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नबाद नगर निगम चुनाव के मौजूदा समीकरणों ने शहर की राजनीति में हलचल मचा दी है। विशेष रूप से झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) द्वारा मेयर प्रत्याशी को लेकर अपनाए गए रुख ने राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज कर दी हैं।

पहले पार्टी ने वर्षों से समर्पित महिला नेत्री नीलम मिश्रा को अपना अधिकृत समर्थन देकर मैदान में उतारा और उनका नामांकन भी कराया। लेकिन ऐन वक्त पर भाजपा की नीतियों से नाराज होकर झामुमो में शामिल हुए पूर्व मेयर चंद्रशेखर अग्रवाल के आने से समीकरण पूरी तरह बदल गए। अब झामुमो विधायक मथुरा महतो ने स्पष्ट कर दिया है कि धनबाद से मेयर पद के लिए चंद्रशेखर अग्रवाल ही पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी होंगे।

​पार्टी के इस अचानक लिए गए फैसले ने नीलम मिश्रा के समर्थकों के बीच भारी असंतोष पैदा कर दिया है। नीलम मिश्रा एक पढ़ी-लिखी और जुझारू नेत्री मानी जाती हैं, जिन्होंने लंबे समय तक पार्टी की जमीन तैयार करने में अपना पसीना बहाया है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या नीलम मिश्रा पार्टी के इस फैसले को स्वीकार कर चुनावी मैदान से हट जाएंगी या फिर बगावत का झंडा बुलंद कर निर्दलीय मैदान में डटी रहेंगी। कयास लगाए जा रहे हैं कि झामुमो उन्हें किसी बोर्ड, निगम या महिला आयोग में पद का प्रलोभन देकर मनाने की कोशिश कर सकता है, अन्यथा उन्हें दरकिनार करने का रास्ता भी खुला है।

​झामुमो का यह ‘पैंतरा’ नया नहीं है। इससे पहले सिंदरी विधानसभा क्षेत्र में भी पार्टी ऐसा प्रयोग कर चुकी है, जहां 50 हजार वोट पाने वाले मन्नू आलम का टिकट काटकर दुर्योधन चौधरी को दिया गया था, जिसका परिणाम पार्टी के लिए निराशाजनक रहा था। चंद्रशेखर अग्रवाल के लिए भी यह राह इतनी आसान नहीं दिखती।

सबसे बड़ी चुनौती उन भाजपा समर्थित वोटरों की है, जो अग्रवाल के पाला बदलने से असमंजस में हैं। क्या वे उनके साथ झामुमो के पाले में जाएंगे या किसी अन्य विकल्प की तलाश करेंगे? नीलम मिश्रा के समर्थकों की नाराजगी और अग्रवाल की स्वीकार्यता के बीच फंसी झामुमो की यह रणनीति कितनी कारगर होगी, यह तो चुनाव परिणाम ही तय करेंगे। फिलहाल, धनबाद की जनता इस राजनीतिक दंगल को बड़े कौतूहल से देख रही है, जहां वफादारी और अवसरवादिता के बीच सीधा मुकाबला नजर आ रहा है।

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