धनबाद नगर निगम चुनाव अब नीति और विकास के दावों से इतर व्यक्तिगत वर्चस्व और सांगठनिक विद्रोह की रणभूमि बन चुका है। मेयर पद के लिए संजीव अग्रवाल के नाम की घोषणा ने भाजपा के भीतर गुटबाजी को हवा दे दी है। पूर्व मेयर चंद्रशेखर अग्रवाल का इस्तीफा देकर झामुमो में शामिल होना और संजीव सिंह व सांसद खेमे की सक्रियता भाजपा की साख के लिए बड़ी चुनौती है। दूसरी ओर, झामुमो में भी डॉ. नीलम मिश्रा और शेखर अग्रवाल के बीच तालमेल बैठाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। ‘अपनों’ के वार और बिखरते समीकरणों के बीच यह चुनाव अब भाजपा के लिए एक कठिन अग्निपरीक्षा बन गया है।
धनबाद की सियासत इस वक्त एक अत्यंत जटिल और रोचक मोड़ पर आ खड़ी हुई है, जहाँ भारतीय जनता पार्टी के लिए मुख्य चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि उसका अपना भीतरघात और गहरे स्तर पर पैठी गुटबाजी बन गई है। जिले की राजनीति में सांगठनिक अनुशासन का दावा करने वाली भाजपा आज उस चौराहे पर खड़ी है, जहाँ स्थानीय क्षत्रपों की महत्वाकांक्षाएं पार्टी के आधिकारिक निर्णय को सीधी चुनौती दे रही हैं।
जैसे ही भाजपा प्रदेश कमेटी ने मेयर पद के लिए संजीव अग्रवाल के नाम पर अपनी सहमति की मुहर लगाई, वैसे ही पार्टी के भीतर वर्षों से पनप रहा असंतोष बगावत के रूप में बाहर आ गया। पूर्व मेयर चंद्रशेखर अग्रवाल का इस्तीफा देकर दुमका में मुख्यमंत्री के समक्ष झारखंड मुक्ति मोर्चा का दामन थामना केवल एक व्यक्तिगत दलबदल नहीं है, बल्कि यह भाजपा के उस ठोस आधार पर प्रहार है जिसे पार्टी अपना सुरक्षित वोट बैंक मानती रही है।
शेखर अग्रवाल का यह कदम यह स्पष्ट करता है कि पार्टी के भीतर गुटीय वर्चस्व की जंग अब निर्णायक दौर में है, जिसका सीधा लाभ झामुमो को अपनी जमीन मजबूत करने के रूप में मिल रहा है।
हालांकि, यह स्थिति जितनी भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण है, झामुमो के लिए भी उतनी ही पेचीदा साबित हो रही है। झामुमो जिला समिति द्वारा डॉ. नीलम मिश्रा को पहले ही उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद शेखर अग्रवाल की एंट्री ने पार्टी के भीतर भी विरोधाभास पैदा कर दिया है। अब यह झामुमो के शीर्ष नेतृत्व की कूटनीति पर निर्भर करेगा कि वे नीलम मिश्रा को पार्टी हित में पीछे हटने के लिए कैसे राजी करते हैं, अन्यथा वहां भी मतों का बिखराव तय है।
इधर, भाजपा की मुश्किलें केवल शेखर अग्रवाल तक सीमित नहीं हैं। झरिया के पूर्व विधायक संजीव सिंह की मैदान में मौजूदगी ने मुकाबले को त्रिकोणीय और अनिश्चित बना दिया है। संजीव सिंह का अपना एक बड़ा और समर्पित जनाधार है, जो पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के बजाय उनके व्यक्तिगत प्रभाव के साथ चलने को तैयार है। इसके साथ ही सांसद ढुल्लू महतो की पत्नी सावित्री देवी द्वारा नामांकन पत्र खरीदा जाना और एल.बी. सिंह जैसे नेताओं की सक्रियता यह संकेत देती है कि धनबाद भाजपा के विभिन्न खेमे अब परोक्ष रूप से अपनी ताकत आजमाने की फिराक में हैं।
वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि धनबाद नगर निगम का चुनाव अब नीति और विकास के दावों से कहीं ऊपर उठकर व्यक्तिगत रसूख और गुटीय वफादारी की जंग बन चुका है। गैर-राजनीतिक आधार पर होने वाले इस चुनाव ने नेताओं को वह स्पेस दे दिया है, जहाँ वे पार्टी लाइन से इतर जाकर अपनी पकड़ साबित कर सकें। भाजपा के लिए यह चुनाव एक ‘अग्निपरीक्षा’ की तरह है, जहाँ उसे न केवल शेखर अग्रवाल द्वारा की जाने वाली सेंधमारी को रोकना है, बल्कि संजीव सिंह और सांसद समर्थित खेमे के बीच एक संतुलन भी बनाना है।
यदि 4 तारीख तक नामांकन की तस्वीर स्पष्ट होने के बाद भी भाजपा के बागी पीछे नहीं हटते, तो इसका सीधा लाभ उस उम्मीदवार को मिल सकता है, जिसका अपना व्यापक जनाधार है, बशर्ते वह अपने भीतर की गुटबाजी को नियंत्रित कर ले।
कुल मिलाकर, धनबाद का चुनावी अखाड़ा अब उस दौर में है जहाँ ‘अपनों’ का वार ही सबसे अधिक घातक साबित होने वाला है, और अंततः जीत उसी की होगी जो इस सांगठनिक बिखराव को कुशलता से थाम पाएगा।

