तक सीमित नहीं थीं। उन्होंने दिखाया कि राजनीति सेवा का माध्यम हो सकती है। मिथिला की धरती से निकलकर उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर बिहार का नाम रोशन किया। उनके प्रयासों से कमजोर वर्गों को आवाज मिली और क्षेत्र में विकास की नींव पड़ी।
धनिक लाल मंडल भारतीय राजनीति के उन दुर्लभ नेताओं में से एक थे, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आधुनिक लोकतंत्र तक का सफर तय किया। छात्र जीवन से शुरू होकर राज्यपाल पद तक उनका सफर संघर्ष, समर्पण और सेवा की गाथा है। वे समाजवादी मूल्यों के सच्चे अनुयायी थे, जो सत्ता के बजाय जनता की भलाई को प्राथमिकता देते थे।
आज जब राजनीति में सत्ता और धन का प्रभाव बढ़ रहा है, तब धनिक लाल मंडल जैसी सादगी और सिद्धांतवाद की याद हमें प्रेरित करती है। मधुबनी की जनता के लिए वे हमेशा “अपने नेता” बने रहेंगे, जिन्होंने शिक्षा, विकास और सामाजिक न्याय की अलख जगाई। उनकी विरासत युवा पीढ़ी को सिखाती है कि सच्ची राजनीति जनसेवा है, न कि स्वार्थ।
उनके आदर्शों को अपनाकर ही हम एक समृद्ध, न्यायपूर्ण और लोकतांत्रिक भारत का निर्माण कर सकते हैं। धनिक लाल मंडल अमर रहें। उनकी स्मृति को सलाम।

