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अन्तर्राष्ट्रीय एडस् दिवस :आइए जानें पहले कहाँ से आया एड्स,और कैसी बीमारी

Byadmin

Dec 1, 2021
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दुनिया भर के डॉक्टर तीन दशक से ह्यूमन इम्यूनो डेफिशिएंसी वायरस यानी एचआईवी के बारे में जानकारी जुटा रहे हैं. इन सालों में तीन करोड़ से अधिक लोग एड्स के कारण अपनी जान गंवा चुके हैं.

एड्स के बारे में लोगों को जागरुक बनाने के मकसद से हर साल 1 दिसंबर ‘वर्ल्ड एड्स डे’ के रूप में मनाया जाता है।

दुनिया भर के डॉक्टर तीन दशक से ह्यूमन इम्यूनो डेफिशिएंसी वायरस यानी एचआईवी के बारे में जानकारी जुटा रहे हैं. इन सालों में तीन करोड़ से अधिक लोग एड्स के कारण अपनी जान गंवा चुके हैं.

चिंपांजी से इंसानों तक–

एचआईवी सबसे पहली बार 19वीं सदी की शुरुआत में जानवरों में मिला था. माना जाता है की इंसानों में यह चिंपांजी से आया. 1959 में कांगो के एक बीमार आदमी के खून का नमूना लिया गया. कई साल बाद डॉक्टरों को उसमें एचआईवी वायरस मिला. माना जाता है कि यह पहला एचआईवी संक्रमित व्यक्ति था.

शुरुआती रिसर्च–

1981 में एड्स की पहचान हुई. लॉस एंजिलिस के डॉक्टर माइकल गॉटलीब ने पांच मरीजों में एक अलग किस्म का निमोनिया पाया. इन सभी मरीजों में रोग से लड़ने वाला तंत्र अचानक कमजोर पड़ गया था. ये पांचों मरीज समलैंगिक थे इसलिए शुरुआत में डॉक्टरों को लगा कि यह बीमारी केवल समलैंगिकों में ही होती है. इसीलिए एड्स को ग्रिड यानी गे रिलेटिड इम्यून डेफिशिएंसी का नाम दिया गया.

गलत धारणा

बाद में जब दूसरे लोगों में भी यह वायरस मिला तो पता चला कि यह धारणा गलत है. 1982 में ग्रिड का नाम बदल कर एड्स यानी एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशिएंसी सिंड्रोम रखा गया. 1983 में सेन फ्रांसिस्को में समलैंगिकों ने इस विषय पर जागरूकता फैलाने के लिए प्रदर्शन भी किए.

वायरस की तलाश

1983 में फ्रांस के लुक मॉन्टेगनियर और फ्रांसोआ सिनूसी ने एलएवी वायरस की खोज की. इसके एक साल बाद अमेरिका के रॉबर्ट गैलो ने एचटीएलवी 3 वायरस की पहचान की. 1985 में पता चला कि ये दोनों एक ही वायरस हैं. 1985 में मॉन्टेगनियर और सिनूसी को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. ..

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