बजट 2026: बजट में 200 नए औद्योगिक कॉरिडोर की घोषणा झारखंड और बिहार के बीच के आर्थिक संबंधों को एक नई ऊंचाई दे सकती है। बाबूलाल मरांडी ने स्पष्ट किया कि इन गलियारों की सफलता राज्यों के सहयोग पर टिकी है। यदि दोनों राज्य सरकारें केंद्र के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती हैं, तो एमएसएमई सेक्टर को मिलने वाली वित्तीय सहायता छोटे उद्योगों की तस्वीर बदल सकती है। झारखंड का खनिज और बिहार का श्रम बल मिलकर एक ऐसा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र बना सकते हैं, जिससे पलायन की समस्या पर लगाम लग सके।
रांची : केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में पेश किए गए आम बजट 2026 पर झारखंड भाजपा के नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी की प्रतिक्रिया न केवल एक राजनीतिक समर्थन है, बल्कि यह पूर्वी भारत के आर्थिक कायाकल्प की एक विस्तृत रूपरेखा भी प्रस्तुत करती है। रांची स्थित प्रदेश भाजपा कार्यालय में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में मरांडी ने इस बजट को ‘विकसित भारत’ के संकल्प की सिद्धि का आधार बताया। उनके वक्तव्य का गहरा विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट होता है कि केंद्र सरकार की नजर अब उत्पादन, स्वास्थ्य और औद्योगिक गलियारों के माध्यम से झारखंड और बिहार जैसे राज्यों को राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा में मजबूती से जोड़ने पर है।
मरांडी ने विशेष रूप से बायो-फार्मा और फार्मास्युटिकल सेक्टर पर जोर दिया, जो झारखंड और बिहार के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। भारत को दवा उत्पादन का वैश्विक हब बनाने की दिशा में क्लीनिकल ट्रायल के लिए 1000 नए स्थलों का विकास और 10,000 करोड़ रुपये का भारी-भरकम निवेश स्वास्थ्य ढांचे में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा। झारखंड जैसे राज्य, जहां प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता है, वहां मेडिकल टूरिज्म और फार्मा हब बनने की असीम संभावनाएं हैं। मरांडी का यह सुझाव कि आदिवासी बेटियों को नर्सिंग प्रशिक्षण देकर इस क्षेत्र से जोड़ा जाए, न केवल महिला सशक्तिकरण का एक मॉडल है, बल्कि यह स्वास्थ्य सेवाओं की कमी को दूर करने का एक व्यावहारिक समाधान भी है। बिहार, जो अपनी बड़ी आबादी के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की तलाश में रहता है, वहां भी इस तरह के निवेश से रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
बजट में 200 नए औद्योगिक कॉरिडोर की घोषणा झारखंड और बिहार के बीच के आर्थिक संबंधों को एक नई ऊंचाई दे सकती है। बाबूलाल मरांडी ने स्पष्ट किया कि इन गलियारों की सफलता राज्यों के सहयोग पर टिकी है। यदि दोनों राज्य सरकारें केंद्र के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती हैं, तो एमएसएमई सेक्टर को मिलने वाली वित्तीय सहायता छोटे उद्योगों की तस्वीर बदल सकती है। झारखंड का खनिज और बिहार का श्रम बल मिलकर एक ऐसा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र बना सकते हैं, जिससे पलायन की समस्या पर लगाम लग सके।
विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस द्वारा बजट की आलोचना पर मरांडी ने तीखा प्रहार किया। उन्होंने बजट की तुलना महात्मा गांधी के चरखा-खादी आंदोलन से करते हुए तर्क दिया कि जिस तरह गांधीजी ने स्वावलंबन की बात की थी, उसी तरह यह बजट टेक्सटाइल और स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा दे रहा है। छात्राओं के लिए हॉस्टल निर्माण की योजना को उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में सुरक्षा और सुगमता का सेतु बताया, जो झारखंड के दूरदराज के क्षेत्रों की बालिकाओं के लिए उच्च शिक्षा के द्वार खोलेगा।
संक्षेप में, बाबूलाल मरांडी का विश्लेषण यह संकेत देता है कि बजट 2026 केवल आंकड़ों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह झारखंड और बिहार के पिछड़ेपन को दूर कर उन्हें आधुनिक औद्योगिक केंद्र बनाने का एक ब्लूप्रिंट है। अब गेंद राज्य सरकारों के पाले में है कि वे इन योजनाओं का लाभ उठाकर अपने राज्यों की तस्वीर कितनी जल्दी बदलते हैं।

