विपक्ष के इन आरोपों के पीछे एक गहरी रणनीति छिपी है। भाजपा झारखंड की जनता के बीच यह संदेश देना चाहती है कि हेमंत सोरेन सरकार ‘आम आदमी’ की नहीं, बल्कि ‘खास आदमी’ की सरकार बन गई है। यह हमला विशेष रूप से उन ग्रामीण और गरीब मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए है, जो बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
झा रखंड की राजनीति इन दिनों राजधानी रांची के कांके रोड पर आकार ले रहे एक नए निर्माण को लेकर पूरी तरह गर्मा गई है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए बन रहे नए सरकारी आवास ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक ऐसी वैचारिक और राजनीतिक खाई खोद दी है, जिसमें एक तरफ जनहित और फिजूलखर्ची के तर्क हैं, तो दूसरी तरफ प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण और भविष्य की जरूरतें। इस पूरे विवाद की जड़ में वह 100 करोड़ रुपये की अनुमानित राशि है, जिसे भाजपा ‘जनता की गाढ़ी कमाई की बर्बादी’ करार दे रही है, जबकि सरकार इसे राज्य की अस्मिता और सुरक्षा मानकों से जोड़कर देख रही है। 12 मई 2025 को जब मुख्यमंत्री ने अपनी पत्नी कल्पना सोरेन के साथ इस परिसर की आधारशिला रखी थी, तब शायद यह अनुमान नहीं था कि ईंट और गारे से बनने वाली यह इमारत झारखंड के आगामी चुनावों और राजनीतिक विमर्श का केंद्र बिंदु बन जाएगी।
इस विवाद के सियासी मायने समझने के लिए विपक्ष के हमलों की तीव्रता को देखना जरूरी है। भाजपा के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने इस निर्माण की तुलना दिल्ली के बहुचर्चित ‘शीश महल’ विवाद से कर इसे एक राष्ट्रीय विमर्श देने की कोशिश की है। विपक्ष का मुख्य तर्क यह है कि जो सरकार आदिवासी, मूलवासी और गरीबों के उत्थान के नाम पर सत्ता में आई, वह अपने लिए इतना भव्य और विलासी आवास क्यों बना रही है? भाजपा का आरोप है कि राज्य में जब युवाओं के लिए रोजगार, छात्रों के लिए छात्रवृत्ति और सुदूर गांवों में बुनियादी सुविधाओं की बात आती है, तो सरकार खजाना खाली होने का रोना रोती है, लेकिन मुख्यमंत्री के ऐशो-आराम के लिए करोड़ों के फंड और टेंडर पलक झपकते ही मंजूर कर दिए जाते हैं। प्रतुल शाहदेव जैसे भाजपा प्रवक्ताओं ने इस मामले में पारदर्शिता पर भी सवाल उठाए हैं।
उनका दावा है कि कैबिनेट की ब्रीफिंग में इस परियोजना के तथ्यों को जानबूझकर छिपाया गया। आधिकारिक तौर पर मुख्य भवन की लागत भले ही 47 करोड़ बताई जा रही हो, लेकिन अन्य बुनियादी ढांचों और भविष्य में होने वाली लागत वृद्धि (Cost Escalation) को जोड़ दिया जाए, तो यह आंकड़ा आसानी से 100 करोड़ के पार चला जाएगा।
विपक्ष के इन आरोपों के पीछे एक गहरी रणनीति छिपी है। भाजपा झारखंड की जनता के बीच यह संदेश देना चाहती है कि हेमंत सोरेन सरकार ‘आम आदमी’ की नहीं, बल्कि ‘खास आदमी’ की सरकार बन गई है। यह हमला विशेष रूप से उन ग्रामीण और गरीब मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए है, जो बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
भाजपा यह सवाल भी उठा रही है कि जब स्मार्ट सिटी क्षेत्र में पहले से ही एक नया राजभवन और मुख्यमंत्री आवास प्रस्तावित है, तो फिर कांके रोड स्थित पुराने परिसर में इतनी बड़ी राशि खर्च करने की क्या तुक है? उनके अनुसार, यह केवल पद और प्रतिष्ठा का अनावश्यक प्रदर्शन है, जो एक विकासशील राज्य की प्राथमिकताओं से मेल नहीं खाता।
दूसरी ओर, सत्ताधारी दल झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) और उसकी सहयोगी कांग्रेस ने इस पर जो सफाई दी है, वह व्यावहारिक और संस्थागत दृष्टिकोण पर आधारित है। जेएमएम महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य और कांग्रेस प्रवक्ता लाल किशोर नाथ शाहदेव का तर्क है कि मुख्यमंत्री आवास किसी व्यक्ति विशेष की निजी संपत्ति नहीं होती, बल्कि यह राज्य की एक महत्वपूर्ण संस्था है। वर्तमान में जिस ब्रिटिश-युगीन आवास को तोड़कर नया निर्माण किया जा रहा है, वह दशकों पुराना है और आधुनिक सुरक्षा मानकों के अनुकूल नहीं रह गया था। सरकार का पक्ष है कि एक मुख्यमंत्री के पास देश-विदेश के प्रतिनिधि आते हैं, हाई-प्रोफाइल बैठकें होती हैं और सुरक्षा का एक बड़ा तामझाम होता है। इन सबको व्यवस्थित करने के लिए एक आधुनिक और सुदृढ़ इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता होती है। इसे ‘शीश महल’ कहना केवल राजनीति से प्रेरित शब्दावली है, जबकि वास्तव में यह आने वाले कई दशकों की प्रशासनिक जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जा रहा निवेश है।
सत्ता पक्ष का एक तर्क यह भी है कि भाजपा जब सत्ता में होती है, तो बड़ी और भव्य परियोजनाओं को ‘विकास का प्रतीक’ और ‘राज्य की गरिमा’ बताती है, लेकिन विपक्ष में आते ही उसे फिजूलखर्ची दिखने लगती है। जेएमएम का कहना है कि यह आवास केवल हेमंत सोरेन के लिए नहीं, बल्कि झारखंड के भविष्य के सभी मुख्यमंत्रियों के लिए है। सुरक्षा मानकों का हवाला देते हुए वे तर्क देते हैं कि मुख्यमंत्री के प्रोटोकॉल और इंटेलिजेंस ब्यूरो के निर्देशों के अनुसार पुराने ढांचे में कई खामियां थीं, जिन्हें दूर करना अनिवार्य था।
अब सवाल उठता है कि क्या यह वास्तव में फिजूलखर्ची है या एक जरूरत? इस विश्लेषण के दो पहलू हैं। यदि हम आर्थिक दृष्टिकोण से देखें, तो झारखंड जैसे राज्य में जहां कुपोषण, बेरोजगारी और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी है, वहां एक आवासीय परिसर पर 100 करोड़ खर्च करना नैतिक रूप से बहस का विषय हो सकता है। जनता की नजर में यह राशि एक बहुत बड़ा बदलाव ला सकती थी। वहीं, यदि हम प्रशासनिक और सुरक्षा के नजरिए से देखें, तो किसी भी राज्य के मुखिया का कार्यालय और आवास उसकी कार्यक्षमता और सुरक्षा को प्रभावित करता है। जर्जर भवनों की मरम्मत में हर साल होने वाले लाखों-करोड़ों के खर्च के बजाय एक बार में एक स्थायी और आधुनिक परिसर बनाना लंबी अवधि में फायदेमंद हो सकता है।
इस पूरे प्रकरण ने झारखंड की राजनीति में ‘प्रतीकों की लड़ाई’ को जन्म दे दिया है। भाजपा इसे भ्रष्टाचार और विलासिता का प्रतीक बना रही है, तो सरकार इसे राज्य की प्रगति और संस्थागत मजबूती का प्रतीक बता रही है। आने वाले समय में यह मुद्दा ठंडा होता नहीं दिख रहा, क्योंकि जैसे-जैसे निर्माण आगे बढ़ेगा, लागत और डिजाइन को लेकर नए खुलासे और आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी रहेगा। अंततः, इसका फैसला जनता की अदालत में होगा कि वह इसे अपने स्वाभिमान से जोड़कर देखती है या अपने पैसों की बर्बादी मानती है। फिलहाल, रांची का यह ‘शीश महल’ विवाद केवल ईंट-पत्थर की कहानी नहीं, बल्कि झारखंड की सत्ता के गलियारों में छिड़ी एक बड़ी सियासी जंग का आईना बन गया है।

