• Tue. Jul 23rd, 2024

वर्तमान दौर का जीवन संकट और इसके रोजनामचे के रूप में लिखी गयी कवितायें ! . .

Byadmin

Jan 1, 2022
Please share this News

साहित्य सृजन :

*मिसफिट कवितायें ‘ ‘ के बारे में भी ऐसा कहा जा सकता है . यहाँ भाव विचार के निकष पर इस कविता संकलन की समीक्षा को प्रस्तुत कर रहे हैं . . . राजीव कुमार झा

पुस्तक समीक्षा । मिसफिट कवितायें ( कविता संकलन ) । कवयित्री : पूनम सूद । प्रकाशक : Notion Press , Old No . 38 , New No , 6 , MeNichols Road , Chetpet , Chennai – 600031 । मूल्य ₹ 195

कवयित्री का परिचय :

कवियत्री :- पूनम सूद,
जन्म : 16 मार्च 1965 ।

बाल्यावस्था से ही साहित्य से प्रेम आपने मराठी लेखक डा . भवान महाजन की पुस्तक ‘ मित्र जिवाचे ‘ का ‘ सालमेट्स ‘ के नाम से अँग्रेजी अनुवाद किया ।

कहानी संग्रह प्रकाशनाधीन । गुलजार साहित्य समिति की संस्थापक अध्यक्ष के रूप में साहित्य सेवा।
अयोध्या में निवास ।

समीक्षा

सुपरिचित कवयित्री पूनम सूद की कविता संकलन ‘ ‘ मिसफिट कवितायें ‘ ‘ में संग्रहित ज्यादातर कविताओं में बेहद सजगता से वर्तमान समय और समाज के बदलते परिदृश्य को लेकर चिंतन का समावेश है और विमर्श की शैली में इन कविताओं के बीच यथार्थ के रूप में संस्कृति से जुड़ी अनगिनत बातें यहाँ कविता की भाषा में भाव – विचार का रूप ग्रहण करती दिखायी देती हैं .

जीवन में आत्मिक प्रेम और सच्चे मानवीय प्रेम की तलाश में रची गयी इन कविताओं में सभ्यता – संस्कृति के वर्तमान अनपेक्षित कोलाहल में समय का तल्ख यथार्थ बार – बार करवटें बदलता प्रकट होता है और यहाँ जीवन के यांत्रिक साँचे से बाहर नैसर्गिक लय और तान में जीवन में चतुर्दिक पसरते झूठ आडंबर छल और बनावटीपन से निरंतर मुठभेड़ करती अपनी सार्थकता को सामने लाती है .

इन कविताओं को विचार कविता की कोटि में भी रखना समीचीन होगा और इनकी ओट में कवयित्री का असीम भावों से परिपूर्ण मनप्राण कविता में जीवन की आहट को चरितार्थ करता विस्मित करता है .

हमारा जीवन निरंतर संकटों से घिरता जा रहा है और विसंगतियों से घिरते समाज में ये कविताएँ जीवनमूल्यों की तलाश में लिखी कविताएँ हैं और इनमें परंपरा और आधुनिकता का समन्वय जीवन की दिशा को तलाशता सबको कई सवालों के पास ले जाता है ! समाज में सर्वत्र बाजारवाद , उपभोक्तावाद और भौतिक लिप्साओं की आपाधापी में जीवन के टूटते बिखरते रेशों धागों को जतन से जोड़ती सँवारती इन कविताओं में सबके प्रति गहरे अपनत्व का समावेश है।और दार्शनिक धरातल पर प्रासंगिक प्रश्नों को इन कविताओं में जीवन की बोलचाल की भाव भाषा में प्रस्तुत किया गया है ! लोक समाज संस्कृति के प्रति भी इनमें सच्चा राग विराग प्रवाहित हुआ है.

जीवन की सम – विषम परिस्थितियों में समाज और संस्कृति से संवाद समकालीन कविता का प्रमुख गुण वैशिष्ट्य माना जाता है और इस दृष्टि से अपनी लय तान में कविता मानवीय धरातल पर शोषण , उत्पीड़न , विवशता और आम आदमी के जीवन के यथार्थ पर भी प्रमुखता से दृष्टिपात करती है, तो हृदय के सहज तल से फूटता संवेगों का बारहमासी सोता कविता को कई दिशाओं में जीवनोन्मुख करता है।

यहाँ रोजमर्रा के कठिन जीवन में पिसते आदमी की तस्वीर भी समाज में साफ – साफ दिखायी देने लगती है ! इस रचनाभूमि पर प्रस्तुत कविता संकलन की कई कविताएँ पठनीय हैं और इनमें स्मृति – विस्मृति के धरातल पर जीवन के स्वर का आत्मिक स्पंदन चेतना को गतिशील कर देता है !

‘ ‘ यह कैमरा , वीडियो / क्या जाने गरिमा रिश्तों की . . ./ पहली नजर के प्यार की , / प्रियतम के गिरे रूमाल की / इनकी यादें खुलती हैं / सी डी , पेन ड्राइव , एल्बम के चलने से / हम जीते हैं पल सुहाने / बस , आँख मूँद लेने से . . .

( फोटोग्राफी )

‘ ‘ फरमाइश / गीतों की बहार / काव्य की फुहार / नाट्य , शायरी , गजल की . . ./ असुंदरता की पीड़ा , / अज्ञानता का दर्द / असहनीयता वेदना की / नुमाइश , प्रदर्शनी , / फरमाइश नहीं होती , / होती है केवल / आजमाइश ‘

‘ ( नुमाइश )

‘ ‘ कविता आज भूल चुकी है / परिकल्पनाओं की उड़ान / वो परियों का देश / सितारों का जहान / कविता रहती है , डरी सहमी / अपने निज बाड़े में / यथार्थ के वायरस से ग्रसित / आतंक के तनाव में ले रही है साँस / आज की कविता . . .’

‘ ( यथार्थ फ्लू )

‘ ‘ सब हैं खामोश . . . / पता नहीं कब , कहाँ / किस दिशा में . . ./ अब जागती – सोती हूँ / अपना एकाकीपन / तुम्हारी पसंद से जीती हूँ / जब से तुम मुझको छोड़ / अलग रहने लगे हो . .

.( डायवोर्स )

‘ ‘ उसने आज जिंदगी के वो / सब नजारे देखेंगे जो / शहर की चकाचौंध में गुम हो गये / और वो वादी / जहाँ दूर चरवाहों की बस्ती से आती / बाँसुरी की आवाज / बूढ़ी होती शाम को / सुरमयी बनाती , / जहाँ छह – सात गाँववासी / उदासी का कंबल ओढ़े / कांगड़ी की बची खुची आँच से / जिंदगी सहलाते हैं . . .

( शहर से दूर )

आज के दौर में फिटनेस को लेकर समाज में आदमी की जिंदगी भीतर – बाहर से निरंतर उसके मन की पसंदगी और नापसंदगी को प्रकट करती प्रतीत होती है और इसमें कई बार अनफिटनेस की जगह मिसफिटनेस का भाव अक्सर जीवन में अनपेक्षित रूप से समाती चीजों की जद्दोजहालत में भी हमें आबद्ध करती प्रकट होती रहती हैं ! इनसे फिटनेस की जुड़ी बातें शायद सबके लिए असामंजस्यपूर्ण होती हैं लेकिन जीवन को निरंतर रचने और गढ़ने में तल्लीन रहने वाले आदमी को मिसफिटनेस की इन स्थितियों में असंतोष और क्षोभ के भावों से गुजरने का मौका जरूर मिल जाता है ! कविता में जीवन की मौजूदा परिस्थितियों में व्यंग्य की लाक्षणिक शैली में कई तरह की बातें रोज कही और सुनी जा रही हैं ! कवयित्री पूनम सूद के कविता संकलन ‘ ‘

डायवोर्स के बाद भी प्रेम की अनंतिम आहट में उदासी की आहट को सुनती औरत का अकेलापन , आधुनिकता की झूठी बयार में चविंगम की तरह सबके मुँह में घुलते जीवन के संस्कार और इस सबके बीच घर के आँगन में अक्सर याद आने वाली बचपन की लाल साबुदानी , वीकेंड मनाने के बाद रास्ते की चुप्पी में अगले पाँच दिनों की ऊब की शेष बची आहट को सुनना और साहब के गुजर जाने के बाद काले चश्मे के भीतर आँसू बहाती मेम साहब के साये में किसी दिन सर्वेंट क्वार्टर के बाहर माली की असमय मृत्यु के साथ देह लिपटकर रोते बिलखते बाल बच्चों के बीच उसकी पत्नी की चीत्कार के साथ शहर की चकाचौंध से बाहर कवयित्री के कानों में दूर चरवाहों की बस्ती से आकर सुनायी देती बाँसुरी की आवाज कविता के फलक पर जिंदगी के यथार्थ के कई आयामों को उकेरते हैं ! कवयित्री कविता के इस कैनवास पर संवेदना और अनुभूति के रंगों को सहजता से भरती दिखायी देती है .

समसामयिक परिवेश से उभरे सवाल मनोगत रूप में जब किसी प्रतिक्रिया के साथ समाज और इसके परिवेश की इन चीजों को लेकर रचनात्मक उपक्रम का रूप ग्रहण करते हैं तो स्वाभावत: कविता अपनी भाव , भाषा और शिल्प को रचने – गढ़ने में कठिन चुनौती से गुजरती दिखायी देती है और पूनम सूद की इन कविताओं में जीवनानुभवों को शब्दबद्ध करने की प्रक्रिया में इन सबका समावेश साफ – साफ देखा – समझा जा सकता है ! इस संग्रह में छोटी और बड़ी इन दोनों ही कोटियों की कविताएँ संकलित हैं और कई बार कथातत्वों का संयोजन भी इन कविताओं में हुआ है .

‘ ‘ कभी सोचा न था / रोटी माडलिंग की दुनिया में / उतर आएगी / कीमती पकवानों की पोशाकें / चटनी , सलादों से अलंकृत / चाँदी की डिजायनर थालियों में सजी / खुलेआम सबको लुभाएगी / घी से तर देह करेगी प्रदर्शित / तो कभी / फुटपाथ के रैंप पर / रुखी , सूखी , नग्न / कैटवाक करती नजर आएगी / हाई सोसायटी के / अधरों को चूमते हुए / पेट की आग बुझाएगी / पर गरीब की भूख को / आँख मारती हुई / करीब से गुजर जाएगी । ‘ ‘
रोटी )

‘ ‘ वक्त बीतते . . . / दोनों अपने मूल स्वभाव में / आने लगे / प्रेम में होते हुए / दूर अलग रहने लगे / लोग समझाते , / आपसी सहमति से / तलाक क्यों नहीं पा लेते ? / पर क्या . . . / आपसी सहमति से रिश्ते नहीं / निभाये जा सकते ? (म्यूचुअल कांसेंट )

कविता में यथार्थ का समावेश आत्मिक धरातल पर जीवन के सूक्ष्म और स्थूल तत्वों की विवेचना में अक्सर हमारी विवेचना में सामाजिक विसंगतियों को समेटता है और मानवीय संवेदना के सहज राग विराग से गुजरती कविता नदी की तरह से अपने मन के पाटों पर जिस आत्मलोक को गढ़ती दिखायी देती है , यहाँ यथार्थ और कल्पना के बीच जीवन के सारे द्वंद्व सर्जना की भावभूमि पर एकमेक होकर कविता में शब्दों को शाश्वत बना देते हैं !

पूनम सूद की कविताओं में समय का सन्नाटा और इसका शोर इन दोनों को एक साथ सुनना और इनके बीच आकर कवयित्री के साथ जीवन की कुछ सार्थक चर्चाओं में शरीक होना कविता की रचना प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य कहा जा सकता है और इसमें आधुनिक भौतिक संस्कृति की आपाधापी और उसकी ओट में खड़ी स्वार्थ , समृद्धि , भोग के बरक्स जीवन में संयम , सरलता और सादगी का पाठ रचती इन कविताओं में भारतीय जीवन संस्कृति का सदियों पुराना स्वर सबकी आत्मा में फिर से नयी आशा और आस्था के भाव को गढ़ता है और यहाँ अक्सर कवयित्री के साथ उसका बचपन और शहर के साथ गाँव भूले बिसरे दिन के बीच दस्तक देती यादें बीते समय के साथ जीवन की दहलीज पर दस्तक देते वक्त का अटूट हिस्सा बनकर कविता में जीवन के तमाम अक्सों को सँजोकर इसे यादगार बनाती हैं !

  • पूनम सूद की कविताएँ अपने अर्थफलक पर जिंदगी के सच और झूठ का बयान काफी साफगोई से करती हैं और इसके बीच जो उन्हें सब कुछ देखते – जीते जो कुछ भी अर्थवान मालूम होता है किसी आपसी बातचीत के सारांश के रूप में यह उनकी कविता का हिस्सा बन जाता है , यहाँ इसलिए कवयित्री संसार की बेहद चिर परिचित बातों में जो उल्लेखनीय हैं , कविता की इस दुनिया में ये सारी चीजें किसी वसीयत की तरह से यहाँ दर्ज हुई हैं ! इसे चिंतन के विरासत के रूप में देखना समीचीन है !

कविता में जीवन जब कुछ पाने के उपक्रम से परे हटकर उसमें सोच , विचार – विमर्श के तत्वों को सँजोने की चेष्टा को प्रकट करती है तो यहाँ समाज और संस्कृति के साथ उसकी प्रतिबद्धता तो प्रकट होती ही है , वह चिंतन के क्षितिज पर कविता की भाव भंगिमा को नया रूप और विस्तार भी देती है . पूनम सूद की इन कविताओं को पढ़ते हुए कविता के बारे में इस प्रकार की बातें सच होती लगती हैं .

समाज में नारी जीवन के कठोर यथार्थ को भी मार्मिकता से कवयित्री ने इस संग्रह की कुछ कविताओं में उकेरा है और यहाँ पुरुष की चिरसंगिनी के रूप में वह उससे समर्पण के प्रतिदान में सर्वस्व अर्पण की अपेक्षा के साथ जीवन को सुख – शांति से पूर्ण करना चाहती है !

आत्मपीड़ा जब जीवनानुभूतियों के भीतर से प्रकट होती है तो कविता अपने सामाजिक सरोकारों को निकटता से प्रकट करती संवेदना और अनुभूति की ऐसी भावभूमि को रचने – गढ़ने में तल्लीन हो जाती है जिसके यथार्थ में रचनाकार का मनप्राण अपने आईने में जीवन के तमाम रंगों को बखूबी समेटता है और जीवन के इस आईने की साफ , धुँधली चमक में हर मौसम की खूबसूरती उसकी आवाजाही इस संग्रह की कविताओं में दस्तक देती मन को अभिभूत करती है !

अपनी कविताओं में समय और समाज के स्पंदन से जीवन यथार्थ को कविता में प्रकट करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है जिसे इन कविताओं में संभव होता देखा जा सकता है और कला के रूप में कविता की सरल भाव भाषा इसमें अभिव्यक्ति को निरंतर प्रभावी बनाती उसमें संवाद का गुणधर्म प्रदान करती है !
प्रकृति के सानिध्य में नारी मन के भावों को सहजता से कविता के पन्नों पर उकेरती इन कविताओं में वर्तमान भौतिक संस्कृति की कृत्रिम चकाचौंध में उदासी , ऊब और बेचैनी की मन: स्थितियों को कई कोणों से उजागर करती पूनम सूद की कविताएँ अपनी विचारशीलता और भावप्रवणता से संवेदना पर अमिट प्रभाव डालती हैं और आत्मचिंतन की प्रेरणा देती हैं ! इसे इनके सृजन की सार्थकता के रूप में सदैव देखा समझा जा सकता है !

पूनम सूद की कविताओं में समाज – संस्कृति , परिवेश , प्रकृति और जनजीवन और यहाँ तमाम तरह के लौकिक कार्य व्यापारों के संदर्भ में चिंतन की ओर प्रवृत्ति उजागर होती है और यहाँ कविता अपने इस अनंतिम रूप में आत्मिक संवाद की एक मजबूत कड़ी के रूप में रचना के भीतर जो कुछ भी प्रकट करती है , वैचारिक स्तर पर इसे नारी विमर्श का भी एक अध्याय माना जाना चाहिए !

हमारे वर्तमान दौर का आपाधापी से भरा जीवन और इसमें रोजनामचे के रूप में दस्तक देती विडंबनाएँ और जीवन के निरंतर बिखरते सूत्रों को कविता जब संवेदना के धरातल पर जोड़ने का यत्न करती है तो उसे अभिव्यक्ति के फलक पर तमाम भटकावों से बचकर अपना रास्ता गढ़ना होता है ! पूनम सूद की इन कविताएँ इस प्रक्रिया के प्रमाण के रूप में देखी जा सकती हैं !

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *