• Tue. Jul 23rd, 2024

कौत्स की गुरु दक्षिणा’ के बहाने कवि ने की है शिक्षा के मूल्यों की खोज

Byadmin

Oct 20, 2021
Please share this News

पुस्तक समीक्षा

समीक्षक :- गणेश चंद्र राही

समीक्षित पुस्तक: – कौत्स की गुरु दक्षिणा
प्रकाशक:  -भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली
कवि :  –     सुशील भारती

कवि परिचय:-

पत्रकार, साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता  सुशील भारती जी प्रभात खबर रांची में सम्पादकीय विभाग में वरिष्ट सम्पादक के रूप में कार्यरत हैं।पिछले तीन दशक से पत्रकारिता के साथ हीं सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहे हैं.मूलतः बिहार के दरभंगा जिला से हैं । नेपाल क्रांति में भी इनकी भागीदारी रही,फिर इन्होंने पत्रकारिता के सफर की शुरुआत पटना से की, धनबाद में प्रभात खबर का नया एडिशन शुरू होने पर ये यहां स्थानीय संपादक बनकर धनबाद आये। इस दौरान उन्होंने कई मुद्दों को उठाया, पत्रकारिता को एक आंदोलन के रूप में ढालने की मुहिम में उन्होंने कई प्रयोग किये।कौत्स की गुरु दक्षिणा इनके प्रमुख खंडकाव्य हैं जिसमें इन्होंने कविता के बहाने शिक्षा व्यवस्था, और गुरु शिष्य परम्परा का सुंदर और आदर्श रूप का उल्लेख किया है। आश्रम व्यवस्था में भी सह शिक्षा,प्रेम,संवेदना त्याग के साथ एक पौराणिक कथा के बहाने शिक्षा के प्रगतिशील स्वरूप को सामने लाया है। – सम्पादक

प्रसंग: इसमें गुरु वरतंतु, शिष्य कौत्स और भील कन्या लोपाशा के जीवन प्रसंगों के माध्यम से भारतीय संस्कृति में प्राचीन शिक्षा की परंपरा, मानवीय मूल्यों, ऋषि कुलीन आदर्शों की बहुत ही सुंदर किंतु आख्यानात्मक अभिव्यक्ति हुई है।

पुस्तक समीक्षा

अपनी ही संतान सरीखे
अध्ययनरत सब ही थे प्यारे।
गुरु न्योछावर थे शिष्यों पर
और शिष्य भी गुरु पर न्यारे।”

वरिष्ठ कवि एवं पत्रकार सुशील भारती का खंडकाव्य ‘कौत्स की गुरु दक्षिणा’ अत्यंत महत्वपूर्ण कृति है। यह भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित है। यह कृति पौराणिक कथा वस्तु की पृष्ठभूमि पर लिखी गई है । लेकिन इसकी संवेदना आधुनिक चेतना के करीब है।

इसमें गुरु वरतंतु, शिष्य कौत्स और भील कन्या लोपाशा के जीवन प्रसंगों के माध्यम से भारतीय संस्कृति में प्राचीन शिक्षा की परंपरा, मानवीय मूल्यों, ऋषि कुलीन आदर्शों की बहुत ही सुंदर किंतु आख्यानात्मक अभिव्यक्ति हुई है।

कवि ने आश्रम व्यवस्था को आधुनिक चेतना से जोड़ने का काम किया है। गुरुकुल शिक्षा पद्धति में केवल पुरुष ही आश्रम में रह कर विद्या प्राप्त कर सकते थे। ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता था। इस दौरान किसी नारी से संबंध होना ब्रह्मचर्य व्रत के विपरीत था। कवि आधुनिक संवेदना से युक्त है। उसने गुरु वरतंतु के मुंह से यह कहलवा कर कि इस आश्रम में नारी और पुरुष दोनों के लिए स्थान है; पारंपरिक धारणाओं को तोड़ा है।

गुरुकुल में स्त्री और पुरुष दोनों को पढ़ने की अनुमति होना , यह आधुनिक शिक्षा पद्धति की मूल संवेदना के करीब है।
‘कौत्स की गुरुदक्षिणा’ खंडकाव्य तीन अध्यायों में विभक्त है। तीनों अध्यायों के लिए सुबह, दोपहर और शाम नाम दिया गया है। पहले अध्याय में गुरु वरतंतु के आश्रम, वहां के प्राकृतिक सौंदर्य एवं आनंदमय वातावरण का बड़ा ही गरिमामय और रोचक चित्रण किया गया है। दूसरे अध्याय में गुरु के आश्रम में कौत्स का चौदहों विद्या को हासिल करना है। इस बीच गुरु और शिष्य से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण एवं सरस प्रसंग आतें हैं जो इस पौराणिक लघुकथा को आगे बढ़ाने में सहायक हैं।

जैसे ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए कौत्स का एक भील कन्या लोपासा से प्रेम करना। यह आश्रम के विरुद्ध आचरण करना है। काव्य के मूल प्रेरक तत्व प्रेम है। आश्रम में शिक्षा प्राप्त करते हुए किसी स्त्री से प्रेम करना हमारे समय की सोच को अभिव्यक्त करता है। और यही नूतन बोध ने कवि को यह खंडकाव्य लिखने के लिए उत्साहित किया।

लेकिन कौत्स का प्रेम संबंध को लेकर बार बार होने वाला यह भय उस वक्त दूर हो जाता है जब गुरु उसे अपने आश्रम के सिद्धांत एवं नियमों की बातें बताते हैं। उसका मन खुशी से फूल की तरह खिल जाता है। उसका प्रेम परवान चढ़ने लगता है। अब वह भील कन्या लोपाशा से नि:संकोच तथा खुल कर निर्भय मिलता है। कथा के अंतिम भाग में गुरु दक्षिणा देने का प्रसंग आता है। गुरु द्वारा दक्षिणा लेने से अस्वीकार करने के बाद भी कौत्स नहीं मानता है। वह बिना गुरु दक्षिणा के प्राप्त विद्या को अधूरी समझता है। गुरु दक्षिणा के लिए वह जिद्द करता है। गुरु वरतंतु शिष्य के हठ से अप्रसन्न हो जाते हैं और दक्षिणा स्वरूप उसे चौदह सहस्त्र स्वर्ण मुद्राएं देने को आदेश देता है। इतना बड़ा गुरू दक्षिणा कौशिक के लिए भारी बोझ के समान हो जाता है।

इसके बाद वह महा प्रतापी राजा रघु के राजमहल में जाता है । यद्यपि राजा रघु युद्धों में काफी धन उड़ा चुके थे। उनका खजाना खाली था। कौत्स से उन्होंने थोड़ा समय मांगा। उसके बाद उन्होंने कुबेर पर धावा बोल दिय कुबेर ने अपना सारा खजाना राजा रघु के पास लाकर रखा। राजा रघु ने कौत्स को 14 हजार स्वर्ण मुद्राएं दे दीं। । उन्होंने यह मुद्रा दक्षिणा के रूप में गुरु को सौंप दिया। उन्होंने अपने गुरु से आशीर्वाद लेकर आश्रम से विदा ली। वह अपने साथ भील कन्या लोपासा को भी लेकर गया। दोनों खुशी पूर्वक रहने लगे। गुरु ने आदेश दिया कि तुमने जितनी विद्याओं को हासिल किया है, उसे जन-जन तक फैलाना।

लोपासा ने भी ग्रामीण समाज को शिक्षित करने के लिए संकल्प लिया । यहां आकर कथा समाप्त हो जाती है। कथा में मूल बात यही है कि आज की शिक्षा और प्राचीन शिक्षा में कितना अंतर आया है। मानव मूल्यों एवं आचरण में कितना फर्क है । लेकिन शिक्षा ही जीवन का मूल मंत्र है-, चाहे वह गुरुकुल में हो या आधुनिक स्कूल ,कॉलेज, एवं विश्वविद्यालय में। कवि सुशील भारतीय ने यह खंडकाव्य लिख कर हिंदी कविता में वर्षों के सन्नाटे को तोड़ा है। आज न तो खंडकाव्य लिखा जा रहा है न ही महाकाव्य। हां, इनकी जगह लंबी कविताओं ने ज़रूर ले लिया है । इस खंडकाव्य में जो आश्रमवादी व्यवस्था का वातावरण निर्माण किया गया है, वह काफी सराहनीय है।

कुछ पल के लिए हम गुरु वरतंतु के आश्रम में पहुंचते हैं और अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा से भी जुड़ते हैं । कौत्स और लोपासा का प्रेम आज के स्कूलों, कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों में देखा जा सकता है।

कवि का संदेश है :
जीवन है वह कर्मभूमि
जिसमें बचपन संघर्ष सीखता
और किशोरावस्था में निज
शक्ति जगाकर लाता यौवन।।

फिर अपना तो दिव्य प्रेम है
दिव्य प्रेम में अकुलाहट क्यों?
पास रहे या दूर रहे तन
मन तो मन के पास ही रहता।।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *