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डा. तेजस्विनी दीपक पाटील की तीन कविताएं

Byadmin

Dec 1, 2021
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डॉ तेजस्वनी दीपक पाटिल महाराष्ट्र सांगली स्थित कसेगांव के आर्ट्स एन्ड कॉमर्स कॉलेज में अंग्रेजी विभाग में अध्यापन कार्य से जुड़ी हैं।ये देश विदेश में अपने लेखन कार्यों सम्मानित हो चुकी है। अंतर्कथा के लिए इन्होंने तीन कविताएं भेजी है। इनकी कविताओं में जीवन से जुड़े उन भावों को शब्दों में पिरोया गया है जो आम लोगों की अपनी बात सी महसूस होती हैयह कविता हमें हमारे साहित्य प्रतिनिधि राजीव कुमार झा के सौजन्य से प्राप्त हुआ है । पढिये इनकी कविताएं:- सम्पादक

परिचय:-

डा. तेजस्विनी दीपक पाटील
आर्टस् एंड कॅामर्स कॅालेज कासेगाव साऺगली, महाराष्ट्र में अंग्रेजी की विभाग प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं।ये त्रै -भाषिक कवयित्रि हैं। इनकी  अंग्रेजी भाषा में तीन कविता संग्रह Talons and Nets, Verses of Silence, एवं A Glass of Time प्रकाशित हो चुकी हैं।

जिस में एक रोमानियन भाषा में अनुदित हो चुकी है।
आप की अंग्रेजी कविताएँ भारत, इंग्लैंड, अमेरिका, साऊथ आफ्रिका आदि देशों से प्रकाशित कविता संग्रहों में समाविष्ट की जा चुकी हैं।

इनका हिन्दी कविता संग्रह ‘कायनात’ के शीर्षक से प्रकाशित है। आप की मराठी कविताएँ प्रातिनिधि कविता संग्रहों में तथा पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। इन के अलावा इनकी एक समीक्षा पुस्तक भी Relations and Relationship शीर्षक से प्रकाशित है।

ये तीन आंतर्राष्ट्रीय, एक राष्ट्रीय तथा दो राज्य स्तरीय पुरस्कारों से सम्मानित है।

ये आंतर्राष्ट्रीय मासिक पत्रिका, Innsaei, An International Journal of Creative Literature for  Peace and Humanity की स॑स्थापक स॑चालक‌ है।

कविताएं

1- मेरी कलम

मेरी कलम कागज़ पर
स्याही रिसनेवाली साधन मात्र क्यों है ?

मेरी पीड़ा, मेरा दुख क्यों नहीं उतरता,
उस की नोंक से
जो सालों से मन को झुलसता आया है,

समय के अलाव पर ?
क्यों नहीं बरसती वो आग कागज़ के टुकडों पर
जिस में मेरी अंतरात्मा राख हो गई है, कितनी बार ?

मेरी सिसकियां, मेरे आँसू,
जिन में तूफान भरा पड़ा है,
क्यों नहीं उमड़ता उन रेखाओं में?

जो किताबें अपने आप को
उतार चुकी हैं मस्तिष्क में,
वो क्यों हैं शक्तिहीन
इस धरातल पर बदलाव लाने हेतु
उस स्याही को गाढ़ा करने के लिए?
क्यों? कब तक?

 

2 – देहरी

उस देहरी के बाहर कदम रखा,
और इस देहरी के अंदर आ गई।
इन के बीच एक खुला आँगन भी होता है,

खुले आकाश के नीचे,
पता ही नहीं चला।
खिडकी से आवाज़ें आती है
धुवाँधार बारिश की,
और तेज हवाओं की भी।

कभी कभी कोई सुरीली धुन,
या मिट्टी की सौंधी सी खूशबू भी बेकरार कर देती है,
इस देहरी को लाँघकर जाने के लिए।

कभी कोई सुंदर सी तितली
इतराकर जाती है, आसपास
और छोड़ जाती है
इत्र की बूँदे, मेरी हथेली पर
जो नींद में भी महकती रहती हैं,
और एहसास दिलाती है,
देहरी की ऊंचाई का,
हर साँस के साथ।

3 – वक्त के साथ तुम,

वक्त के साथ तुम,
निर्लिप्त से आगे निकल जाते हो।
और मैं, अतीत की सिलवटों में
पड़ी रहती हूँ, गुमसुम।

बहते रहते हो तुम उस असीम तक
बिना पीछे मुड़कर देखते हुए।
और मैं, एक किनारे पर बंधी हुई
कश्ती की तरह, गुमनाम।

बाँसुरी की धुन जैसे
बस जाते हो तुम,
जंगल के हरेक फूल और पत्तेपर।
और मैं, तितली की तरह
इतराती रहती हूँ
उसी फूल पर
जिसे चूमकर निकले थे तुम उस पार

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