जब बादशाह ख़ान भारत आए, तब भी उनके हाथों में वही पोटली थी। राजीव गांधी, जो इस पोटली के इतिहास को जानते थे, ने एक पुत्रवत आग्रह किया। उन्होंने कहा कि आपने महात्मा गांधी और इंदिरा जी को भी इसे हाथ नहीं लगाने दिया, लेकिन अगर आप चाहें, तो क्या मैं इसे खोलकर देख सकता हूँ?इस पर बादशाह खान ने क्या कहा, क्या उनके इस पोटली का रहस्य खुला जानने ke लिए पढ़िए पुरे आलेख को

आलेख :- विनोद आनंद
म हात्मा गांधी ने कहा था, “एक सच्चा पठान तभी महान हो सकता है, जब वह अहिंसक हो।” इस कथन को अपने जीवन का मूल मंत्र बनाकर चरितार्थ करने वाले व्यक्तित्व का नाम था ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान—जिन्हें दुनिया ‘सीमांत गांधी’ या बादशाह ख़ान के नाम से जानती है। उनका जीवन एक ऐसा महाकाव्य है जो शौर्य की भूमि पर सादगी, हिंसा की चुनौती के सम्मुख अहिंसा, और विभाजन की क्रूरता के सामने अटूट प्रेम की गाथा लिखता है।

उनके जीवन का सबसे मार्मिक और प्रतीकात्मक पहलू वह कपड़े की गठरी (पोटली) थी, जिसे वह जीवन भर अपने से अलग नहीं करते थे। यह पोटली महज़ वस्त्रों का संग्रह नहीं थी; यह उनकी पूरी जीवन-यात्रा का, उनके सिद्धांतों का, और सबसे बढ़कर, उनकी मातृभूमि से बिछोह के गहरे दर्द का मौन स्मारक थी।
1969: विभाजन की वेदना का एक वाक्य
वर्ष 1969, महात्मा गांधी की जन्म शताब्दी का अवसर। अपनी मातृभूमि भारत की ओर, इलाज के लिए, श्रीमती इंदिरा गांधी के विशेष आग्रह पर, बादशाह ख़ान पधारे। दिल्ली के हवाई अड्डे पर, देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और महान समाजवादी नेता जे॰पी॰ नारायण स्वयं उन्हें लेने आए थे। यह सम्मान उनकी असाधारण महानता और भारत के हृदय में उनके लिए सुरक्षित स्थान का प्रमाण था।
विमान से बाहर आते ही, सबके आकर्षण का केंद्र बनी वह चिर-परिचित पोटली, जिसे वह अपने हाथों में मजबूती से थामे हुए थे। मिलते ही, श्रीमती गांधी ने स्नेह और सहजता से पोटली की ओर हाथ बढ़ाया, “इसे हमें दीजिए, हम ले चलते हैं।”

इस सरल निवेदन पर बादशाह ख़ान ठहरे। उनका उत्तर अत्यंत ठंडा, शांत, पर अथाह दर्द से भरा हुआ था: “यही तो बचा है, इसे भी ले लोगी?”
यह एक ऐसा वाक्य था, जिसने हवाई अड्डे के वातावरण को चीरकर रख दिया। यह महज़ पोटली न सौंपने की बात नहीं थी, यह उस व्यक्ति की ओर से विभाजन की क्रूरता के खिलाफ़ एक मौन चीख़ थी जिसने अविभाजित भारत के लिए जीवन भर संघर्ष किया था। ‘यही तो बचा है’ का अर्थ था—मेरा घर, मेरा राष्ट्र, मेरे ‘ख़ुदाई ख़िदमतगार’ भाई-बहन, सब कुछ उस भयानक बँटवारे ने छीन लिया। अब बस मेरी यह व्यक्तिगत सादगी, मेरी आत्म-निर्भरता, और मेरे सिद्धांत ही बचे हैं। इस एक वाक्य ने जे॰पी॰ नारायण को इतना विचलित किया कि वह अपने आँसू नहीं रोक पाए। इंदिरा जी भी सिर झुकाकर निशब्द खड़ी रहीं। उस पल, लाखों लोगों के हृदय में दबे बँटवारे का पूरा दर्द ख़ान साहब की इस बात से बाहर आ गया।
1985: पोटली का रहस्य और फ़क़ीरी का शिखर
सोलह वर्ष बाद, 1985 में, कांग्रेस की स्थापना शताब्दी के अवसर पर, तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें विशेष अतिथि के रूप में पुनः आमंत्रित किया। इसके लिए उन्हें तत्कालीन पाकिस्तानी तानाशाह ज़िया उल हक़ से इजाज़त लेनी पड़ी थी, जो भारत और बादशाह ख़ान के बीच के अटूट रिश्ते को तोड़ने में विफल रहे थे।
जब बादशाह ख़ान भारत आए, तब भी उनके हाथों में वही पोटली थी। राजीव गांधी, जो इस पोटली के इतिहास को जानते थे, ने एक पुत्रवत आग्रह किया। उन्होंने कहा कि आपने महात्मा गांधी और इंदिरा जी को भी इसे हाथ नहीं लगाने दिया, लेकिन अगर आप चाहें, तो क्या मैं इसे खोलकर देख सकता हूँ?
बादशाह ख़ान हँसे। उनकी हँसी में वर्षों का संघर्ष, थकान और गहरी सादगी थी। अपने सहज, पठानी अंदाज़ में उन्होंने कहा, “तु तो हमारा बच्चा है… देख ले… नहीं तो सभी सोचते होंगे पता नहीं बादशाह इस पोटली में क्या छुपाए फिरता है।”
राजीव गांधी ने जब पोटली खोली, तो रहस्य खुल गया। उसमें सिर्फ़ दो जोड़ी लाल कुर्ता-पाजामा थे।
इस दृश्य ने सादगी की परिभाषा को ही बदल दिया। यह व्यक्ति, जो पख़्तून के एक सम्मानित ज़मींदार का बेटा था और जिसकी औपचारिक शिक्षा अलीगढ़ विश्वविद्यालय से हुई थी; जिसका भाई लंदन से डॉक्टर बनकर आया था और बाद में पख़्तून का मुख्यमंत्री बना, वह अपनी पूरी जीवन-यात्रा में मात्र दो जोड़ी कपड़ों पर निर्भर रहा।
यह उनकी सादगी का चरम था। उनका नाम तो ‘बादशाह ख़ान’ था, लेकिन उनकी जीवनशैली एक सच्चे फ़क़ीर की थी, जो भौतिकता को तुच्छ मानता था और जिसने अपना सर्वस्व देश और सिद्धांतों के लिए न्योछावर कर दिया था।
भारत के साथ अटूट रिश्ता: खुदाई खिदमतगार
ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान का भारत और महात्मा गांधी के साथ रिश्ता किसी समझौते पर आधारित नहीं, बल्कि आत्मा और सिद्धांत की साझेदारी पर टिका था।
1. अहिंसा का क्रांतिकारी पाठ
पख़्तून, या पठान, अपनी बहादुरी, लड़ने की क्षमता और इज़्ज़त के लिए जान देने की संस्कृति के लिए जाने जाते थे। बादशाह ख़ान ने इसी समुदाय में अहिंसा के सिद्धांत का बीजारोपण किया। यह एक क्रांतिकारी कदम था। उन्होंने 1929 में ‘ख़ुदाई ख़िदमतगार’ (ईश्वर के सेवक) नामक स्वयंसेवी संगठन की स्थापना की।
इन सेवकों को ‘सुरख़ पोश’ (लाल शर्ट वाले) भी कहा जाता था। उनका लाल लिबास गरीबी, बलिदान और क्रांति का प्रतीक था। बादशाह ख़ान ने अपने अनुयायियों को एक कठोर शपथ दिलाई थी:-वे किसी भी कीमत पर अहिंसा का पालन करेंगे।
वे किसी पर गोली नहीं चलाएँगे, न ही बदले की भावना रखेंगे।
वे निर्भय होकर अंग्रेज़ों के अत्याचारों का सामना करेंगे।
वे अपना जीवन ईश्वर और मनुष्य की सेवा में समर्पित करेंगे।
यह संगठन अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ़ सबसे शक्तिशाली और संगठित अहिंसक सेनाओं में से एक बन गया। उनकी निहत्थी बहादुरी ने कई बार ब्रिटिश सेना को अचंभित और निराश किया। उनका संघर्ष सीधे तौर पर महात्मा गांधी के राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ा था।
2. विभाजन का गहरा विरोध
बादशाह ख़ान महात्मा गांधी के साथ खड़े होकर, जीवन के अंत तक, भारत के विभाजन के सबसे बड़े विरोधी रहे। उनका मानना था कि विभाजन एक आत्मघाती कदम है जो धर्म के नाम पर भाई को भाई से अलग कर देगा। उन्होंने कांग्रेस पर भी उस समय दबाव में आकर विभाजन को स्वीकार करने के लिए कड़ा असंतोष व्यक्त किया।
उनका दर्द तब और गहरा हो गया जब विभाजन के बाद उन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध नवगठित पाकिस्तान का नागरिक बनना पड़ा। उन्होंने महसूस किया कि उन्हें उन्हीं ताकतों के हाथों सौंप दिया गया है जिनका उन्होंने जीवन भर विरोध किया।
सादगी को मिला सर्वोच्च सम्मान
उनका शेष जीवन पाकिस्तान की विभिन्न जेलों में बीता, जहाँ की सत्ता उन्हें कभी स्वीकार नहीं कर पाई। वह भारत को अपनी मातृभूमि और गांधी को अपना गुरु मानते रहे।
1987 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने उनकी सेवाओं, सिद्धांतों और भारत के साथ उनके भावनात्मक रिश्ते के सम्मान में, उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाज़ा। यह सम्मान उन्हें भारतीय राष्ट्र की ओर से उनके उस प्रेम, त्याग और बलिदान के लिए दिया गया, जिसे विभाजन की रेखा भी मिटा नहीं पाई।
उनकी कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची महानता बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि भीतर की शुचिता, सादगी, और सिद्धांतों के प्रति अटूट निष्ठा में निहित है। एक बादशाह का बेटा, जो फ़क़ीरी की तरह तमाम उम्र सिर्फ़ दो जोड़ी कुर्ता-पाजामा के साथ ज़िन्दगी गुज़ार देता है, वह हमें बताता है कि जीवन में सबसे मूल्यवान वस्तु भौतिक सम्पत्ति नहीं, बल्कि नैतिक बल और मानव प्रेम होता है।
सीमांत गांधी की वह पोटली आज भी एक मौन संदेश दे रही है—कि त्याग ही सबसे बड़ा धन है और सादगी ही सबसे बड़ा श्रृंगार। उस महान शख्सियत को हमारा शत-शत सलाम, जिसने विभाजन का दर्द सहा, पर सिद्धांतों का दामन कभी नहीं छोड़ा।
