नारायण सिंह जैसे लेखक इस सृजनशील परिवेश की शुद्धतम मिसाल थे, जिन्होंने ‘कोयला संस्कृति’ की सामाजिक-आर्थिक क्रूरता के साथ उसकी मानवीयता को भी अभिव्यक्त किया और साहित्य के राष्ट्रव्यापी मंच पर कोयलांचल को सम्मान दिलाया। उनकी कहानियों में कोयला खदानों के श्रमिक जीवन की प्रामाणिकता, नैतिकता और संघर्षों को पहली बार साहित्य ने नई परिभाषा दी।
(विनोद आनंद)
ध नबाद के कोयलांचल की पहचान यदि एक तरफ कोयले की काली धूल, माफियाओं की दुनिया और ‘वासेपुर’ की गैंगवार से जुड़ी है, तो दूसरी तरफ़ यहां का साहित्यिक, बौद्धिक और रचनात्मक माहौल राष्ट्रव्यापी पहचान रखता है। इसी सृजनशील धारा के एक सशक्त स्तंभ, कथाकार, उपन्यासकार, आलोचक और अनुवादक नारायण सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे।
उनके निधन की खबर ने सम्पूर्ण साहित्यिक जगत को मर्माहत कर दिया है। वे धनबाद के साहित्यिक संसार में नव ऊर्जा और प्रतिबद्धता का पर्याय थे। उनकी रचनाएँ, उनका व्यक्तित्व और उनका योगदान साहित्यिक जगत के लिए सदैव अविस्मरणीय रहेगा।
लेखक के रूप में, उनसे कई बार मुलाक़ात हुई, मेरी पत्रिका ‘अंतर्कथा’ के लिए उनका रचनात्मक और लेखकीय सहयोग भी मिला, और कवि-आलोचक तथा ‘साहित्य सेतु’ पत्रिका के सम्पादक स्व. अमिताभ चक्रवर्ती के कारण भी कई बार भेंट हुई। उनके निधन की खबर के बाद बार-बार उनका वह आत्मीय चेहरा मानस पटल पर घूम रहा है।
नारायण सिंह का जन्म 30 जनवरी 1952 को धनबाद, झारखंड में हुआ था। हिंदी साहित्य की सघन भूमि से निकले नारायण सिंह ने अपना जीवन मूल्य, श्रम और संवेदना के अनुभवों को शब्दबद्ध करने में समर्पित कर दिया। वे मूलतः एक कथाकार थे, किंतु उनकी सृजनात्मक ऊर्जा उपन्यास, आलोचना और अनुवाद के क्षेत्र में भी समान रूप से प्रवाहित होती रही।
उनकी साहित्यिक पहचान की नींव उनकी चर्चित कहानी ‘अजगर’ (हंस पत्रिका) से रखी गई, जिसने न केवल उन्हें कथात्मकता का नया स्वर दिया, बल्कि समकालीन हिंदी साहित्य में भी ‘धनबाद स्कूल’ की एक सशक्त उपस्थिति रच दी थी।
कोयलांचल की आग और मानवीय जिजीविषा
नारायण सिंह की रचनाओं में कोयलांचल के श्रमिकों की पीड़ा, विस्थापन, अस्तित्व-संघर्ष, कोल-कटाव, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, अकाल, श्रमिक राजनीति और सामाजिक विडंबनाओं का गहरा चित्रण मिलता है। साथ ही, उनकी कहानियों में मानवीय जिजीविषा का सशक्त संकल्प भी परिलक्षित होता है। वे उन साहित्यकारों में थे जिन्होंने आध्यात्मिक साहित्य को भी तर्क और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा।
उनकी भाषा सहज और संप्रेषणीय थी, पर रचनात्मकता इतनी गहरी कि पाठक को ठहरकर सोचने पर विवश करती थी।
प्रमुख कृतियाँ:
कहानी संग्रह: तीसरा आदमी, पानी तथा अन्य कहानियाँ, माफ करो वासुदेव
उपन्यास: ये धुआं कहाँ से उठता है
आलोचना: सीता बनाम राम, सुन मेरे बंधु रे, फुटपाथ के सवाल
अनुवाद: गांधीवादी श्रमिक नेता कांति मेहता की आत्मकथा ‘मेरा जीवन, मेरी कहानी’ का हिंदी अनुवाद।
धनबाद के साहित्य-जगत में उनकी छवि एक प्रतिबद्ध और समर्पित कथाकार की रही। उनके योगदान को देखते हुए उन्हें 34 वाँ राधाकृष्ण पुरस्कार ‘समग्र साहित्य सेवा’ के लिए प्रदान किया गया था। उनकी रचनाएँ कई भारतीय भाषाओं तथा अंग्रेज़ी में अनूदित हुईं, जिससे धनबाद और झारखंड की श्रमिक-संस्कृति को राष्ट्रीय मंच मिला।
आत्मीयता का तेज और युवा लेखकों के प्रेरणास्रोत
नारायण सिंह का व्यक्तित्व जितना सादा, उतना ही आत्मीय और तेजस्वी था। वे हँसमुख, उदार, मिलनसार, और अपने जूनियर रचनाकारों के प्रति अत्यंत प्रेरणादायक थे। वे नए लेखकों को निरंतर प्रोत्साहित करते रहे। उन्होंने अपने जीवन के मिले-जुले अनुभवों को पूरी निष्ठा और संवेदना के साथ साहित्य में ढाला।
स्व. अमिताभ चक्रवर्ती और अन्य साहित्यकारों के बीच उनकी छवि, एक पुराने यार की तरह थी जो रचनात्मक सहयोग के लिए सदा सक्रिय रहते। उनके संपादकत्व में निकलने वाली ‘कोयला भारती’ पत्रिका ने सैकड़ों साहित्यकारों को मंच प्रदान किया।
नारायण सिंह जैसे लेखक इस सृजनशील परिवेश की शुद्धतम मिसाल थे, जिन्होंने ‘कोयला संस्कृति’ की सामाजिक-आर्थिक क्रूरता के साथ उसकी मानवीयता को भी अभिव्यक्त किया और साहित्य के राष्ट्रव्यापी मंच पर कोयलांचल को सम्मान दिलाया। उनकी कहानियों में कोयला खदानों के श्रमिक जीवन की प्रामाणिकता, नैतिकता और संघर्षों को पहली बार साहित्य ने नई परिभाषा दी।
केवल कलम ही उनका औजार नहीं थी। धनबाद के बोर्रागढ़ रिक्रिएशन क्लब (WRC) जैसी खेल-संस्थाओं के संचालन में भी वे उतनी ही निष्ठा से लगे। अस्सी-नब्बे के दशक में वे यहाँ के क्रिकेट जीवन का भी बड़ा नाम थे, जिसने सांस्कृतिक और खेल गतिविधियों में नई ऊर्जा दी।
2012 में भारत कोकिंग कोल लिमिटेड से सेवानिवृत्ति के बाद वे स्वतंत्र लेखन में जुटे, जिससे धनबाद का साहित्यिक जीवन एक नई दिशा में आगे बढ़ा।
एक सृजनशील जलधारा पर विराम
लंबी बीमारी के बाद 73 वर्ष की आयु में, पुणे में उनका निधन सम्पूर्ण कोयलांचल में गहरे शोक का कारण बना। अनवर शमीम, कुमार अशोक, लालदीप, श्याम बिहारी श्यामल, अली इमाम खान जैसे साहित्यकारों ने उनके निधन पर दुख व्यक्त किया और स्वीकारा कि उनकी रचनाएँ फौरी सनसनी नहीं, बल्कि समय की कसौटी पर खरी संवेदना हैं।
नारायण सिंह का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, यह उस सृजनशील जलधारा पर विराम है, जिसके बिना धनबाद की साहित्यिक रचनाशीलता की कल्पना अधूरी रहेगी।
उनके लेखन में सामाजिक चेतना, जनप्रतिबद्धता और सृजनात्मक-जागरण का विलक्षण उदाहरण मिलता है। उनके जाने से धनबाद ने केवल एक साहित्यकार ही नहीं, अपनी आत्मा के एक सशक्त सृजनात्मक स्वर को खो दिया है।
नारायण सिंह को उनकी रचनाओं, उनके समाजोपयोगी चिंतन, साहित्य सेवा और सहृदय प्रेरणा-शक्ति के लिए कृतज्ञ श्रद्धांजलि। वे जितनी बार स्मरण किए जाएँगे, उतनी बार कोयलांचल की सृजनात्मक जिन्दगी में साहित्य का नव काफिला गुजरता रहेगा।
