बाबू भूपेंद्र नारायण मंडल भारतीय राजनीति के वे ‘लोक-साधक’ थे, जिन्होंने संपन्नता का त्याग कर अपना जीवन शोषितों और वंचितों के अधिकारों हेतु समर्पित कर दिया। 1942 की अगस्त क्रांति के नायक और डॉ. लोहिया के अनन्य सहयोगी रहे मंडल जी ने समाजवाद को केवल सिद्धांतों में नहीं, बल्कि अपने सादगीपूर्ण आचरण में जिया। संसद में ‘तीन आना बनाम पच्चीस हजार’ की ऐतिहासिक बहस से सत्ता को झकझोरने वाले इस ‘ज्वॉइंट किलर’ ने नेहरू जी के मंत्री पद के प्रस्ताव को ठुकराकर वैचारिक शुचिता की मिसाल पेश की। सामाजिक न्याय, समान अवसर और सादगी के प्रति उनके अटूट संकल्प ने उन्हें ‘समाजवाद का संत’ बनाया।
बाबू भूपेंद्र नारायण मंडल का जीवन दर्शन उस भारतीय मिट्टी की सोंधी सुगंध से रचा-बसा था, जहाँ राजनीति को सत्ता की सीढ़ी नहीं बल्कि लोक-कल्याण का एक कठिन और पवित्र व्रत माना जाता था। 1904 में मधेपुरा के एक अत्यंत समृद्ध जमींदार परिवार में जन्मे इस बालक के पास वह सब कुछ था, जो किसी को भी विलासिता और आराम की ओर खींच सकता था, किंतु नियति ने उन्हें ‘मनखुश बाबू’ से ‘समाजवाद के संत’ बनने की राह पर अग्रसर कर दिया। उनकी चेतना का जागरण उस कालखंड में हुआ जब भारत गुलामी की बेड़ियों को काटने के लिए छटपटा रहा था। पटना विश्वविद्यालय से वकालत की डिग्री हासिल करने वाला यह मेधावी नौजवान जब अपने गाँव और समाज की ओर देखता, तो उसे ऊंच-नीच, छुआछूत और जातिवाद की गहरी खाइयाँ दिखाई देतीं। यही वह वैचारिक बिंदु था जहाँ से उनके भीतर का क्रांतिकारी स्वरूप आकार लेने लगा। 1942 की अगस्त क्रांति के दौरान मधेपुरा की धरती पर उन्होंने जो शौर्य दिखाया, वह आज भी उत्तर बिहार की लोकगाथाओं का अटूट हिस्सा है। जब यूनियन जैक को उतारकर उन्होंने तिरंगा फहराया, तो वह केवल एक प्रतीकात्मक कार्य नहीं था, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत के ताबूत में मधेपुरा की ओर से ठोंकी गई एक मज़बूत कील थी।
उनकी राजनीति का मूल आधार डॉ. राममनोहर लोहिया और आचार्य नरेंद्र देव के वे समाजवादी सिद्धांत थे, जिन्हें उन्होंने केवल सभाओं में नहीं दोहराया, बल्कि अपने आचरण के पोर-पोर में उतारा। भूपेंद्र बाबू उन दुर्लभ राजनेताओं में से थे, जो ‘एक व्यक्ति, एक पद’ के सिद्धांत के लिए किसी भी बड़े पद का सहर्ष त्याग कर सकते थे। उनके लिए राजनीति का अर्थ था—अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति का आत्मसम्मान। पटना सर्किट हाउस के सामने उनका वह ऐतिहासिक धरना और गिरफ्तारी, जो उन्होंने जनप्रतिनिधियों के सम्मान और ठहरने की उचित व्यवस्था के लिए दी थी, उनके हठयोगी होने का जीवंत प्रमाण है। उन्होंने तब तक अपनी जमानत नहीं करवाई, जब तक शासन ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए सर्किट हाउस के दरवाजे जनप्रतिनिधियों के लिए नहीं खोल दिए। यह एक ऐसा विरल उदाहरण था जहाँ एक व्यक्ति ने अपने व्यक्तिगत सुख और स्वतंत्रता को ताक पर रखकर व्यवस्था की जड़ता और नौकरशाही के अहंकार को सीधी चुनौती दी थी।
उनके जीवन में सादगी और सिद्धांत इस कदर घुले-मिले थे कि राज्यसभा सदस्य होने के बावजूद वे साधारण खादी के कुर्ता-पायजामा और चप्पल में ही दिखते थे। जब वे चुनावी राजनीति के मैदान में उतरे, तो उन्होंने बड़े-बड़े दिग्गजों के राजनैतिक दर्प को चूर-चूर कर दिया। 1962 में ललित नारायण मिश्र जैसे कद्दावर और प्रभावशाली नेता को पराजित करने के कारण उन्हें भारतीय राजनीति का ‘ज्वॉइंट किलर’ कहा गया, लेकिन यह अभूतपूर्व जीत उनके व्यक्तिगत अहंकार का कारण कभी नहीं बनी। संसद के भीतर उनकी गर्जना तब पूरी दुनिया ने सुनी, जब उन्होंने डॉ. लोहिया द्वारा तैयार किए गए उस ऐतिहासिक दस्तावेज को सदन के पटल पर रखा, जिसने तत्कालीन नेहरू सरकार की आर्थिक नीतियों की नींव हिला दी थी। वह बहस ‘तीन आना बनाम पच्चीस हजार’ के नाम से विख्यात हुई, जहाँ उन्होंने आँकड़ों की बाजीगरी के बीच आम आदमी की मुफ़लिसी का असली चेहरा सत्ता के सामने नग्न कर दिया। नेहरू जी ने उन्हें अपने पाले में लाने के लिए वित्त या रक्षा जैसे बड़े मंत्रालयों का प्रलोभन भी दिया, लेकिन मंडल जी ने बड़ी शालीनता से उसे ठुकराते हुए कहा कि वे जहाँ हैं, वहीं से देश की बेहतर चिंता कर सकते हैं। यह सत्ता के प्रति उनकी पूर्ण अनासक्ति का चरम बिंदु था।
भूपेंद्र बाबू की नजरों में जातिवाद वह संक्रामक बीमारी थी, जो भारतीय समाज को भीतर ही भीतर दीमक की तरह चाट रही थी। उन्होंने गहराई से महसूस किया कि आजादी के बाद भी जल, जंगल, जमीन और सत्ता संचालन की गतिविधियों पर महज कुछ खास वर्गों का ही वर्चस्व बना हुआ है। इसी भयानक असमानता को जड़ से मिटाने के लिए उन्होंने ‘संसोपा’ के माध्यम से पिछड़ों, दलितों और शोषितों के लिए ‘सौ में साठ’ की हिस्सेदारी और आरक्षण की पुरजोर वकालत की। उनका संघर्ष केवल संसद के गलियारों या चुनावी रैलियों तक सीमित नहीं था; वे आज भी उन ग्रामीणों को याद आते हैं, जब वे गाँव की कीचड़ भरी पगडंडियों पर जानबूझकर पैदल चलते थे। उनका तर्क बड़ा स्पष्ट और मर्मस्पर्शी था कि यदि उनका समाज और गाँव के लोग इस कीचड़ से गुजरने को अभिशप्त हैं, तो वे सूखे रास्ते का चयन कैसे कर सकते हैं। किसी भी सामाजिक भोज में शामिल होने पर गाड़ीवान को अपने बगल में बैठाकर साथ भोजन कराना उनकी उस महानता को रेखांकित करता है, जहाँ इंसानियत का दर्जा किसी भी पद, गोत्र या प्रतिष्ठा से कहीं ऊपर था।
अपने अंतिम वर्षों तक वे फक्कड़पन, वैचारिक शुचिता और ईमानदारी की एक ऐसी मिसाल बने रहे, जिसकी कल्पना आज के दौर में कठिन है। उन्होंने मधेपुरा में ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय की स्थापना के लिए जो परिश्रम किया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए शिक्षा और चेतना का महाद्वार साबित हुआ। वे ताउम्र पूंजीवादी तंत्र, पाखंड और भ्रष्ट आचरण के विरुद्ध एक अभेद्य दीवार बनकर खड़े रहे। आज के संक्रमण काल में, जब राजनीति स्वार्थसिद्धि और कुर्सी के मोह में फंसी नजर आती है, तब भूपेंद्र नारायण मंडल का जीवन एक शीतल छाँव और प्रेरणादायी प्रकाश स्तंभ की तरह महसूस होता है। वे लोहिया के ऐसे अनमोल ‘हीरे’ थे, जिन्होंने अपनी आभा से पूरे बिहार की धरती को समाजवादी चेतना और सामाजिक न्याय के संकल्प से आलोकित कर दिया। उनका जीवन हमें निरंतर यह संदेश देता है कि जनतंत्र में कोई भी पार्टी या शासक अपरिहार्य नहीं होता, और असली उजाला तभी संभव है जब समाज का सबसे उपेक्षित व्यक्ति भी शासन की मुख्यधारा में बराबरी का हिस्सेदार बने।

