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अंजनी सरस की तीन कविताएं

Byadmin

Nov 30, 2021
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युवा कवयित्री सरिता अंजनी सरस की कविताओं में जीवन के आत्मीय संधान का भाव प्रतिपाद्य के रूप में उभरता दिखायी देता है और इसमें अपने परिवेश के प्रति भी अद्भुत संवेदना का समावेश है . यहाँ इनकी तीन कविताएँ प्रस्तुत हैं और अंतर्कथा को कवयित्री की ये कविताएँ राजीव कुमार झा के सौजन्य से प्राप्त हुई हैं . . . संपादक

 

परिचय:-

सरिता अंजनी सरस
शिक्षा:- स्नातकोत्तर, यूजीसी नेट

प्रकाशित पुस्तकें:- लघु शोध – हिन्दी और इन्टरनेट, साझा काव्य संग्रह – Raindrops on Hearts, ग्वालियर से निकलने वाली किस्सा कोताह, अरुणोदय पत्रिका, कविता कानन पत्रिका, नेपाल से निकलने वाली हीमालिनी पत्रिका आदि अनेक पत्र पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशित होती रहती है।
वरिष्ट लेखक व संपादक रजत सान्याल द्वारा कविता ‘मन’ का बांग्ला अनुवाद ।

कविताएं

   1

अघोषित कविता की घोषित पात्र

मैं किसी अघोषित कविता की
घोषित पात्र हूं
मेरी उद्घोषणा के लिए ईश्वर ने एक डॉक भेजा था
गलत पते के साथ
ईश्वर से भी होती है गलतियां
पहली बार पता चला

ओस सुबह जब धान के पत्तों पर सोई रहती है
अलसाई – सी
पत्तों पर लुढ़का अनगिनत ब्रह्मांड
सहसा कौध जाता है
अवचेतन में

अनगिनत ब्रह्मांड के
अनगिनत ईश्वर
और मेरे सही पते पर न पहुँचा
आजतक कोई खत

अपने हिस्से के खत के इंतजार में
किसी भी अघोषित कविता की
घोषित पात्र…
सनातन से ड्योढी पर बैठी
इंतजार के घूंट पी रही

सूरज जब उसकी थाली में आया था
और दे गया था इंतजार चांद का
हर रोज चांद आता है थाली में
फिर रोटी बन जाता है

कोरों पर लुढ़कती दो बूंदे
दो ब्रह्मांड लगती हैं उसे
और वह ढूंढती है
इतने ब्रह्मांडों में
अपने हिस्से का ईश्वर

उसके हिस्से में आया है इंतजार
ईश्वर का,भूख का,प्रेम का
ड्योढी के अन्दर
अंधेरे के झुरमुट में कैद है
इंतजार का एक कोना
हमेशा खाली ही रहता है।

उम्मीद है उसे
आएगा कभी कोई खत उसके सही पते पर……!!!

          2

पेंडुलम के कंधे पर बैठा समय


पेंडुलम के कंधे पर इत्मीनान से बैठा वक्त
झूलता रहता है अपनी ही धुरी पर
सुबह-दोपहर-शाम-रात
स्थिर-अस्थिर के गणित को धत्ता बताते हुए

कैसा परिदृष्य उभरता होगा उस वक्त
जब सनातन चुप्पियों के बीच
आ बैठती होगी मौत वक्त के सिरहाने
क्या तब यह बलवान समय भी चीखता होगा
मौत के भय से ठीक हमारी ही तरह
और कर्ण के प्रश्नों से काँपती इस पृथ्वी की भाँति
यह भी धुँधला जाता होगा
और तब यह भी हो जाता होगा असमर्थ
अपने ही वजूद के बचाव में

कैसा महसूस करता होगा यह तब
कालिख से घिरी आँधियों के बीच…!
थर्राता हुआ-सा या किसी पहाड़-सा अचल
या फिर गिर जाता होगा कई कई बार
कहीं घुप्प अंधरे में पड़ी बिम्बों की किसी थाली में

तो क्या
समय के माथे पर झूलता यह बेबस पेंडुलम भी
हो जाता होगा बिलकुल असहाय
इस वक्त के हाथों …!

उधर उजाले की पीठ भी तो
अँधेरे की नोक से छलनी होती रही ही होगी
तभी तो अँधेरे के काले हस्ताक्षर
रह जाते हैं उजाले के वजूद पर
कई सदियों का कलंक लिए
किसी शिलालेख की तरह- अमिट

खैर…
बावजूद इन सबके
पेंडुलम के कंधे पर बैठा वक्त
झूल रहा है अपनी परिधि और केंद्र के बीच
अपनी ही धुन में दुनिया से बेखबर
और यह ब्रह्मांड देख रहा है यह सब- अपलक

         3

    प्रेम और तुम

प्रेम के गहरे क्षणों में
मैं महसूस करती हूं
तुम्हारा वृक्ष होना

अहम,अपेक्षा,उम्मीद
के सारे पत्ते
पीले होकर गिरते देखती हूँ

उस समय तुम मुझे
बोधि वृक्ष लगते हो
उसके नीचे
सुकून से बैठी हुई माँ
मुझे और करीब लाती है तुम्हारे

मेरी निगाह में
देवता बना देती है
तुम्हें

तुम सिर्फ मेरे नहीं हो
तुम उस कण – कण के ऋणी हो
जिसने दिया है तुम्हें जीवन
तुम सबके जीवन में फूल बनना

जिसने तुम्हारे राहों के कांटे
अपने आँचल में लिया है,
वह पिता जो तुम्हारे लिए
खेतों की मिट्टी से इश्क़ किया है
मेरी मुहब्बत कर्जदार है उनकी।

मैं देखना चाहती हूँ
माँ के घावों पर
मरहम लगाते हुए तुम्हें
मैं देखना चाहती हूँ
पिता के साथ
मिट्टि से इश्क़ करते हुए तुम्हें…. ।

सरिता अंजनी सरस

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