बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगाना देश के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। 11 दिसंबर 2025 को, यह घटनाक्रम विश्व स्तरीय सुर्खियों में रहा, जिसने बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में चल रही उथल-पुथल को उजागर किया।
जमात-ए-इस्लामी, जो देश की सबसे बड़ी इस्लामी राजनीतिक पार्टी रही है, पर पहले भी कई बार प्रतिबंध लगाया गया है। हालांकि, अंतरिम सरकार के दौरान, इस प्रतिबंध को हटा दिया गया था, जिससे यह पार्टी फिर से सक्रिय हो गई थी। इस बार का प्रतिबंध देश में मौजूदा राजनीतिक अनिश्चितता और बढ़ती हिंसा की पृष्ठभूमि में आया है।
पृष्ठभूमि और प्रभाव
जमात-ए-इस्लामी पर आरोप लगते रहे हैं कि इसके कुछ सदस्य और सहयोगी संगठन उग्रवादी और हिंसक गतिविधियों में शामिल हैं। इसके अलावा, 1971 के मुक्ति संग्राम में इसकी भूमिका को लेकर भी विवाद रहा है। पूर्व प्रधान मंत्री शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद, देश में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी है। खबरों के अनुसार, हाल के दिनों में अल्पसंख्यकों पर हमलों की घटनाओं में वृद्धि हुई है, जिसके पीछे कुछ इस्लामिक समूहों का हाथ होने का आरोप लगाया गया है, जिनमें कथित तौर पर जमात-ए-इस्लामी से जुड़े लोग भी शामिल हैं।
इस प्रतिबंध को अंतरिम सरकार द्वारा जन सुरक्षा के लिए खतरा और आतंकवाद-रोधी कानून के तहत उठाया गया एक कड़ा कदम माना जा सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि यह निर्णय आगामी चुनावों से पहले राजनीतिक माहौल को और जटिल बना सकता है।
जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध से देश में इस्लामी दलों की विरोध राजनीति पर गहरा असर पड़ सकता है, जिससे राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।इस कदम से बांग्लादेश में अस्थिरता और विरोध प्रदर्शन बढ़ने की आशंका है। सरकार को जहां एक ओर सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती होगी, वहीं दूसरी ओर विपक्षी दल इसे राजनीतिक प्रतिशोध के रूप में देख सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय इस घटनाक्रम पर करीब से नज़र रखे हुए है, क्योंकि यह बांग्लादेश के लोकतांत्रिक भविष्य और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।
